जानता हो मैं तुम्हें इतने क़रीब से
और लिख नहीं पाता तुम्हारी व्यथा
मुझसे जुदा तो नहीं है
तुम्हारी व्यथा
तुम्हारी कथा
तुम्हारी ख़ता
मैं ही हूँ कारक
तुम्हारे हर उस जुर्म का
मैं ही हूँ कारक
तुम्हारे हर उस पुण्य का
अहं ब्रह्मास्मी
अहं कृष्णास्मी
अहं त्वमस्मी
मैं नहीं होता तो
तुम्हें दुनिया भर का
प्यार नहीं मिलता
प्यार क्या है
तुम्हें पता ही नहीं होता
तुम्हें नहीं समझ आता
प्यार की दीवानगी कैसी होती है
रातों की नींद कैसे उड़ जाती है
पाँव कहीं के कहीं क्यों पड़ते हैं
दुनिया की लाज शर्म
कहाँ दरकिनार हो जाती है
सब कुछ कैसे नगण्य हो जाता है
फ़ोन की घंटी क्यों प्रिय लगती है
फ़ोन क्यों जी जान से प्यार हो जाता है
क्यों रात के दो बजे भी
किसी से बात करना अच्छा लगता है
क्यूँ किसी को बंधन में नहीं बाँधना है
फिर भी बाँधना है
क्यूँ किसी से सिर्फ़ दिल का रिश्ता है
फिर भी छूने को दिल करता है
क्यूँ किसी को दुआएँ देना
कि वह ख़ुश रहे
और जब वह खुश हो
किसी और के साथ
तो दुखी होना
क्यूँ इश्क़
आग का दरिया है
सावन की घटा है
ख़ुद ही इनाम
ख़ुद ही सज़ा है
मैं जानता हूँ तुम्हें
जैसे मैं ख़ुद को जानता हूँ
बस नहीं लिख सकता
तुम्हारी व्यथा
तुम्हारी कथा
तुम्हारी ख़ता
राहुल उपाध्याय । 7 अप्रैल 2026 । सिएटल

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