Tuesday, April 22, 2008

पहेली 17

न काम है न क्रोध है
न मद है न लोभ है
कर्मयोग के भक्त हैं
सारी वासनाओं से मुक्त हैं

न धन है न दौलत है
न ज़मीन-जायदाद है
न जात है न पांत है
न कोई वाद-विवाद है

न माया है न मोह है
न किसी से सरोकार है
न स्वामी है न नौकर है
न कोई मोटरकार है
बुझिए तो सही
किसका ज़िक्र इस बार है?

ये भी हाड़-मांस के पुतले हैं और ये भी तो नश्वर हैं
लेकिन मूर्ति-मंदिर आदि बनाकर पूजते नहीं ईश्वर हैं

मनुष्य हर क्षेत्र में स्वयं को मान बैठा प्रवीण है
लेकिन इनकी तुलना में हम और आप क्षीण हैं
[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। ध्यान से देखे तो साफ़ नज़र आ जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'. या अन्य पहेलियां । आप चाहे तो इसका हल comments द्वारा यहां लिख दे। या फिर मुझे email कर दे इस पते पर - upadhyaya@yahoo.com ]

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2 comments:

Anonymous said...

पक्षी?

सन्जय शर्मा said...

आज ज्ब भी कोई जाता दूर अपने देश है
चाल इसी की चलते पाता है मंजिल
न पाता राह में ट्रेफिक की क्लेश है