एक नहीं, दो नहीं कहानी है हर घर की पकेगी और सजेगी आज शानदार टर्की राष्ट्रपति ने प्रतीक के रुप में छोड़ दी सुंदर सी एक टर्की अलबत्ता सैंडवीच के बीच फिर भी खाएंगे वो टर्की दयालु समाज की कहानी है ये murky सिएटल 20 नवम्बर 2007
Tuesday, November 20, 2007
Thanksgiving की पार्टी
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:52 PM
आपका क्या कहना है??
सबसे पहली टिप्पणी आप दें!
Labels: festivals
Thanksgiving की छुट्टी
ले-दे के छुट्टी में मिले हैं चार दिन दो शाँपिंग में गुज़रेंगे और दो कार में आलिशान रिसोर्ट हमसे महंगी फ़ीस लेंगे बर्फ़ीली पहाड़ियों पर बच्चे फ़िसलेंगे लुभावने इश्तहारों पर हम फ़िसलेंगे तड़के उठ कर बारगैन प्राईस' पर माँल आदि जा कर नया माल खरीदेंगे देर रात तक दोस्तों के घर माल आदि खा कर नसीहत खरी देंगे चार दिन की छुट्टी है पर हम अत्यंत व्यस्त होंगे देर तक सोने के सपने सारे ध्वस्त होंगे कुछ कर गुज़रने के इरादे सारे पस्त होंगे वक़्त बर्बाद करने में भागीदार हमारे हस्त होंगे सिएटल 20 नवम्बर 2007
Monday, November 19, 2007
किनारे-किनारे
हम दोनों के बीच प्यार था प्यार बेशुमार था बेशुमार इतना जितना दो 'बीच' के बीच लहलहाता समंदर मैं था उस किनारे तुम थी इस किनारे प्यार ने खींचा हमें एक दूसरे की ओर तुम थोड़ी बदली मैं थोड़ा बदला मैं चला तुम्हारी तरफ़ और तुम मेरी ओर मंज़ूर नहीं था हमें मझधार में मिलना मैं चलता रहा तुम चलती रही अब मैं हूँ इस किनारे और तुम उस किनारे हम दोनों के बीच अब भी प्यार बहुत है राहुल सिएटल 19 नवम्बर 2007
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:04 PM
आपका क्या कहना है??
1 पाठक ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
Labels: nature, relationship, TG
Friday, November 16, 2007
blog को blog ही रहने दो
हमने देखी हैं
इन blogs की टपकती लारें
भूल से भी इन्हें
comments का इनाम न दो
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …
blog कोई wiki नहीं
blog website नहीं
एक email है
आए दिन post हुआ करती है
न कोई लिखता है
न कोई पढ़ता है
न पढ़ी जाती है
एक chain mail है
जो forward हुआ करती है
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …
sinister से remarks
छुपे रहते हैं
smileys में कहीं
spelling mistakes से
भरे रहते हैं
sentences कई
बात कुछ कहते नहीं
काम की या कमाल की मगर
journalism की डींग भरा करते हैं
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित। फ़िल्म 'खामोशी' के लिए लिखे इस गीत को >यहाँ देखे)
-----------------------------------------------
इतना सब कहने के बाद आप मेरे blog पर comments जरूर लिखे :)
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:16 PM
आपका क्या कहना है??
7 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
दान
कभी विधान सभा तो कभी लोक सभा चुनाव का माहौल रहता है सदा 'मत'दान करें 'मत'दान करें देस में ये नारे कान भरें हम कहते हैं आप दान करें जितना हो सके उतना दान करें कुछ अभागों का कल्याण करें जीवन ज्योति का सम्मान करें गिरे हुओं का उत्थान करें कुछ दान करें कुछ दान करें आओ चलो आह्वान करें हम सब कुछ दान करें काम एक महान करें भारत पर सब अभिमान करें इस आशा को बलवान करें सिएटल, 16 नवम्बर 2007
Wednesday, November 14, 2007
प्रेम कहानी
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
हीरों से प्यार
हीरो था गबरु जवान
बजाते ही उसके सीटी बस
रुक जाती थी चलती 'सिटी बस'
हिरोईन थी गज़ब की सुन्दर
निकलती थी जब घर से बाहर
होश खो देती थी सारी 'सिटी' बस
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
हीरों से प्यार
प्यार का मारा होता है 'फ़ूल'
रोज देता था उसे दर्जनो फूल
पढ़ना लिखना छोड़
'क्लाँस' करता था गुल
काँलेज में इस तरह
खिलाता था गुल
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार
उसे मंजूर नहीं था
हीरो की चार पाई की
कमाई से खरीदी
चारपाई पर चैन से सोना
उसे चाहिए थी चैन
जिस में हो दस तोला सोना
दे न सका
हीरों का हार
इस तरह हुई
इस हीरो की हार
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हीरो को था
हिरोईन से प्यार
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार
हीरो हुआ बड़ा निराश
और बन गया देवदास
एक दिन जो गया एक 'बार'
जाने लगा बार बार
प्रेम प्यार के किस्से
कहता भी तो किससे?
उसके मन की वेदना
समझ सका कोई वेद ना
नैन से आंसू बरस गए
और गुज़र दो बरस गए
बाप ने पूछा
तू इतना क्यूं पीता है?
मुझे तो बता
आखिर मैं तेरा पिता हूं
इश्क में लाचार हूं
इसलिए पीता हूं
धिक्कार है मुझे
कि मैं हार के भी जीता हूं
एक था हीरो
एक थी हिरोईन
हिरोईन को था
सिर्फ़ हीरों से प्यार
हीरो को हुआ
'हेरोईन' से प्यार
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:34 AM
आपका क्या कहना है??
2 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
Wednesday, November 7, 2007
मूर्ति पूजा
बिक गया है जो लुट गया है वो तराना पुराना हो गया है वो पूजा जिनकी हो रही है आज मंडप में जो कर रहे हैं राज लाला की दुकान पर बिक रहे थे वो सुनार-कुम्हार के हाथों पिट रहे थे वो कौड़ियों के भाव बिक जाते हैं जो समृद्ध हमें करेंगे वो? बिकना जिनके मुकद्दर में हो मोक्ष हमें दिलाएंगे वो? पंडित के सुलाने से सो जाते हैं जो किस्मत हमारी जगाएंगे वो? पलक झपकते ही विसर्जित हो जाते हैं जो भव सागर पार कराएंगे वो? लालची का लोभ है या प्रेमी का प्यार है दुखियारे का दर्द है या सतसंग का संस्कार है शिल्पी का हुनर है या भक्ति का चमत्कार है दुनिया जिसे कहती है पत्थर करती उसी का सत्कार है आज एक और त्यौहार है लगा रिवाज़ों का बाज़ार है हम भी उसमें जुट गए जहाँ सबसे लम्बी कतार है भरा हुआ भंडार है सम्पदा जहाँ अपार है गरीब से गरीब भी वहाँ दे रहा उपहार है बिक गया है जो लुट गया है वो तराना पुराना हो गया है वो 7 नवंबर 2007
