कभी विधान सभा तो कभी लोक सभा चुनाव का माहौल रहता है सदा 'मत'दान करें 'मत'दान करें देस में ये नारे कान भरें हम कहते हैं आप दान करें जितना हो सके उतना दान करें कुछ अभागों का कल्याण करें जीवन ज्योति का सम्मान करें गिरे हुओं का उत्थान करें कुछ दान करें कुछ दान करें आओ चलो आह्वान करें हम सब कुछ दान करें काम एक महान करें भारत पर सब अभिमान करें इस आशा को बलवान करें सिएटल, 16 नवम्बर 2007
Friday, November 16, 2007
Wednesday, November 14, 2007
प्रेम कहानी
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
हीरों से प्यार
हीरो था गबरु जवान
बजाते ही उसके सीटी बस
रुक जाती थी चलती 'सिटी बस'
हिरोईन थी गज़ब की सुन्दर
निकलती थी जब घर से बाहर
होश खो देती थी सारी 'सिटी' बस
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
हीरों से प्यार
प्यार का मारा होता है 'फ़ूल'
रोज देता था उसे दर्जनो फूल
पढ़ना लिखना छोड़
'क्लाँस' करता था गुल
काँलेज में इस तरह
खिलाता था गुल
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार
उसे मंजूर नहीं था
हीरो की चार पाई की
कमाई से खरीदी
चारपाई पर चैन से सोना
उसे चाहिए थी चैन
जिस में हो दस तोला सोना
दे न सका
हीरों का हार
इस तरह हुई
इस हीरो की हार
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार
हीरो हुआ बड़ा निराश
और बन गया देवदास
एक दिन जो गया एक 'बार'
जाने लगा बार बार
प्रेम प्यार के किस्से
कहता भी तो किससे?
उसके मन की वेदना
समझ सका कोई वेद ना
नैन से आंसू बरस गए
और गुज़र दो बरस गए
बाप ने पूछा
तू इतना क्यूं पीता है?
मुझे तो बता
आखिर मैं तेरा पिता हूं
इश्क में लाचार हूं
इसलिए पीता हूं
धिक्कार है मुझे
कि मैं हार के भी जीता हूं
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार
हीरो को हुआ
'हेरोईन' से प्यार
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:34 AM
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Wednesday, November 7, 2007
मूर्ति पूजा
बिक गया है जो लुट गया है वो तराना पुराना हो गया है वो पूजा जिनकी हो रही है आज मंडप में जो कर रहे हैं राज लाला की दुकान पर बिक रहे थे वो सुनार-कुम्हार के हाथों पिट रहे थे वो कौड़ियों के भाव बिक जाते हैं जो समृद्ध हमें करेंगे वो? बिकना जिनके मुकद्दर में हो मोक्ष हमें दिलाएंगे वो? पंडित के सुलाने से सो जाते हैं जो किस्मत हमारी जगाएंगे वो? पलक झपकते ही विसर्जित हो जाते हैं जो भव सागर पार कराएंगे वो? लालची का लोभ है या प्रेमी का प्यार है दुखियारे का दर्द है या सतसंग का संस्कार है शिल्पी का हुनर है या भक्ति का चमत्कार है दुनिया जिसे कहती है पत्थर करती उसी का सत्कार है आज एक और त्यौहार है लगा रिवाज़ों का बाज़ार है हम भी उसमें जुट गए जहाँ सबसे लम्बी कतार है भरा हुआ भंडार है सम्पदा जहाँ अपार है गरीब से गरीब भी वहाँ दे रहा उपहार है बिक गया है जो लुट गया है वो तराना पुराना हो गया है वो 7 नवंबर 2007
Tuesday, November 6, 2007
दीवाली की छुट्टी
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम
लक्ष्मी की पूजा
और लक्ष्मी कमाना
दोनो को हमने
एक है माना
इसीलिए छुट्टी नहीं लेते हैं हम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम
मिठाई की दुकान
नहीं होती है बंद
लक्ष्मी कैसे आए
जब दुकान हो बंद
करम का ही दूसरा नाम है धरम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम
आँफ़िस से छुट्टी
शायद मिल भी जाए
पर स्कूल से
कैसे 'बंक' किया जाए
इम्तहान न दिया तो 'फ़ैल' होंगे हम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम
दीवाली का दिन भी
ठीक से तय नहीं
आज है या कल
कोइ सहमत नहीं
'वीकेंड' पे मिलो करो झगड़ा खतम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम
जैसा है देस
वैसा है भेस
मिल-जुल के खाओ-पिओ
खूब करो ऐश
खामखां आप यूं हो नहीं गरम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:20 AM
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Friday, November 2, 2007
दीवाली की शुभकामनाएं
दीवाली की रात
हर घर आंगन
दिया जले
उसने जो
घर आंगन दिया
वो न जले
दिया जले
दिल न जले
यूंहीं ज़िन्दगानी चले
दीवाली की रात
सब से मिलो
चाहे बसे हो
दूर कई मीलों
शब्दों से उन्हे
आज सब दो
न जाने फिर
कब दो
दुआ दी
दुआ ली
यहीं है दीवाली
अक्टूबर 2000
Posted by Rahul Upadhyaya at 8:49 AM
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दीवाली की यादें
दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना
न स्कूल हैं बंद
न हैं आँफ़िस में छुट्टी
किस्मत भी देखो
किस तरह है फ़ूटी
बाँस को भी था
आज ही सताना
दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना
न वो पूजा का मंडप
न वो फूलों की खुशबू
न वो बड़ों का आशीष
न वो अपनो की गुफ़्तगू
समां फिर ऐसा
मिले तो बताना
दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना
वो मिठाई के डब्बे
वो दस तरह के व्यंजन
न था डाँयबिटिज़ का डर
न थे डाँयटिंग के बंधन
वो खूब खिला के
अपनापन जताना
दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना
वो गलियों में रंगत
वो दहलीज़ पे रंगोली
वो रंगीं पोषाकों में
बच्चों की टोली
सपना सा लगता है
अब वो ज़माना
दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना
याद आता है
वो पटाखों का शोर
बारूद में महकी
वो जाड़ों की भोर
वो रात-रात भर
दीपक जलाना
दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना
सिएटल
24 अक्टूबर 2005
Posted by Rahul Upadhyaya at 8:36 AM
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Thursday, November 1, 2007
एक और दीवाली
अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली
होली का माहौल हो
या दीवाली का त्यौहार
मनाया जाता है
सिर्फ़ शनिवार रविवार
अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली
एक ही तरह की
महफ़िल है सजती
निमंत्रण देने पर
घंटी है बजती
कर के वही
बे-सर-पैर की बातें
गुज़ारी जाती हैं
वो दो-चार रातें
अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली
त्यौहार-दर-त्यौहार
वहीं लाल-पीले
कपड़े पहने हैं जाते
वही घिसे-पिटे जोक्स
सुनाए हैं जाते
वही छोले
वही मटर-पनीर
वहीं गुलाब जामुन
और वही खीर
अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली
पैसे की होड़ में
आगे बढ़ने की दौड़ में
पार की थीं सरहदें
और पार कर गए कई हदें
दोस्तों से बंद हुआ
दुआ-सलाम
भूल गए करना
बड़ों को प्रणाम
धूल खा रहा है
पूजा का दीपक
रामायण के पोथे को
लग गई है दीमक
अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली
महानगर की गोद में
इमारतों की चकाचौंध में
हैं अपनों से दूर
हम सपनों के दास
न पूनम से मतलब
न अमावस का अहसास
अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली
21 अक्टूबर 2006
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:02 PM
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