Thursday, February 28, 2008

मन

आँखों को क्या चाहिए?
कुछ छींटें पानी के
दो कांटेक्ट लेंस
या एक शानदार चश्मा

चेहरे को क्या चाहिए?
एक मग पानी
और थोड़ा सा साबुन
जरा सी क्रीम
जरा सा लोशन

कान को क्या चाहिए?
मात्र दो तार
जो सुनाते रहे
संगीत लगातार

पांव को क्या चाहिए?
दो जोड़ी आरामदायक जूतें
एक दौड़ने के लिए
एक दफ़्तर के लिए

हाथ को चाहिए
एक घड़ी
उंगली को चाहिए
एक अंगूठी
गले को चाहिए
एक हार
बदन को चाहिए
कपड़े दो-चार

जीभ को चाहिए
थोड़ी सी चाट
थोड़ी सी मिठाई
और एक गरमागरम चाय

पेट को चाहिए
दो वक़्त का भोजन

शरीर की ज़रुरते हैं
बस इतनी ही
पर मन?
इसका पेट तो कभी भरता ही नहीं

इस मन, इस आत्मा का क्या करु?
इसे किस तरह से खुश करु?
इसे कैसे संतुष्ट करु?

ये शरीर तो नश्वर है
एक दिन मिट भी जाएगा
मगर आत्मा?
एक अच्छी-खासी मुसीबत है!
क्यूंकि ये तो कभी मरती भी नहीं!

सिएटल,
28 फ़रवरी 2008

Wednesday, February 27, 2008

आए-जाए


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जब कभी आग लग जाए
और इंसान जल-जला जाए
तो वो हाय-हाय करता है

जब कभी बाढ़ आए
या जलजला आए
तो भी वो हाय-हाय करता है

जलजला आए
या जल-जला जाए
हर सूरत में इंसान हाय-हाय करता है

और अगर कोई न आए और न जाए
तो इंसान अकेलेपन से घबराता है

निष्कर्ष यहीं निकला कि
चाहे कुछ भी हो जाए
इंसान की फ़ितरत ही ऐसी है कि
वह हर सूरत में हाय-हाय करता है

सिएटल,
27 फ़रवरी 2008

Tuesday, February 26, 2008

तरक्की के Side-effects


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जूतें उतरतें हैं
जेबें खाली होती हैं
ये सब पहले मंदिरों में होता था
आजकल एयरपोर्ट पर भी होता हैं

5 हज़ार मील की दूरी
इंसान 10 घंटे में तय कर लेता है
चाहे अंधियारी रात हो
या लगातार बरसात हो
पर पानी की बोतल से फिर भी डरता है

ज़हर तो हमेशा से मारता आया है इंसान को
पर आजकल वो चीनी खाने से भी डरता है

Friday, February 22, 2008

संस्कृति: विकास या विनाश?


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

नौकरी करते करते
बच्चे deliver करती है माँ
जैसे एक project deliver होता है
वैसे ही बच्चे भी deliver करती है माँ

उसकी भी एक due date होती है
इसकी भी एक due date होती है

सारा जिम्मा होता है अस्पताल पर
सारी रस्में रख दी जाती हैं ताक पर

जिस दिन घर आता है नवजात शिशु
न होता है जश्न, न बजता है ढोल,
न चढ़ती है प्रसाद, न बंटती है मिठाई
न होता है स्वागत, न घर आता है कोई देने बधाई
न होती है पूजा, न खुशी की लहर
बस चिंता रहती है चलेगा कैसे घर?

कहीं ज्यादा, तो कहीं कम, छुट्टी मिलती है नपी-नपाई
तुरंत लौट जाते हैं काम पर ताकि कटे एक भी न पाई

कभी घंटो में तो कभी हफ़्तों में
ज़िंदगी बिताते है हिस्सों में
8 घंटे बिस्तर, 8 घंटे दफ़्तर
बाकी भागदौड़ में इधर-उधर

ज़िंदगी हो गई जैसे कोई soap serial
सब कुछ है virtual, नहीं कुछ भी real

Discovery channel के जरिए
जैसे होती है बच्चों की हाथी से भेंट
वैसे ही Web-cam की बदौलत
होती है बच्चों की दादा-दादी से भेंट

Battery झूला झुलाती है
CD सुनाती हैं लोरियां
मां-बाप भटकते हैं सड़को पर
और TV सुनाता है कहानियां

जब कभी बचपन याद आएगा
तो बच्चे को क्या याद आएगा?
वो AA की battery, जिसने झूला झुलाया उसे?
वो चमचमाती CD, जिसने लोरी सुना सुलाया उसे?
या वो TV पर सुनी हुई Elmo या Barney की नसीहतें?
या वो video पर देखी हुई Tom and Jerry की शरारतें?

जहां नौकरी करते करते माँ deliver करती हैं बच्चे
वहां ईमान-धरम, मान-मर्यादा बचे भी तो कैसे बचे?

जहां दही जमाने के लिए भी नहीं culture मयस्सर
उस ज़माने में किसी को संस्कृति की हो क्यो फ़िकर?

जिस समाज में हर एक ज़रुरत की service है
वह समाज समाज नहीं महज एक दरविश है

आज यहां है तो कल वहां
घर पर नहीं कोई रहता यहां
हज़ारों मील दूर रहते हैं अपने
एक दूसरे से मिलने के पालते हैं सपने

घर से भागे दौलत के पीछे
भाषा त्यागी संगत के डर से
कपड़े बदले मौसम के डर से
आभूषण उतारे चोरी के डर से
ग्रंथ छोड़े कट्टरता के डर से
दीप बंद हुए आग के डर से
शंख-घंटीया बंद हुई पड़ोसी के डर से
भोजन पकाना छोड़ा बदबू के डर से
रस्मे दफ़ा हुई सहूलियत के नाम पर
बचा ही क्या फिर संस्कृति के नाम पर?

जिन पर होना चाहिए हमें नाज़ आज
उन सब पर क्यूं हमें आती हैं लाज?

पहनते हैं कपड़े मगर किसी और के
खाते हैं खाना मगर किसी और का
बोलते हैं भाषा मगर किसी और की
करते हैं काम मगर किसी और का
आखिर क्या है अपना जो है इस दौर का?

जिन पर होना चाहिए हमें नाज़ आज
उन सब पर क्यूं हमें आती हैं लाज?

क्या दे जाएगे हम बच्चों को धरोहर?
प्रदूषण की कालिख में नहाए महानगर?
या कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की कुछ वो किताबें
जो चार साल में ही हो जाए obsolete?
या फिर 6 शून्य का bank balance
जो एक घर में ही हो जाए deplete?

न चोटी, न तिलक, न जनेउ है
न सिंदूर, न बिछुए, न मंगलसूत्र है
मां-बाप, सास-ससुर के चरण स्पर्श
न करती है बहू, न करता पुत्र है

गणेश की मूर्ति, नटराज की मूर्ति
मात्र साज-सजावट की वस्तु है

बचा ही क्या फिर संस्कृति के नाम पर?

होटल जा कर खा लेना छौला-समोसा?
कभी इडली-सांभर, तो कभी सांभर-डोसा?
कभी आलू पराठा तो कभी मटर-पनीर?
गाजर का हलवा या चावल की खीर?

dieting और diabetes के बीच ये भी एक दिन खो जाएगे
संस्कृति के नाम पर हम बच्चों को अंत में क्या दे जाएगे?

भला हो Bollywood की फ़िल्मों का
कि होली-दीवाली के त्योहार हैं अब भी जीवित
भले ही हो सिर्फ़ सलवार-कमीज़-साड़ी-कुर्ते
और फ़िल्मी गानों पर नाचने तक सीमित

एक समय हम समृद्ध थे, संस्कृति की पहचान थे
आद्यात्म, दर्शन, कला और नीति की हम खान थे
आयुर्वेद और औषधविज्ञान थे
ब्रह्मास्त्र और पुष्पक विमान थे
नालंदा विश्वविद्यालय विश्वविख्यात था
दूर दूर से ज्ञान पाने आते जहां विद्वान थे

नालंदा क्यूं रह गया बस एक खंडहर?
विलीन क्यूं हुए इंद्रप्रस्थ जैसे नगर?

कब और कैसे क्या हो गया?
सारा ऐश्वर्य हवा क्यूं हो गया?
जिस देश-समाज ने विश्व को शून्य दिया
वो किस तरह हर क्षेत्र में शून्य हो गया?

असली कारण तो सही ज्ञात नहीं
पर शायद हुआ ये अकस्मात नहीं

बची-खुची संस्कृति भी
हमारे सामने ही
विलुप्त हो रही आज है
शायद उस समय वो भी
इस सच्चाई से बेखबर थे
जिस तरह से बेखबर हम आज हैं
 
परिवर्तन है प्रकृति की प्रवृत्ति
और संस्कृति भी अवश्य है बदलती
मगर क्या ये आवश्यक है कि
शून्य ही हो इसकी नियति?

सिएटल,
22 फ़रवरी 2008
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नवजात = newborn
मयस्सर = available
फ़िकर = फ़िक्र, worry, concern
दरविश = दरवेश, mendicant, travelling beggar
आभूषण = jewelry
कट्टरता = fundamentalism
समृद्ध = prosperous
ऐश्वर्य = splendor
विलीन = disappear
शून्य = zero
ज्ञात = known
अकस्मात = suddenly, accidentally
विलुप्त = disappear
परिवर्तन = change
प्रकृति = nature
प्रवृत्ति = tendency
अवश्य = sure
आवश्यक = necessary
नियति = destiny

Tuesday, February 19, 2008

बदली बदली जल में


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

बदली जल बन बन में गई
बन में खिली हर शाख
बदली बन जल न पाती तो
पाती-पाती जल कर
बन बन जाता राख

समंदर जल जल कर बदली बने
बदली फिर जल बन जाए
इसी अदला-बदली से
हमारी जीवन-ज्योति जल पाए

परिवर्तन प्रकृति की प्रवृत्ति
ये है पक्की बात
सुखी रहे हर प्राणी जो
कर ले इसे आत्मसात

सिएटल,
18 फ़रवरी 2008
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Glossary:
बदली = 1. cloud 2. to convert
जल = 1. water 2. burn
बन = 1. to become 2. forest/jungle
पाती = 1. could 2. leaf
आत्मसात = imbibe

Monday, February 18, 2008

स्वामी के दीवाने


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैं
सब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैं

इतनी बेवकूफ़ी भरी हैं इंसानों में
कि पढ़े-लिखे भी गधे हो जाए
स्वामीजी जो नज़र आ जाए चैनल पर
तो पांच बजे भी उठ के खड़े हो जाए
छोटे-बड़े सब लगते दुम हिलाने हैं
हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैं
सब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैं

इक हल्का सा इशारा इनका
किसी भी रोगी को चंगा कर दे
इस तरह की आस के बदले में
जो जान और माल फ़िदा कर दे
ऐसे भक्त इन्हे और फ़ंसाने हैं
हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैं
सब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैं

कभी लंदन तो कभी अमरीका
नहीं ढाका या फिर अफ़्रीका
सिर्फ़ रईसो को भक्त बनाते हैं
आलिशान होटलों में शिविर लगाते हैं
और दावा ये कि गीता के श्लोक समझाने हैं
हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैं
सब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैं

(कैफ़ी आज़मी से क्षमायाचना सहित)

कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कभी किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता

जिसे भी देखिए वो अपने हाल में गुम है
कार मिली है मगर कारपूल नहीं मिलता

तेरे जहां में ऐसा नहीं कि जॉब न हो
कहीं 'सेलरी' तो कहीं 'टाईटल' नहीं मिलता

हुआ है भारत छोड़ो आंदोलन अब कामयाब
मेरे वतन में एक भी होनहार नौजवां नहीं मिलता

अमेरिका में है हर चीज हासिल
मगर आसानी से आशियां नहीं मिलता

दुनिया है आज कम्प्यूटर के दम से
रह जाता दफ़्तरों में ही 'गर चूहा नहीं मिलता

उखाड़ देते हैं कुदरती हरियाली को
मनचाहा बाग बनाने वाला बागबां नहीं मिलता

उनको मिले ख़ुदा जिन्हे हैं ख़ुदा की तलाश
मुझे तो किसी भी मंदिर में मेरा जूता नहीं मिलता

कहता है ज़माना कि राहुल हो गया पागल
मस्जिद में भगवान और मंदिर में ख़ुदा नहीं मिलता

एक निर्दोष स्वर्ण हिरण को मारने वाले के अलावा
मेरी शाकाहारी माँ को भी पूजने के लिए दूजा नहीं मिलता

गाँधी ने पूजा क़ातिल को, माँ ने पूजा शिकारी को
नेता तो दूर यहाँ तो ढंग का देवता नहीं मिलता

रात के बाद सुबह की ये रीत मुझे रास न आई
न होती सुबह तो सपना टूटा नहीं मिलता

सारे दिन शाम का इंतज़ार किया
भरी दोपहर तो सुबह का भूला नहीं मिलता

रह जाती मेरी रचना गुमनामी में
आप कदरदानों का 'गर सहारा नहीं मिलता

(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)