Wednesday, December 14, 2022

कहती है

कहती है 

जब अपने पाँव पर खड़ी हो सकेगी

मुझसे सर उठा के बात कर सकेगी

अभी किसी की छत्र छाया में है

मुझसे बात करना ग़लत लगता है 


जब तक वह बात करने लायक़ होगी 

कई और ज़िम्मेदारियाँ 

अपने सर ले चुकी होगी 

न फ़ुरसत होगी 

न इच्छा ही होगी

नदी भी सारी 

सूख चुकी होगी

भावनाएँ सारी 

फ़ना हो गई होंगी 


एक आज्ञाकारिणी 

का जीवन भी

कितना अजीब है 


कर्तव्यों के बोझ में 

बुझा देती है आग


न रहती है औरत

न हो पाती है मर्द 

एक अलग ही जीव में

बदल जाती है 


न उठती लहर है 

न गिरती लहर है 


न आँसू हैं बहते

न सूखते हैं आँसू


न बजते हैं गीत

न थिरकते हैं पाँव


ईश्वर से मोह भंग तो होना ही था 

भीष्म प्रतिज्ञा का नशा चढ़ता ही जाता है 


न जाने क्या है 

ख़ुद को स्वावलंबी साबित करने में कि 

सबसे हाथ खींचे वो चली जा रही है


राहुल उपाध्याय । 14 दिसम्बर 2022 । दिल्ली 














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