कितनी अजीब बात है
कि हमें उनका जन्मवर्ष तो ठीक से ज्ञात नहीं
लेकिन उनके जन्म की घड़ी है अच्छी तरह से याद
जबकि उस ज़माने में घड़ी थी ही नहीं
और अब
ग्रीनविच से घड़ी मिलाकर के
वृंदावन के लोग
रात के ठीक बारह बजे
मनाते हैं श्री कृष्ण का
न जाने कौन सा जन्मदिन
Friday, August 14, 2009
5237 वीं जन्माष्टमी?
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:38 PM
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Tuesday, August 11, 2009
15 अगस्त की याद में
हम थे अलग
इसलिए हुए अलग
या
हुए अलग
इसलिए अब हैं अलग?
'बिग बैंग' के नाद ने हमें
कर दिया जिनसे दूर
कोशिश उनसे मिलने की
हम करते हैं भरपूर
लेकिन पास-पड़ोस में जो रहते हैं
उनसे करें न प्यार
खड़ी हैं कई दीवारें
जिनके बंद पड़े हैं द्वार
छोटी सी इस धरती पर
जब-जब खींची गई रेखाएँ
नए-नए परचम बने हैं
और गढ़ी गई कई गाथाएँ
अब सब खुद को हसीं बताते हैं
और औरों की हँसी उड़ाते हैं
हम ऐसे हैं, हम वैसे हैं
कह-कह के वैमनस्य बढ़ाते हैं
हम सही और तुम गलत
जब राष्ट्र-प्रेम के परिचायक बन जाते हैं
तब इस वाद-विवाद की वादी में
हम सुध-बुध अपनी खोने लगते हैं
और दूर दराज के ग्रहों पर
विवेक खोजने लग जाते हैं
सिएटल,
11 अगस्त 2009
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:51 PM
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Sunday, August 9, 2009
मसला
हर मसला
'मसल' से
मसला नहीं जाता
हो चौखट पे सैलाब
तो उससे लड़ा नहीं जाता
जब से सुना
कि लकीरों में तक़दीर है मेरी
मेरे हाथों से
मेरा हाथ
मला नहीं जाता
समंदर में मंदिर
कहीं छुपा है ज़रूर
बिन जूते उतारे
उसमे उतरा नहीं जाता
जब भी सँवरती हैं,
बहुत बिगड़ती हैं ज़ुल्फ़ें
कहती हैं
क्यों आज़ाद हमें रखा नहीं जाता?
मुझे होती समझ
तो तुम्हें न बताता?
कि कुछ होती हैं बातें
जिन्हें कहा नहीं जाता
सिएटल
9 अगस्त 2009
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:15 PM
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Thursday, August 6, 2009
मय न होती तो क्या होता?
मय न होती तो क्या होता?
नस्ल का मसला बढ़ गया होता
तू-तू मैं-मैं होती रहती
जल्दी खत्म न झगड़ा होता
न साकी होता, न सलीका होता
प्रेम-प्यार का रंग फ़ीका होता
शेर-ओ-शायरी की बात छोड़िए
ग़ालिब तक न पैदा होता
देवदास को हम जान न पाते
नीरज से वंचित रह जाते
रास-रंग का साथ न होता
आदमी बहुत बेसहारा होता
न पीते लोग, न पिलाते लोग
नपे-नपाए रह जाते लोग
मन में कोई आग न होती
अवतरित न कोई मसीहा होता
वे पागल हैं, वे बचकाने हैं
जो मय को बुरा बताते हैं
इक मय ने ही हमें संयम में रखा
वरना बुत साबूत कोई बचा ना होता
मय और माया का साथ पुराना
मय बिना जीवन बेगाना
यह न होती हम न होते
ब्रह्मा ने ब्रह्माण्ड तक रचा ना होता
सिएटल,
6 अगस्त 2009
Posted by Rahul Upadhyaya at 3:30 PM
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Tuesday, August 4, 2009
मेल और ई-मेल
मेल थी सुस्त
ई-मेल है चुस्त
मेल थी महंगी
ई-मेल है मुफ़्त
ई-मेल का सिलसिला हुआ शुरु
डाकिये का आना जाना हो गया बंद
पड़ोसी भी भेजने लगे ई-मेल
और मेल-मिलाप का हो गया अंत
मेल में कई बाधाएं थीं
नाप तोल की सीमाएं थीं
फिर भी साथ ले आते थे
छोटे लिफ़ाफ़ो में बहनों का गर्व
हर भैया दूज और राखी के पर्व
मेल में कई बाधाएं थीं
नाप तोल की सीमाएं थीं
फिर भी साथ ले आते थे
होठों की लाली, हल्दी के निशां
जो जता देते थे प्रेम, कुछ लिखे बिना
मेल में कई बाधाएं थीं
नाप तोल की सीमाएं थीं
फिर भी साथ ले आते थे
माँ के आंसूओं से मिटते अक्षर
जो अभी तक अंकित हैं दिल के अंदर
मेल में कई बाधाएं थीं
नाप तोल की सीमाएं थीं
ई-मेल में नहीं कोई रोक-टोक
बकबक करे या भेजे 'जोक'
पूरे करें आप अपने शौक
किस काम का ये बेलगाम विस्तार?
समाता नहीं जिसमें अपनों का प्यार
गिगाबाईट का फ़ोल्डर गया है भर
एक भी खत नहीं उसमें मगर
जो मुझको आश्वासित करे
न सी-सी हो न बी-सी-सी हो
मुझको बस सम्बोधित करे
आदमी या तो है आरामपरस्त
या फिर है कुछ इस कदर व्यस्त
कि थोक में बनाता पैगाम है
ऑटो सिग्नेचर से करता प्रणाम है
सब हैं सुविधा के नशे में धुत्त
धीरे धीरे सब हो रहा है लुप्त
मेल थी सुस्त
ई-मेल है चुस्त
मेल थी महंगी
ई-मेल है मुफ़्त
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:49 PM
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Labels: digital age, misc
Saturday, August 1, 2009
जी-पी-एस
मैं
अच्छी तरह से वाकिफ़ हूँ
शहर के चप्पे-चप्पे से
हर ऊँचे-नीचे
टेढ़े-मेढ़े रास्ते से
एवेन्यू से, स्ट्रीट से
पार्कवे से, कल-डि-सेक से,
हर कोर्ट से,
हर लेन से,
मैं अच्छी तरह से वाकिफ़ हूँ
कौन सी सड़क कहाँ जा कर
चुपचाप अपना नाम बदल लेती है
चेरी से जैम्स
और सहाली से 228th बन जाती है
मैं यह भी जानता हूँ कि
कौन सी सड़क खत्म होने पर भी खत्म नहीं होती
और दुबारा जन्म ले लेती है झील के उस पार
मैं
अच्छी तरह से वाकिफ़ हूँ
शहर के चप्पे-चप्पे से
लेकिन फिर भी
जी-पी-एस साथ लेकर चलता हूँ
इसलिए नहीं कि वो मुझे रास्ता बता सके
बल्कि इसलिए कि
जब वो कहे - यहाँ मुड़ो
मैं न मुड़ूँ
और
कुछ क्षणों के लिए
महसूस कर सकूँ
कि अपनी मर्जी का मालिक होना
किसे कहते हैं
सिएटल,
1 अगस्त 2009
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:18 AM
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Labels: August Read, digital age, intense, March2, MM, new, relationship, TG
बीयर ज्ञान
मैंने बीयर नहीं पी आज तक
कि कभी गाड़ी पकड़ गई रफ़्तार
तो कोई पुलिसवाला रोक के
कर न ले मुझे गिरफ़्तार
और उन साहब को देखिए
वो क्या हुए गिरफ़्तार
कि व्हाईट हाऊस में बुलाकर
बीयर पिला रही सरकार
पढ़त-पढ़त अख़बार के
मुझे भी मिल गया ज्ञान
कि लड़ने-भिड़ने के बाद ही
जग से मिलता है सम्मान
सिएटल,
1 अगस्त 2009
