न काम है न क्रोध है
न मद है न लोभ है
कर्मयोग के भक्त हैं
सारी वासनाओं से मुक्त हैं
न धन है न दौलत है
न ज़मीन-जायदाद है
न जात है न पांत है
न कोई वाद-विवाद है
न माया है न मोह है
न किसी से सरोकार है
न स्वामी है न नौकर है
न कोई मोटरकार है
बुझिए तो सही
किसका ज़िक्र इस बार है?
ये भी हाड़-मांस के पुतले हैं और ये भी तो नश्वर हैं
लेकिन मूर्ति-मंदिर आदि बनाकर पूजते नहीं ईश्वर हैं
मनुष्य हर क्षेत्र में स्वयं को मान बैठा प्रवीण है
लेकिन इनकी तुलना में हम और आप क्षीण हैं
[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। ध्यान से देखे तो साफ़ नज़र आ जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'. या अन्य पहेलियां । आप चाहे तो इसका हल comments द्वारा यहां लिख दे। या फिर मुझे email कर दे इस पते पर - upadhyaya@yahoo.com ]
Tuesday, April 22, 2008
पहेली 17
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:33 AM
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Monday, April 21, 2008
सृष्टि का निर्माण
सृष्टि का निर्माण सुनो bug-free नहीं है
तभी तो निर्माता को मिली degree नहीं है
कहीं है समंदर तो कहीं पर है जंगल
कहीं है बरफ़ तो कहीं है मरुस्थल
जहाँ एक भी पेड़ की inventory नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
करता है क्या कुछ पता नहीं है
चाहता है क्या वो भी पता नहीं है
उसके ठौर-ठिकाने की directory नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
कभी सतयुग बनाता है तो कभी कलयुग बनाता
खुद ही बचाता है और खुद ही सताता
consistent performance की history नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
कराता है गड़बड़ और फिर भेजता है अवतार
मानो हो जैसे ये कांग्रेस या बुश की सरकार
जिसमें moral conscious नाम की ministry नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
नये version में बंदर आदमी बन गए हैं
साथ में उल्लू के भी कुछ गुण आ गए हैं
upgrade की progress खास satisfactory नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
आज से दो हज़ार साल पहले उसने भेजा था 'बेटा'
अगली release की प्रतीक्षा में अभी तक ज़माना है बैठा
लगता है subject matter पर उसकी mastery नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
सुना है उसके infinite हैं powers
उसके ही इशारे से खिलते हैं flowers
पर मेरे दर्द की दवा की dispensary नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
जो होना चाहिए था वही तो हो रहा है
जो विधाता ने ठानी थी वही तो हो रहा है
global warming की भी जिम्मेदार industry नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
धरती पर प्रलय तो आएगा एक दिन
सूरज भी भस्म हो जाएगा एक दिन
प्रकाश की ये perpetual battery नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
हम आए कहाँ से हमें जाना कहाँ है?
bug ने भूलाया हमें सब कुछ यहाँ है
सीधी सी बात है कोई mystery नहीं है
सृष्टि का निर्माण …
सिएटल,
21 अप्रैल 2008
============
Glossary:
सृष्टि = nature, world
निर्माण = construction
निर्माता = creator
Bug-free = with no errors
Degree = an honorary recognition of achievement.
मरुस्थल = desert
बेटा = 1. son 2. A beta version is the first version released outside the organization or community that develops the software, for the purpose of evaluation or real-world black/grey-box testing.
Inventory = a catalog
ठौर-ठिकाने = wherabouts
प्रलय = apocalypse, any universal or widespread destruction or disaster
Friday, April 18, 2008
पहेली 16
जिससे आनी चाहिए थी खुली हवाएं
वो चंगुल में सारा जहां जकड़ रहा था
इतनी जमा हो गई थी दौलत
कि सब के सामने अकड़ रहा था
इंटरनेट ने जब दी इसे चुनौती
इन्डस्ट्री को एक राहत मिली है
टर्मिनल पेशियंट को जैसे
रामबाण दवा की नवीन डोज़ मिली है
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Posted by Rahul Upadhyaya at 12:38 PM
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काव्य का व्याकरण
व्याकरण हो या फिर वो कर्ण प्रिय हो
तब जा कर ही कोई काव्य दिव्य हो
ऐसा तो कोई विधान नही है
कविता लिखने की कोई विधि नही है
कविता कविता है
कोई दाल-भात नही है
न पकाने के नियम है
न बरतना एहतियात है
कि अगर ज्यादा मिर्ची पड़ गई
तो किसी का हाजमा बिगड़ जाएगा
नमकीन में अगर चीनी डाल दी
तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा
अरे कवि, तुम डाल कर तो देखो
ज्यादा से ज्यादा
एक पन्ना व्यर्थ हो जाएगा
कवि का संसार बहुत बड़ा है
किसी एक दायरे में समाता नहीं है
सामने हो पकवान
फिर भी खाता नहीं है
बरसती है बरसात
साथ में होता छाता नहीं है
बुरा भला कहने से
कभी शरमाता नहीं है
और कोई कुछ कह दे
तो बिलख जाता नहीं है
बंध के रह जाएगा
कवि किसी काव्य शास्त्र में
ऐसी कभी आशा नही थी
जब पहला दोहा लिखा गया
तब दोहे की परिभाषा नहीं थी
पहले कवि लिखता है रचना
फिर बाद में होती है उसकी आलोचना
आलोचक-समीक्षक ढूंढते हैं pattern
मिल जाए कुछ तो उसे कहते हैं शैली
बनाते हैं नियम
लिख डालते हैं शास्त्र
ठीक वैसे ही जैसे
Stock market के crash के बाद
तमाम analyst लगाते हैं अटकलें
और रच डालते हैं एक पूरा शास्त्र
जिसके नियम में शेयर बाज़ार बंधता नहीं है
हर दिन एक नया रुप करता है धारण
ये तो था महज एक उदाहरण
पर क्यों नाहक ढूंढते हो कारण
जो लिखना है उसे लिखते चलो
लिखो, पढ़ो और आगे बढ़ो
वाह-वाह के चक्कर में कभी न पड़ो
ये ज़रुरी नहीं कि
पाठक-श्रोता सारे मस्त हो
या सर पर किसी का कोई वरद-हस्त हो
कविता कविता है
चाहे जैसी बन पड़ी है
चाहे किसी को लगे अच्छी
या कोई कहे कि ये सड़ी है
राहुल उपाध्याय | 18 अप्रैल 2008 | सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:38 AM
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Labels: world of poetry
Tuesday, April 15, 2008
15 अप्रैल
काम कर कर के कर दु:ख गए
फिर भी सरकार को दया न आई
कर के नाम पर छीन रही
गिन गिन कर एक-एक पाई
किस तरह की सरकार है पाई
सरेआम लुट रही मेरी कमाई
तरह तरह के उलटे-सीधे
कर दिये नियम इसने खड़े
उधार लो तो कर घटे
बचत करो तो कर बढ़े
छोटे बड़े सब फ़ंसे
उलट-गणित के चक्कर में पड़े
चार प्राणी का परिवार है
और खरीद रहे घर बड़े-बड़े
कर से ही सरकार चले
कर से ही देश फूले-फले
माना चलो बात सही है
पर टेढ़ी-मेढ़ी क्यूँ चाल चले?
कर लेना है तो पहले ले लो
बाद में क्यूं मेरे पीछे पड़े?
accountant की दुकान चले
TurboTax की महिमा बढ़े
उम्मीदवार जितने भी खड़े
हिम्मत नही जो इनसे लड़े
मंदिर-मंदिर जा जा कर
सुना रहा मैं दुखड़े बड़े
राम, कृष्ण, दुर्गा आदि
जितने भी भगवान खड़े
कोई तो एक अवतरित हो
और आ कर इन्हें तमाचा जड़े
कभी तो हमें राहत मिले
15 अप्रैल से छुट्टी मिले
सिएटल,
15 अप्रैल 2008
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:49 PM
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Labels: news, US Elections
Monday, April 14, 2008
मैं घर जाने लगा हूँ
मैं घर में ही रहता हूँ और घर जाने लगा हूँ
मैं जहाँ हूँ वहीं मंज़िल पाने लगा हूँ
है सब कुछ यहीं पर
यहीं है यहीं पर
मैं खुद को खुद से मिलाने लगा हूँ
नही और कोई दूसरा जहां है
जो है वो यही है
यहीं है यहाँ है
मैं हर इक चीज को अपनाने लगा हूँ
न कोई मुझसे कहता है
न मैं किसी की सुनता
मैं अपने आप चिर-धुन गाने लगा हूँ
कोलम्बिया बेसिन के आसपास,
14 अप्रैल 2008
Posted by Rahul Upadhyaya at 7:10 PM
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Labels: intense
वीसा से वीसा तक
हुआ स्नातक, मिली दिशा
जैसे तैसे हथियाओ वीसा
वीसा आँफ़िसर से झूठ बोला
हनुमान जी को चढ़ा चोला
तिरुपति को दिया पैसा
तब जा के मिला वीसा
डाँलर को ही सदा पूजा
इसके सिवा न दिखा दूजा
पहले आया पासपोर्ट में वीसा
फिर आया पर्स में वीसा
अर्थ चंदन इतना घिसा
छा गई घोर निशा
अच्छा खासा कमाता था
हँसता था, हँसाता था
'लोन' लिया, 'लोनली' हुआ
सुख चैन उड़न छू हुआ
इरादा था बनूँगा राजा
बज गया मेरा ही बाजा
ये उलट-फेर कैसे हुआ?
किसकी लगी बद-दुआ?
धन के आगे भी जहान था
इससे मैं अनजान था
पापी पेट का दोष नहीं
मन को ही संतोष नहीं
बिल्डिंग ज़रूर बनी अच्छी थी
नींव मगर बहुत कच्ची थी
राहुल उपाध्याय | 14 अप्रैल 2008 | मोंटाना के गगन में
Posted by Rahul Upadhyaya at 7:06 PM
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Labels: Anatomy of an NRI, nri
