Monday, April 28, 2008

भूलते नहीं हम

घर-घर होती है ऐसे ही भोर
प्लास्टिक के मग्गों में दहाड़ते पानी का शोर
लोहे की बाल्टी के हेंडल की खटपट
फ़्लश की गड़गड़ाहट
गीज़र की घरघर

घर-घर होती है ऐसे ही भोर
लेकिन भूल जाते हैं सब शोर किशोर
याद रहती हैं कुछ वो बातें
जो दिन-रात करती हैं भाव-विभोर

याद रहती हैं
माँ के हाथ की रोटी
पहली बरसात की भीनी खुशबू
देर रात तक दोस्तों की गुफ़्तगू
गाजर का रंग
अपनों का संग

भूलते नहीं हम
बचपन का बाग
सरसों का साग
सावन का राग
सर्दी की आग

भूलते नहीं हम
घुलते नहीं हम
जुड़ते नहीं हम
फलते नहीं हम

लिविंग रुम के कम्फ़र्ट में
कट फ़्लावर्स लगते हैं सुंदर
लेकिन पनपते हैं वो
कीचड़-मिट्टी में ही पल कर

सिएटल,
28 अप्रैल 2008
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Glossary:
भोर = morning
मग्गों = mugs
गीज़र = water heater
किशोर = youth
लिविंग रुम = drawing room
कट फ़्लावर्स = cut flowers
पनपते = thrives

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2 comments:

आनंदकृष्ण said...

aapkee ye kavitaa "bhoolte nahi hum" par apnee baat kahne ke pahle kuchh kaavy panktiyaan bataanaa chaahoongaa jo ise padhte huye anaayaas yaad aa gain.
"shaakh se na tooto, sookh jaaoge-
maanaa tum patte ho akshay-vat ke"

ye nishchit hai ki hum apne us parivesh ko apne vyaktitv se kabhi alag nahi kar sakte jismen hamaaraa prasfutan, pallawan,aur vikaas huaa hai. jo aadhunik bhoutikwaadi log ise bhoolne ki koshish karte hain ve baad men pachhtaate huye apnee jadon kee talaash karte rah jaate hain.

aapki kavitaa apnee jadon se jude rahne ke yathaarthbodh ki kavitaa hai. is kavitaa men kathy kee saath shilp ko is baareekee se bunaa gayaa hai ki kathy kee sapaat-bayaanee aur shilp kee bojhiltaa kaa khatraa kaheen naheen rahtaa.

jab aap siyetal (spelling galat ho to maaf kijiyega) men baith kar plastik ke magge aur lohe ki baaltee kee baat kar rahe hain aut der raat tak doston ki guft-gu yaad kar rahe hain to tay hai ki aapke mann men kahin prachchhann roop se hee sahi ek aise khaalis aam bhaartiy yuvak kaa hriday spandit hai jo apnee jadon se bakhoobi judaa hai, unhen pahchaantaa hai aur unse pyaar bhi kartaa hai.

ek achchhi aur chintan-poorn rachnaa ke liye badhaai.

anandkrishan, jabalpur.

p.s. rahul ji sach bataaiye ki plastik ke magge, lohe ki baaltee, barsaat ki khushboo, doston se der raat tak ki gapshap yaanee poori kavitaa men utartey huyeaapko jabalpur yaad aa rahaa thaa na-?

anandkrishan, jabalpur

आनंदकृष्ण said...

आपकी ये कविता "भूलते नहीं हम" पर अपनी बात कहने के पहले कुछ काव्य पंक्तियां बताना चाहूंगा जो इसे पढ़ते हुए अनायास याद आ गई.
"शाख से न टूटो, सूख जाओगे-
माना तुम पत्ते हो अक्षय-वट के"

ये निश्चित है कि हम अपने उस परिवेश को अपने व्यक्तित्व से कभी अलग नहीं कर सकते जिसमें हमारा प्रस्फ़ुटन, पल्लवन,और विकास हुआ है. जो आधुनिक भौतिकवादि लोग इसे भूलने कि कोशिश करते हैं वे बाद में पछताते हुए अपनी जड़ों की तलाश करते रह जाते हैं.

आपकी कविता अपनी जड़ों से जुड़े रहने के यथार्थबोध की कविता है. इस कविता में कथ्य के साथ शिल्प को इस बारीकी से बुना गया है कि कथ्य की सपाट-बयानी और शिल्प की बोझिलता का खतरा कहीं नहीं रहता.

जब आप सिएटल में बैठ कर प्लास्टिक के मग्गे और लोहे की बाल्टी की बात कर रहे हैं और देर रात तक दोस्तों की गुफ़्त-गु याद कर रहे हैं तो तय है कि आपके मन में कहीं प्रच्छन्न रूप से ही सही एक ऐसे खालिस आम भारतीय युवक का ह्रदय स्पन्दित है जो अपनी जड़ों से बखूबी जुड़ा है, उन्हें पहचानता है और उनसे प्यार भी करता है.

एक अच्छी और चिन्तन-पूर्ण रचना के लिये बधाई.

आनंदकृष्ण, जबलपुर.

पुनश्च: राहुल जी सच बताइये कि प्लास्टिक के मग्गे, लोहे कि बाल्टी, बरसात की खुशबू, दोस्तों से देर रात तक की गपशप यानी पूरी कविता में उतरते हुए आपको जबलपुर याद आ रहा था न-?

आनंदकृष्ण, जबलपुर..