Tuesday, May 8, 2018
सभी कुछ है दुनिया में
सभी कुछ है दुनिया में
मगर ये कमी है
कि आँखों में इसकी
मुरव्वत नहीं है
मोहब्बत तो करते हैं
मोहब्बत करने वाले
मोहब्बत है कहने की
इजाज़त नहीं है
जो सच है वही हम
कहते हैं देखो
ये शिकवा-शिकायत-
अदावत नहीं है
समन्दर है दरिया में
सच तो यही है
बादल के पानी का स्रोत
ऐरावत नहीं है
शरीफ़ों की नगरी में
शरीफ़ ही शरीफ़ हैं
बस गले मिल के रोने की
फ़ुरसत नहीं है
(शैलेन्द्र से क्षमायाचना सहित)
8 मई 2018
सिएटल
मुरव्वत = मानवता
अदावत = दुश्मनी
ऐरावत = इन्द्र का हाथी
Posted by Rahul Upadhyaya at 7:23 PM
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Labels: parodies, Shailendra
Saturday, May 5, 2018
मेरे पिता का नाम
भारत में होता
भारत में रहता
भारतीय होता
भारतीय पासपोर्ट होता
तो
मेरे साथ
मेरे पिता का नाम भी होता
अब कोई नहीं जानता
मेरे सिवा
मेरे पिता का नाम
राहुल उपाध्याय | 5 मई 2018 | सिएटल
Friday, April 27, 2018
अँगूठे
हम सब एक हैं
कोई भी धर्म हो
देश हो
जात हो
उम्र हो
लिंग हो
सबके सब
स्मार्टफ़ोन में
मुँह छुपाए
रहे आँखें सेंक हैं
लेकिन मेरी मम्मी और मामी जैसे भी अनेक हैं
जिनमें अभी भी विवेक है
या यूँ कहिए कि ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं
इसलिए अँगूठे दिए नहीं टेक हैं
27 अप्रैल 2018
सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:27 PM
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Labels: digital age
Thursday, April 26, 2018
मेरा दिमाग़
मेरा दिमाग़
किसी नामी-गिरामी प्राईवेट स्कूल जैसा है
जिसमें
उन्हीं लोगों को दाख़िला मिल सकता है
जो मेरे नियमों का पालन कर सके
जो अच्छे तबके से हो
और जिन्हें इतनी समझ हो
कि जो मैं समझाऊँ
वे समझ सके
वरना
मेरा दिमाग़ नहीं ख़राब हो जाएगा?
26 अप्रैल 2018
सिएटल
Wednesday, April 25, 2018
फेसबुक-वेसबुक
फेसबुक-वेसबुक ऐप्स हैं सारी
ऐप्स की बातों का क्या
कोई किसीका नहीं ये झूठे खाते हैं
खातों का क्या
होगा फ़ोटो सामने तेरे
फिर भी नहीं बूझ पाएगा
लड़का है या लड़की बॉबी
तय नहीं कर पाएगा
रात-रात भर जागने वाले
दिन भर अब तू गाएगा
फेसबुक-वेसबुक ...
उठते-बैठते पिंग करेंगे
ताबड़तोड़ सब 'लाईक' करेंगे
होली-दीवाली और जन्मदिन
सब पर तुझको 'विश' करेंगे
'विश' करते-करते एक दिन
जीवन में विष घोलेंगे
फेसबुक-वेसबुक ...
अपने अब तू कान पकड़ ले
फेसबुक छोड़ कोई काम पकड़ ले
इस-उस ग्रुप में भटक न ऐसे
किताब उठा कोई किताब तू पढ़ ले
प्रेम से कह के सबको नमस्ते
राह पे अपनी आगे बढ़ ले
फेसबुक-वेसबुक ...
(इन्दीवर से क्षमायाचना सहित)
25 अप्रैल 2018
सिएटल
Tuesday, April 24, 2018
ताश की गड्डी
मैं वह सब हूँ
जो तुम मुझे सोचती हो
वफ़ादार, फरेबी
दयालु, ग़ुस्सैल
प्यारा, फूहड़
कमाल का जादू है!
जो तुम सोचती हो
वही पत्ता निकल आता है
मेरी ताश की गड्डी से
24 अप्रैल 2018
सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:39 PM
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Labels: relationship
Monday, April 23, 2018
काजल के निशान
शर्ट के कंधे पर
काजल के निशान
किसी ख़ुशनसीब को ही नसीब होते हैं
जब मन्नत पूरी हो जाती है
आँसू छलक ही जाते हैं
23 अप्रैल 2018
सिएटल
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