Thursday, February 4, 2021

भटका जहान है

https://youtu.be/MmdeZE_bsVM 


दुनिया में देखो फैला कैसा अज्ञान है

भटके हैं सब, भटका जहान है


चाहे बुझा दे कोई दीपक सारे

प्रीत बिछाती जाए राहों में तारे

फिर भी प्रेम से डरता इंसान है


डूबे ही रहते हैं नशे में सारे

इस-उस की जय करते  साँझ-सकारे

शक्ति से ख़ुद की ख़ुद ही अनजान है


आँखें झुका के वो करता है बातें

हाथ फैला के बस भीख ही माँगे

घंटी बजा कर घंटों करता गुणगान है


(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 4 फ़रवरी 2021 । सिएटल 


हर दिन याद आओगे, तुम जेफ़ बेज़ोस

https://youtu.be/vU6mE8eAH_Y 


हर दिन याद आओगे, तुम जेफ़ बेज़ोस

जग में काम आएगा, अमेज़ॉन हर रोज़

दूजे के हाथों में, देकर अपनी डोर

सपने सुहाने तुम करोगे सच और


अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए

तुमने तो फिर भी फूल लाख खिलाए

हो मार्केट मंदा, हो चौपट कोई धंधा 

तुम तो फ़ौलादी तुम न घबराए

तरम्पम,

वादे जो किए वो कर के रहे हो

बन के रोल मॉडल तुम, हुए बहुत अनमोल


सस्ते में बेची पहले कई किताबें 

बाद में बेच दिए बादल कारे-कारे

ये कमाल की जोड़ी, थी दूर की कौड़ी 

हर तरफ़ था फायदा, कठिनाई भी थोड़ी 

तरम्पम

सर को उठाए तुम लड़े दिन और रात

नैनों से नैना जोड़, दी निशानी छोड़ 


(मजरूह से क्षमायाचना सहित) 

राहुल उपाध्याय । 3 फ़रवरी 2021 । सिएटल 

Wednesday, February 3, 2021

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की

बहुत खूबसूरत मगर बावली सी

चलो चेक करूँ स्नेपचेट डाली ही होगी

कह-कह के फोन उठाती तो होगी

कोई कॉल शायद मिस हो गया हो

स्मार्ट फोन बार-बार देखती तो होगी

और फिर फोन की घंटी बजते ही वो

उसी फोन से चिपक जाती तो होगी


चलो पिंग करूँ जी में आता तो होगा

मगर उंगलियां कँप-कँपाती तो होंगी

फ़ोन हाथ से छूट जाता तो होगा

उमंगें फ़ोन फिर उठाती तो होंगी

मेरे नाम खास ईमोजी सोचकर

वो दांतों में उँगली दबाती तो होगी


चलो देखूँ क्या कुछ नया हो रहा है

कह-कह के व्हाट्सेप पे आती तो होगी

कोई पोस्ट शायद मिस हो गई हो

बार-बार टाईम-लाईन टटोलती तो होगी

मेरी पोस्ट में ख़ुद को कविता में पाकर

बदन धीमे धीमे सुलगता तो होगा

लिखूँ कमेंट जी में आता तो होगा

कीबोर्ड पे उंगली थरथराती तो होगी

कई बार मन की उमंगो को लिख कर

वो एक-एक कर सब मिटाती तो होगी


(कमाल अमरोही से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 3 फ़रवरी 2021 । सिएटल 




हाथ नहीं आग से जलते मेरे

https://youtu.be/DB9q3UpV65Q


आजकल हाथ नहीं आग से जलते मेरे

बोलो देखा है कभी तुमने मुझे डरते हुए


जाने क्या होता है हर हाल में ख़ुशी होती है

दिन में ख़ुशी होती है और रात में ख़ुशी होती है

थाम लेता हूँ हर तूफ़ान को हँसते हुए 


जब भी जुल्म-ओ-सितम कोई ढाता है

हौसला हो तो वो भी गुज़र जाता है

हमने देखा है जंजीरों को गलते हुए


कल की बात नहीं, हर बार यही होता है

वो ही पाता है इन्सान जो बोता है

हमने देखा है लुटेरों को लुटते हुए


(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 1 फ़रवरी 2021 । सिएटल 

Tuesday, February 2, 2021

दूरी

ऑनलाइन सब भेजा जा सकता है

डाटा ख़त्म हो जाए तो 

यहाँ से बैठे-बैठे

रिचार्ज कराया जा सकता है

पानी गर्म करने वाली इमरशन रॉड 

ख़राब हो जाए तो

नई डिलीवर करवाई जा सकती है

चूड़ी-बिंदिया-प्लाजो-चप्पल 

सब भिजवाए जा सकते हैं

पिज़्ज़ा-भटूरे-भुट्टे भी


लेकिन 

चाकू चुभ जाए

उँगली से खून निकल आए

तो मुँह में दबाकर 

खून सोख नहीं सकता

रोक नहीं सकता 

काँधे पर सर रख कर

बालों में उँगलियाँ नहीं फेर सकता

पीठ थपथपा कर 

कच्ची नींद में नहीं ले जा सकता

अधखुली आँखों को

गर्म साँसों को 

अपनी गर्दन पर

महसूस नहीं कर सकता

उन्हें विश्वास नहीं दिला सकता कि

मैं हूँ 

मैं यहीं हूँ

मैं यही हूँ 


स्क्रीन के कितना ही पास चला जाऊँ 

7,384 मील की दूरी मिट नहीं सकती


राहुल उपाध्याय । 2 फ़रवरी 2021 । सिएटल 





Monday, February 1, 2021

इतना भरोसा है

रोती है वो 

ढेर सारे

सच्चे आँसू 

जब भी मैं बात करता हूँ 

मेरे जाने की 


जबकि वह जानती है कि 

सबको एक दिन जाना है 

मुझे उससे पहले 

बहुत पहले 

और यह भी कि 

वह मेरे बिना जी लेगी 

बख़ूबी जी लेगी 

जैसे जी रहीं हैं 

कई विधवाएँ 

और प्रेमिकाएँ


बहुत दुःख होता है 

उसे रोता देख कर 

और एक सुकून भी 

कि मैं उसके बिना

न जीता हूँ

न जी सकूँगा 

न जीऊँगा


एक्चुअरियल साइंस का

मुझ पर

और मुझे उस पर

इतना भरोसा है


राहुल उपाध्याय । 1 फ़रवरी 2021 । सिएटल 



मेरी ज़िन्दगी

मेरी ज़िन्दगी में रोज़ 

कुछ न कुछ अच्छा होता है 

कभी बहुत अच्छा 

तो कई बार इतना अच्छा 

कि बताए ना बने 


कहूँ तो कोई माने ना 

माने तो समझे ना 

समझे तो जले बिना रह सके ना 


कभी कभी लगता है

यह सब एक दिवास्वप्न है 

मेरी ही रची एक दुनिया है 

जिसमें ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं 


कि फूल खिलते हैं

तो मेरे लिए 

चाँद-तारे निकलते हैं 

तो मेरे लिए 


अपनी बाँहों को 

इतना भरा कभी न देखा 

संगीत

इतना सुरीला कभी न सुना 

पोर-पोर से

इतना प्रेम कभी न फूटा


राहुल उपाध्याय । 1 फ़रवरी 2021 । सिएटल