जो मत वाले है वे मतवाले हैं
जिनकी अकल पे पड़े ताले हैं
तभी तो जो राजा बनता है
रानी का होता चमचा है
हम बुद्धिजीवी भी कुछ खास नहीं
लगती हरी कोई घास नहीं
जब भी कोई राजा बनता है
उसमें है खोट हमें लगता है
सब राम भरोसे,सब काम परोसे
सतकाम में न कोई फ़ंसता है
कोई करना भी 'गर चाहे कभी
तो सारा जहाँ उसपे हँसता है
क्या होगा उस देश का यारो
जिस देश का लाल उसे खुद ठगता है
सूँघ के सोने-चाँदी के टुकड़े
इस देश, उस देश भटकता है
आदर्श के नाम पे कोई है ही नहीं
सिर्फ़ आदर्श घोटाला दिखता है
हैं भारत पे हम भार सभी
नित स्वार्थ में रत हर एक बंदा है
सिएटल । 513-341-6798
27 मई 2011
Friday, May 27, 2011
मतवाले मत वाले
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:49 PM
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Friday, May 13, 2011
राम नाम सत्य है
जानेवाले जाते-जाते क्यूँ जूते छोड़ जाते हैं?
और जो जुते हुए हैं उनसे क्यों नाते तोड़ जाते हैं?
जो जन्मे थे कल
वही जन्मेंगे आज
कहने की बात है
कोई करे न विश्वास
करे न विश्वास
करे तर्क हज़ार
सच है अगर
तो बताए भाई साब
कहाँ गए राम
और कहाँ श्याम आज?
कैसे कोई उनसे कहे
देखो संग-तराश
भिन्न-भिन्न भित्त बनाए
लेकिन वही हाड़-माँस
वही हाड़-माँस
वही फ़ेफ़ड़ों में साँस
जो गया है वो गया नहीं
जो आया है वो आया नहीं
काल के ग्रास में
कोई भी समाया नहीं
सब यहीं थे, यहीं हैं
सत्य सिर्फ़ यही है
सिएटल, 13 मई 2011
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:13 PM
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Friday, April 22, 2011
ये कैसा प्रजातंत्र है ये कैसा जनतंत्र
जनता इससे खुश नहीं, कहे षड़यंत्र
कहे षड़यंत्र, हुई इतनी ये तंग
उठाने लगे संग जो कर करें सतसंग
करें सतसंग, करने लगे अनशन
नाम जिनका अन्ना, नहीं छू रहें थे अन्न
नहीं छू रहें थे अन्न, हुई जनता प्रसन्न
चलो गाँधी फिर से आए, डरें मनमोहन
डरें मनमोहन, हटी हर अड़चन
बच्चा-बच्चा खुश हुआ, हुए अभिभावक मगन
हुए अभिभावक मगन, पूरे होगे अब स्वपन
पढ़-लिख के राजा बेटा कमाएगा ये धन
कमाएगा ये धन, नहीं करेगा गबन
देश में ही रहेगा, नहीं होगा बे-वतन
नहीं होगा बे-वतन, सब होगे सुखी-सम्पन्न
भारत में ही रह के भारत माँ का नाम करेगा रोशन
सिएटल, 22 अप्रैल 2011
Posted by Rahul Upadhyaya at 2:03 PM
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Friday, April 8, 2011
यह शस्त्र बड़ा बेजोड़ है
करने को हम कुछ नहीं करते
बस देते देश छोड़ है
आज मिला है एक सुअवसर हमको
आज हो रही भोर है
फिर क्यूँ यारो हम हैं सोते
चलो लगाते जोर है
सिएटल, 7 अप्रैल 2011
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:08 AM
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Labels: news
Sunday, April 3, 2011
धोनी ने धो के सबको जीती ये पाली है
न होली है, न दीवाली है
फिर भी मस्त सवाली है
बरसों के बाद हमने
जीत जो पा ली है
जीते हैं दम से हम
ये जीत न जाली है
धोनी ने धो के सबको
जीती ये पाली है
बरसों हम हारे लेकिन
कभी दी न गाली है
बड़े ही नाज़ों से हमने
टीम ये पाली है
न हिंदू न मुस्लिम है कोई
न कोई बंगाली है
हर बंदा है भारतवासी
जिसने ट्रॉफी उठा ली है
आओ मिलके हम गाए
ये धुन निराली है
जीतने की हो धुन जिसमें
नहीं लौटता वो खाली है
सिएटल, 4 अप्रैल 2011
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पाली = 1. inning 2. raised
धुन = 1. tune 2. intense devotion
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:38 AM
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Saturday, March 26, 2011
आड़ी-तिरछी लकीरें
न कोई पढ़ता है
न कोई समझता है
और न ही कोई दाद देता है
न कोई रूप है
न कोई स्वरूप है
और न ही किसी का पेट भरता है
न किसी की प्यास बुझती है
और न ही किसी की कोई ज़रूरत पूरी होती है
अगर सरल शब्दों में कहूँ तो
यह नितांत व्यर्थ की प्रक्रिया है
जिसका कोई प्रयोजन नहीं है
सोचता हूँ
अगर भगवान भी अपनी बीवी की सुनता
तो आज आसमान में आड़े-तिरछे बादल न होते
सिएटल, 26 मार्च 2011
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:33 PM
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Labels: March Read, March2, world of poetry
Friday, March 25, 2011
दुनिया नई बसा लेते हैं लोग
इससे पहले कि दिया बुझे, दिया नया जला लेते हैं लोग
दिया तो दिया, दुनिया नई बसा लेते हैं लोग
डरते हैं पतन न कहीं जाए झलक
चेहरे पे चेहरा लगा लेते हैं लोग
यूँ तो आने-जाने की किसी को फ़ुरसत नहीं
लेकिन बात-बात पे महफ़िल जमा लेते हैं लोग
कभी इसकी तो कभी उसकी
जैसे भी हो खिचड़ी पका लेते हैं लोग
भरती का शेर राहुल से बनता नहीं
बनाने को बनाने वाले बना लेते हैं लोग
सिएटल, 25 मार्च 2011
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:24 PM
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Labels: CrowdPleaser, March Read, March2
