Sunday, March 17, 2013

मेरी हथेली का तिल

मेरी हथेली का तिल
उतना ही बड़ा है
जितनी कि तुम
(उम्र में!)


लेकिन
ये
वक्त के साथ
बदला नहीं

न रूप में
न रंग में
न ही किसी और ढंग में

आज भी
जब कोई बात कहता हूँ
तो सुन लेता है
पलट के जवाब नहीं देता है


जब चाहूँ
इसे देखूँ न देखूँ
जब चाहूँ
इसे चूमूँ न चूमूँ
न बुरा मानता है
न मनमुटाव करता है


बस एक बात की कमी है
अपने आप कुछ नहीं करता है
सारी बाज़ी
मेरे हाथ में दे रक्खी है


17 मार्च 2013
सिएटल ।
513-341-6798

Thursday, March 14, 2013

जहाँ धुआँ है वहाँ आग भी होगी

वोट डलें. आग लगी. धुआँ हुआ.
और इस कविता का जन्म हुआ
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जहाँ धुआँ है वहाँ आग भी होगी
जले हुए पुरजों की भरमार भी होगी


किसने किस का नाम लिखा था
किसने किस का साथ दिया था
कौन जानता था कि
ये बातें खतरनाक भी होगी


जिन्हें लिखने में एक वक़्त लगा था
जिन्हें लिखते वक़्त एक स्वप्न जगा था
कौन जानता था कि
पलक झपकते ही वे राख भी होगी


आग-पानी से ये रिश्ता है कैसा
एक जलाए, एक गलाए
कौन जानता था कि
जीवनदाता के हाथो ज़िंदगी बर्बाद भी होगी


हम और आप बने फिरते हैं
न जाने किस तैश में तने रहते हैं
जबकि सब जानते हैं कि
देह एक-न-एक दिन ख़ाक भी होगी


14 मार्च 2013
सिएटल ।
513-341-6798
 

Tuesday, March 5, 2013

अगरबत्ती जली है

अगरबत्ती जली है
तो राख भी होगी
अगर बत्ती जली है
तो रात भी होगी


है दुनिया मेरी
कुछ ऐसी ही यारो
कि आज शह है
तो कल मात भी होगी


जन्नत, जहन्नुम
या दोजख है जो भी
सोचता हूँ इनसे
कभी मुलाकात भी होगी


आँखों में किसी की
कोई कब तक रहेगा
सुबह होते ही
आँखें साफ़ भी होगी


मुझको यकीं था
उसको नहीं
कि ज़ुल्फ़ों में उसकी
मेरी शाम भी होगी


5 मार्च 2013
सिएटल ।
513-341-6798

Saturday, March 2, 2013

बोल हैं कि वेद की ऋचाएँ?

बोल हैं कि वेद की ऋचाएँ?
समझने लगूँ तो समझ न आए
बोलने वाली बस इतराए
इधर-उधर मैं भटकूँ हाए
कोई तो हो जो सार बताए


लगूँ गले या तकूँ दिन रात?
'मीट' खाऊँ या खाऊँ सलाद?
बनूँ अंग्रेज़ या बनूँ प्रहलाद?
अगले जन्म की बाट जोहूँ
या इसी जन्म में होगा मिलाप?


हैं ऋचाएँ कितनी उलझी-उलझी
भगवान जाने कितनी सच्ची, कितनी झूठी
इनको पढ़ के न बढ़े उत्साह
लाखों लोग जो हैं बेरोज़गार
होता नहीं उनका उद्धार


कर्क रोग मधुमेह बीमारी
क्या हरेगी ये हर व्यथा हमारी?
क्या इनमें हैं कोई ऐसे 'फ़ंडे'
जिन्हें पढ़ के हम गाड़ दे झंडे?
दुनिया में हम नाम कमाए
और हर्षित-हर्षित हरि गुण गाए?



2 मार्च 2013
सिएटल । 513-341-6798

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मीट = meat
फ़ंडे =  interesting facts or concepts

 

Wednesday, February 20, 2013

Carnival Triumph

कर ले बातें और घमंड तू
घमंड से न बच पाएगा
होगा खतरा सामने तेरे
घमंड चूर हो जाएगा


तेरा अपना मल ही तुझसे
साफ़ नहीं हो पाएगा
होगा बैठा जहाज पे लेकिन
तट तक नहीं पहुँच पाएगा
मंगल-चाँद पे जाने वाले
चाँद खुजा बस पाएगा


पैसा-कौड़ी, ओहदा-रूतबा
सब का सब मिट जाएगा
हज़ार डॉलर की रोलेक्स न रूके
तू तो लेकिन चुक जाएगा
आसमान में उड़ने वाले
मिट्टी में मिल जाएगा


(इंदीवर से क्षमायाचना सहित)
20 फ़रवरी 2013
सिएटल ।
513-341-6798
Carnival Triumph Story

Wednesday, February 13, 2013

तुम सोचती होगी

तुम सोचती होगी
कि मेरा बुखार उतर गया होगा
तुम्हारा सोचना वाजिब भी है
पिछले आठ महीनों से मैंने तुम्हें फोन जो नहीं किया
और ना ही जन्मदिन की बधाई दी
या नव-वर्ष की

लेकिन
शायद तुम यह नहीं जानती
कि जब दर्द हद से गुज़र जाता है
तो दर्द ही दवा बन जाता है

अब मुझे
न तुम्हारी
न तुम्हारी आवाज़ की
न तुम्हारी तस्वीर की
किसी की भी ज़रूरत नहीं है

अब मैं हूँ तुम
और तुम हो मैं

सुबह से लेकर शाम तक
शाम से लेकर सुबह तक
तुम
हर पल
मेरे साथ हो

हाँ, बाबा, हाँ
सच, और पूरा सच
देखो,
तुम्हारा अहसास
कोई नाक पे रखा चश्मा तो है नहीं
कि रात को सोते वक़्त उसे उतार के रख दूँ!

और हाँ
मैं तुम्हें भूला नहीं
और न ही भूला सकता हूँ
लेकिन गाहे-बगाहे फिर भी याद ज़रूर कर लेता हूँ
उस बुद्धू की तरह
जो चश्मा पहने हुए है
फिर भी चश्मा ढूँढता रहता है

Sunday, February 10, 2013

जब पढ़ीं डायरियाँ

जब पढ़ीं डायरियाँ
तो समझ में आया
क्या होता है
मानसिक 'डायरिया'


'एबिट्डा' में
मैं कुछ ऐसा फ़ंसा
कि इब्तिदा में ही
अटक गया


'एस-ए-टी' के 'ऐसे' देखे
ऐसे-ऐसे अनेक से
कि पैसा-वैसा कुछ भी नहीं
प्रेम हमें प्रेम से


'ईनकम' कम है
और टैक्स है 'हाय'
चारों तरफ़ बस
यही है हाय


सुरसा जैसी
खर्च की खाई
पाटते-पाटते
मुँह की खाई


कई बार सोचा
'फ़ेक' जीवन फ़ेंक दूँ
लेकिन हर बार यही हुआ
कि चलो एक दिन और देख लूँ


10 फ़रवरी 2013
सिएटल ।
513-341-6798

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'एबिट्डा' = EBITDA = earnings before interest, taxes, depreciation, and amortization
एस-ए-टी  = SAT = Scholastic Apptitude Test
ऐसे = essay
हाय = high
फ़ेक = fake