करत करत अभ्यास के
शांतिप्रिय भए शैतान
गाँधी जी के देश में
बंदूक-तमंचे वाले पा रहे इनाम
देश-विदेश के नर-नार ने
देखें राष्ट्रमंडल खेल
लेकिन दिल्लीवासी घर में बंद
जैसे काट रहे हो जेल
खेल के नाम पे लूट है
लूट सके तो लूट
कहने को है गाँव मगर
ठाठ-बाट भरपूर
कलमाडी पुलिया खेल की
क्यूँ दी तोड़ भड़भड़ाय
सेना ने तो जोड़ दी
पर ओलम्पिक दियो गँवाय
लाखों-करोड़ों फूँक के
किए समारोह भव्य
और रामलला की रामलीला को
मिले छटाँक न द्रव्य
दिल्ली
099588 - 90072
14 अक्टूबर 2010
Thursday, October 14, 2010
विडम्बनाओं का खेल
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:42 AM
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Labels: India
Tuesday, October 5, 2010
कान बंद, दुकान बंद
एक दिन था फ़ैसला
तो दुकाने थीं बंद
एक दिन था जन्मदिन
तो दुकानें थीं बंद
एक दिन था समारोह
तो दुकाने थीं बंद
यह सब तभी सम्भव है
जब
या तो जनता हो गूंगी
या शासक के हो कान बंद
दिल्ली | 099588 - 90072
6 अक्टूबर 2010
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:39 PM
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Labels: India
Monday, October 4, 2010
इंसान ऊँट बनने लगा है
एक भव्य
टंकी हुआ करती थी
फिर
एक दौर ऐसा आया
कि हर घर की छत पर
सिंटेक्स की काली टंकी
नज़र आने लगी
कालांतर में
हर किचन में
एक आर-ओ का
रिवाज़ चल पड़ा
अब शनै: शनै:
इंसान ऊँट बनने लगा है
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है
कि पानी की थैली
पेट में न हो कर
पीठ पर है
दिल्ली |99588 - 90072
4 अक्टूबर 2010
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सिंटेक्स = Sintex
किचन = kitchen
आर-ओ = RO, or reverse osmosis
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:12 AM
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Labels: misc
Sunday, October 3, 2010
भोर भए
भोर भए XX हर कोई जाए
जाए रे पशु जैसे हर कोई जाए
कोई गली, कोई डगर, कोई कोना
नाहीं छूटे, सब हैं जुटे, मारे बास
भोर भए ...
कॉमन मेन, कॉमन-फ़िल्थ, कॉमन-वेल्थ में फ़ंसा
कैसे उबरे, कैसे निपटे, सैया बेईमान
भोर भए ...
रातों को नींद, दिन में हो चैन, ऐसा है कहाँ?
गाँव, पनघट, हो सब के सब, सब्ज़ जहाँ
भोर भए..
दिल्ली | 99588-90072
3 अक्टूबर 2010
(मजरूह से क्षमायाचना सहित)
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XX = हूँ-हूँ या something-something जो मन में आए जोड़ लें. उचित शब्द यहाँ लिखना अनुचित होगा, इसलिए नहीं लिखा.
सब्ज़ = हरा
कॉमन मेन, कॉमन-फ़िल्थ, कॉमन-वेल्थ = common man, common-filth, common-wealth
Wednesday, September 15, 2010
वो चौदह वर्ष का था
वो चौदह वर्ष का था
इसे चौबीस हो चुके हैं
वो वनवास था
यह सन्ताप है
उसकी अवधि सुनिश्चित थी
इसकी अवधि जीवन-काल है
वो वर था
यह अभिशाप है
जो मिला है भारत माँ को
अपनी ही सन्तान से
वसुधैव कुटुम्बकम का
नारा जो लगा रहे हैं
अपनी ही दाढ़ी में
तिनका बता रहे हैं
सिएटल । 513-341-6798
15 सितम्बर 2010
(अमरीका में पदार्पण की 24वीं वर्षगाँठ)
Tuesday, September 14, 2010
पहेली 35
पिछले वर्ष की तरह इस बार भी हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर प्रस्तुत है एक नई पहेली:
ये न हो तो चूल्हा जले ना
ये न हो तो दिया बुझे ना
ज़ुबाँ नहीं है, न कान है हाए
फिर भी हम इससे बातें करते जाए
सब कहते हैं ये यहीं कहीं है
लेकिन देखा किसी ने कभी नहीं है
ये ऐसी एक पहेली यारो
जो बदहवास करे, पर बकवास नहीं है
कैसे हल करें? उदाहरण स्वरूप पुरानी पहेलियाँ और उनके हल देखें।
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:41 AM
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Labels: riddles
Friday, September 3, 2010
शर्ट, शार्ट और शार्ट्स
वे भी हैं मीडियम
फ़र्क सिर्फ़ इतना है
कि वे गुरू हैं
और ये शर्ट है
पहले मैं शर्ट स्माल साईज़ ही पहना करता था
लेकिन जैसे-जैसे पेट मोटा होता गया
शर्ट शार्ट होने लगी
शार्ट्स से याद आया
जब मैंने आठवीं कक्षा पास की थी
तब ही प्रण कर लिया था कि
आज के बाद कभी शार्ट्स नहीं पहनूँगा
लेकिन शार्ट्स की बात तो दूर
आज भी
अड़तालीस वर्ष की उम्र में
मैं पीठ पर बस्ता लटकाए
सुबह-शाम बस में सफ़र करता हूँ
जबकि सोचा तो ये था कि
नौकरी मिलने के बाद
मैं
स्कूटर
मोटर-साईकल
या कार से ही दफ़्तर जाया करूँगा
ये न थी हमारी किस्मत कि सपने साकार होते
अगर और जीते रहते यूँहीं जार-जार रोते
सिएटल । 513-341-6798
3 सितम्बर 2010
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:28 PM
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Labels: misc
