Tuesday, March 13, 2012

कर-कर के इंकलाब एन्क्लेव ही जोड़ पाए हैं

कर-कर के इंकलाब, एन्क्लेव ही जोड़ पाए हैं
छ: दशक के बाद भी अंग्रेज़ी कहाँ छोड़ पाए हैं

आपकी बात का क्या करेगा विश्वास कोई
जब आप ही अपनी बात को खुद न ओड़ पाए हैं

जब दिल हो और दिमाग हो, तो बात बिगड़ेगी ज़रूर
दिल और दिमाग की साँठ-गाँठ बिरले ही तोड़ पाए हैं

जो हो गया सो हो गया, आगे की सुध लीजिए
वक़्त की धार को बिड़ला भी न मोड़ पाए हैं

दिल्ली । 88004-20323
13 मार्च 2012

Friday, March 2, 2012

न घाट है न घर है

न घाट है न घर है, कहते महानगर हैं
तारों के जाल में तारें आते न नज़र हैं

बस्ती है कि जंगल, कहना मुश्किल है
आदमियों की खाल में बसते अजगर हैं

आदमी तो आदमी, देवता भी कमाल है
कालीनदार कमरों में दिखे भोले शंकर हैं

आप ही बताईए, ये ऐसी कैसी चाल है?
कि खाते-पीते घर के ही क्यूँ बनते अफ़सर हैं

कहने की बात है, घंटी कहाँ बजती है?
घर्घर रिंगटोन ही हम सुनते घर-घर हैं

राहुल उपाध्याय |  2 मार्च 2012 | दिल्ली 

Saturday, February 18, 2012

क्या करूँ, क्या न करूँ

कविता लिखूँ किसी की वॉल पे
कि फूल भेजूँ उसके पास मैं
क्या करूँ, क्या न करूँ
सोचता रहा इस बार मैं

ख़त लिखूँ एक कोरा सा
या मिस्ड कॉल करूँ दस बार मैं
क्या करूँ, क्या न करूँ
सोचता रहा इस बार मैं

'लाईक' करूँ उसके फोटो को
या कमेंट लिखूँ कोई खास मैं
क्या करूँ, क्या न करूँ
सोचता रहा इस बार मैं

दिल ढला और रात हुई
कर न सका कोई काम मैं
क्या करूँ, क्या न करूँ
सोचता रहा इस बार मैं

'गर गले लगूँ और वो गले पड़े
तो क्या बच पाऊँगा इस बार मैं
क्या करूँ, क्या न करूँ
सोचता रहा इस बार मैं

सिएटल, 18 फ़रवरी 2012
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वॉल = wall
मिस्ड कॉल = missed call
'लाईक' = like
कमेंट = comment

Friday, February 10, 2012

रामनी में राम नहीं

रामनी में राम नहीं
सेंटोरम भी संत नहीं
कितने आए, कितने गए
आता एक पसंद नहीं

न्यूट और पॉल का
हुआ बुरा हाल है
इनकी किसी बात में
दिखता हमें दम नहीं

ओबामा की सीट पे
बैठेंगे ओबामा
इनकी हुकूमत का
दिखता हमें अंत नहीं

आपकी आप जाने
हमने तो ये तय किया
पार्टी चाहे कोई जीते
पड़ना कुछ फ़र्क़ नहीं

एक ही थैली के
चट्टे-बट्टे हैं सभी
लड़ना है सो लड़ते हैं
वरना कोई द्वंद नहीं

सिएटल । 513-341-6798
10 फ़रवरी 2012

Saturday, January 28, 2012

4 इंच की स्क्रीन

पूरे रास्ते भर
वाईपर में फ़ँसा
मेपल का पत्ता
फ़ड़फ़ड़ाता रहा
और उसके कान पे जूँ तक न रेंगी

उसकी निगाहें गड़ी थीं
फोन पर
ट्रैफ़िक पर
रेडियों के बजते शोर पर
और हाथ में पकड़े स्टारबक्स के घोल पर

आज की दुनिया में
संसार की कोई भी ऐसी चीज़ नहीं
जो प्रकृति की कृति हो
और इंसान को अपनी और मोड़ सके
उसे खुद से जोड़ सके

पहले हम तारों से रिश्ता जोड़ते थे
उनकी संरचना में भालू-बर्तन खोजते थे

फिर एक ऐसा वक्त आया कि
हम तारों को छोड़ चाँद पे उतर आए
आज अमावस है, चार दिन बाद चतुर्थी,
उसके एक हफ़्ते बाद एकादशी, और फिर पूर्णिमा
उसी के उतार-चढ़ाव के साथ
हम तीज-त्यौहार-पर्व मना लिया करते थे

लेकिन फिर एक ऐसा भी दौर आया
कि शाम ढलते ही सब
टी-वी के सामने बैठ
किसी काल्पनिक परिवार के सुख-दु:ख
उतार-चढ़ाव में रमने लगे
उन्हीं के साथ हा-हा, ही-ही करने लगे

अब टी-वी भी बहुत दूर की चीज़ हो गयी है
रिमोट से चलते-चलते खुद ही रिमोट हो गई है

आज
रिमोट से छोटी
हथेली से चिपकी
4 ईंच की स्क्रीन में ही हमारी दुनिया सिमट कर रह गयी है
अगर आप 4 ईंच की स्क्रीन में खुद को घुसोड़ सके तो आप का अस्तित्व है,
वरना आप का होना न होना कोई मायने नहीं रखता है

पाँच घर छोड़ कर रहने वाला यह नहीं जानता कि आप दस दिन से गायब है
लेकिन उसे पूरी जानकारी है कि
आठ हज़ार मील की दूरी पर
उसकी मौसी के बेटे की
कुछ मिनट पहले कॉलेज जाते वक़्त बस छूट गई है

वे आपके सामने से निकल जाएंगे
लेकिन आपको पहचानेगे नहीं
उनसे बात करनी हो तो
आवाज़ देने से काम नहीं चलेगा
ट्वीट करना होगा
क्योंकि वे कान में प्लग लगाए
पहले ही बहरे हो चुके हैं

सिएटल । 513-341-6798
28 जनवरी 2012
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वाईपर = wiper
मेपल = maple
स्टारबक्स = starbucks
रिमोट = remote
ट्वीट = Tweet

Saturday, January 21, 2012

आज मौसम बड़ा बेईमान है

आज मौसम बड़ा बेईमान है
आनेवाला कोई चुनाव है

खाली-पीली नेता बक रहे हैं
टीवी-रेडियो पे लड़-मर रहे हैं
एक दूजे का करते अपमान हैं

बारी-बारी से सब बिक रहे हैं
सेठ-साहूकार चैक लिख रहे हैं
लाखों-करोड़ों के इनके अभियान हैं

ऐ मेरे यार, ऐ वोट-वाले
दे मुझे वोट, कर देश हवाले
मेरे हाथों ही इसका कल्याण है

(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

Friday, December 9, 2011

कभी पलकों पे आँसू हैं

कभी पलकों पे आँसू हैं, कभी लब पे शिकायत है
मगर ऐ अमरीका फिर भी मुझे तुझ से मोहब्बत है

जो आता है, वो रोता है, ये दुनिया सूखी-साखी है
अगर है ऐश तो घर पे, जहाँ मनती दीवाली है
मगर इण्डिया नहीं जाना, अभी बनना सिटीज़न है
कभी पलकों पे आँसू हैं...

जो कमाता हूँ, वो खप जाए, बड़ी थोड़ी कमाई है
शेयर पे हाथ भी मारे, मगर पूँजी गवाई है
बने मिलियन्स थे ये सपने, मगर अब कर्ज़ किस्मत है
कभी पलकों पे आँसू हैं...

गराज में कार है, लेकिन मैं दफ़्तर जाऊँ बस लेकर
स्कूल के बच्चे की माफ़िक़, लदे बस्ता मेरी पीठ पर
फ़र्क बस इतना कि माँ नहीं, बीवी बाँधती टिफ़िन है
कभी पलकों पे आँसू हैं...

(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)
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इण्डिया = India = भारत
सिटीज़न = citizen
मिलियन्स = millions
गराज = garage
बस = bus
बस्ता = backpack
टिफ़िन = tiffin/lunch