Sunday, January 17, 2021

इतवारी पहेली: 2021/01/17


इतवारी पहेली:


जीना है तो जी और मरना है # ##

क्या यही कह रहे हैं मोदी या ###


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya 


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 


सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 24 जनवरी को - उत्तर बता दूँगा। 


चूँकि इस बार पहेली के अंत में तीन शब्द है सो एक मदद:

यह पहेली 16 जनवरी 2021 के सन्दर्भ में है। 


राहुल उपाध्याय । 17 जनवरी 2021 । सिएटल


हल: तो मर / तोमर















Thursday, January 14, 2021

प्रेम का प्रताप

विद्यालय में मिले

वेलेण्टाइन से पहले

कई दिनों तक फिर मिलते रहे


सुन्दर जीवन

हाथ में हाथ लिए

नीलकमल सा और मनमोहक हुआ


सेठों से ज़्यादा अमीर हुए


प्यास बुझी या बढ़ी?

यार भी रखते हैं हिसाब कभी?

रच रहे हैं इतिहास अभी


कल की कोई चिंता नहीं 

रतजगे भी अब भाते हैं

ताबड़तोड़ स्नेपचैट पे जब बतियाते हैं


है ना प्रेम का यह प्रताप सही? 


राहुल उपाध्याय । 14 जनवरी 2021 । सिएटल 




इन्सान हैं हम पापी नहीं हैं

यहाँ देखें/सुनें:

https://youtu.be/bJsBcKWqQao


इंसान हैं तो डरना क्या 

जब इंसान हैं तो डरना क्या

इंसान हैं हम पापी नहीं हैं

पग-पग पल-पल डरना क्या


रोज़ हमें है जश्न मनाना

ग़म भी दे दे चाहे ज़माना 

जीत उसी की जो हार न माने

नैनों में जल भरना क्या 


जब तक साँसें आस रहेगी

शम्मा हमारी रोशन रहेगी

जब तक जीना तब तक जीना

चिंता की चिता पे मरना क्या


रूक न सकेगा काम हमारा

रोशन होगा नाम हमारा

ठान लिया जब कोई इरादा 

करने से उसे मुकरना क्या 


(शकील बदायुनी से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 14 जनवरी 2021 । सिएटल 


हुआ वस्ल और हम न फ़ना हुए

हुआ वस्ल और हम न फ़ना हुए

ज़िंदगी में कैसे-कैसे इम्तहां हुए


या कहूँ पुनर्जन्म इसे 

जो हम जुदा हुए 

 

होते एक तो निपट लेते हज़ारों से 

हैं दो तो ग़म भी दुगने अता हुए


ज़माने के खूँ से वाक़िफ़ हूँ मैं

अपने ही नहीं जो बेवफ़ा हुए


ग़म और मसर्रत पहलू जीवन के

अल्फ़ाज़ 'राहुल' ऐसे दफ़ा हुए 


राहुल उपाध्याय । 14 जनवरी 2021 । सिएटल 


वस्ल = मिलन

फ़ना = ख़त्म, विलीन

ख़ूँ = ख़ून 

मसर्रत = ख़ुशी 

अल्फ़ाज़ = लफ़्ज़ (शब्द) का बहुवचन 



Monday, January 11, 2021

मैंने पूछा गुगल से

मैंने पूछा गुगल से कि देखा है कहीं

हमारे ट्रम्प सा दुखी

गुगल ने कहा सर्च की क़सम

नहीं, नहीं, नहीं


मैंने ये हिसाब तेरा देखा

हर जगह ख़राब तेरा देखा

ट्वीटर पे ट्वीट तेरी देखी

सब में तेज़ाब तेरा देखा

मैंने पूछा ट्वीटर से फ़लक़ हो या ज़मीं

ऐसा पंछी है कहीं

ट्वीटर ने कहा हर ट्वीट की क़सम

नहीं, नहीं, नहीं


झूठ रोज़-रोज़ तू बके है

सुन-सुन के कान भी पके हैं

पद नहीं रियासत खुद की

समझ के नशे मे तू रहे है

मैंने पूछा जाम से फ़लक़ हो या ज़मीं

ऐसी मय भी है कहीं

जाम ने कहा, मयकशी की क़सम

नहीं, नहीं, नहीं


बदनामी जो तूने पाई

लुट गई ख़ुदा की बस ख़ुदाई

कौड़ी का शैतान कहूँ तुझे मैं

या कहूँ जहान की तबाही 

मैं जो पूछूँ फ़ेसबुक से ऐसा अप्रिय 

इन्सान है कहीं

फ़ेसबुक कहे लाईक की क़सम

नहीं, नहीं, नहीं


(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय ।11 जनवरी 2021 । सिएटल 

हम लड़ते हुए दिख जाए

हम लड़ते हुए दिख जाए

तो कोई बड़ी बात नहीं 


हम हाथों में हाथ लिए

टहलते नज़र आ गए

तो ख़ैर नहीं 


बेइज़्ज़त होने का डर रहता है


असंख्य सवाल खड़े हो उठते हैं 


चूँकि 

दिक्कत यह है कि

लड़ाई एक से नहीं 

हज़ार से करो

और हज़ार बार करो

कोई आपत्ति नहीं 


प्यार?


राहुल उपाध्याय । 11 जनवरी 2021 । सिएटल 



Saturday, January 9, 2021

फ़ोन पर तुम्हारी तस्वीर

फ़ोन पर तुम्हारी तस्वीर 

टिकती नहीं है 

थोड़ी-थोड़ी देर में 

ओझल हो जाती है 


फिर समझ आया कि 

यह मुझे निष्क्रिय जान

अपनी जान बचाने के चक्कर में

तुम्हें ग़ायब कर देता है 

और मैं स्क्रीन छूता नहीं 

ताकि तुम पर कोई दाग न आए


आई-फ़ोन इलेवन प्रो मैक्स 

जिसमें एक नहीं चार कैमरे हैं

जो भाँप लेता है 

मेरी आँखें

जो टटोल लेता है 

मेरा नाक-नक़्श

क्यों नहीं समझ पाता है 

कि मैं तुम्हें एकटक देख रहा हूँ 


यदि यह निष्क्रियता का प्रतीक है 

तो सक्रियता क्या है 

मैं नहीं जानता 


मैं जितना ज़िन्दा आज हूँ 

उतना ज़िन्दा कभी नहीं रहा


राहुल उपाध्याय । 9 जनवरी 2021 । सिएटल