Saturday, July 16, 2011

आदमी थे हम

आदमी थे हम, संग होने लगे हैं
खून को रंग मान, रंग धोने लगे हैं

वारदातें होती हैं, होती रहेंगी
कह के ज़मीर अपना खोने लगे हैं

अब क्या किसी से कोई कुछ कहेगा
सब अपनी ही लाश खुद ढोने लगे हैं

पढ़-लिख के इतने सयाने हुए हम
कि स्याही में खुद को डुबोने लगे हैं

बाहों में किसी की जब बिलखता है कोई
बंद कर के टी-वी हम सोने लगे हैं

16 जुलाई 2011
सिएटल
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संग = पत्थर

Wednesday, July 13, 2011

क़हर

पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर

बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर

बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर

न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर

नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर

आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

Monday, July 11, 2011

फ़ेसबुक

दुश्मनी मेरी इससे कोई जाती नहीं है
लेकिन फ़ेसबुक की दुनिया मुझे भाती नहीं है

दीवार पे लिखो, दीवार पे बाँचो
यूँ दीवारों से बातें की जाती नहीं है

एक नहीं, दो सौ नौ फ़्रेंड्स हैं मेरे
कहने को दोस्त, लेकिन कोई साथी नहीं है

विडियो और फोटो में कुछ ऐसा फ़ंसा
कि शब्दों की सही वर्तनी अब आती नहीं है

फ़ेसबुक की दुनिया एक सूखे पेड़ सी है यारो
जिसमें शाख ही शाख है कोई पाती नहीं है

11 जुलाई 2011
सिएटल

Friday, June 10, 2011

मुर्गी चाहिए या अंडे?

अपना धन
दूर देश की बैंकों में
रंग बदल के बैठा है

आओ चलो
कुछ करें
देशवासियों ने आंदोलन छेड़ा है

धन क्या है?
धन तो हाथ का मैल है
आएगा
और जाएगा

लेकिन
उन लोगों का क्या होगा
जो देश छोड़-छाड़ के बैठे हैं

लाख बुलाने पर भी
वसुधैव कुटुम्बुकम का
राग अलापते रहते हैं

सिएटल । 513-341-6798
10 जून 2011

Thursday, June 2, 2011

नामों का सच

नाम हिलेरी, न तनिक हिले री
नाम अगाथा, लिखे गाथा पे गाथा
इन सबको देख के घूमा है माथा

कब, कहाँ कोई क्या कर जाए?
नाम के विपरीत रास रच जाए

नागपुर में नाग बसते नहीं हैं
कानपुर में कान पकते नहीं हैं

पटना में लड़की पटती नहीं है
विदिशा में दिशा मिलती नहीं है

संतरों को खा के संत रोते नहीं है
मंजु के सर में मन जू नहीं है

बाईट की दुनिया बा-ईंट नहीं है
मौसीकी से मौसी का रिश्ता नहीं है

चार पाई में मिलती चारपाई नहीं है
सैलाना निवासी सैलानी नहीं है

रसगुल्लों से यारो रस गुल नहीं है
और गुलाब-जामुन जो है वो फल-फूल नहीं हैं

जब से पता चला नामों का सच ये
रहता हूँ शीला-सुशीला से बच के
जाता नहीं जहाँ होती हो पूजा
रुकता नहीं जहाँ दिखती है श्रद्धा
सत्यम का काम ठुकराता सविनय हूँ
नामों को ठोक-पीट के ही उठाता कदम हूँ

सिएटल
2 जून 2011
513-341-6798
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मौसीकी=music
सैलानी=tourist

Friday, May 27, 2011

मतवाले मत वाले

जो मत वाले है वे मतवाले हैं
जिनकी अकल पे पड़े ताले हैं
तभी तो जो राजा बनता है
रानी का होता चमचा है

हम बुद्धिजीवी भी कुछ खास नहीं
लगती हरी कोई घास नहीं
जब भी कोई राजा बनता है
उसमें है खोट हमें लगता है

सब राम भरोसे,सब काम परोसे
सतकाम में न कोई फ़ंसता है
कोई करना भी 'गर चाहे कभी
तो सारा जहाँ उसपे हँसता है

क्या होगा उस देश का यारो
जिस देश का लाल उसे खुद ठगता है
सूँघ के सोने-चाँदी के टुकड़े
इस देश, उस देश भटकता है

आदर्श के नाम पे कोई है ही नहीं
सिर्फ़ आदर्श घोटाला दिखता है
हैं भारत पे हम भार सभी
नित स्वार्थ में रत हर एक बंदा है

सिएटल । 513-341-6798
27 मई 2011

Friday, May 13, 2011

राम नाम सत्य है

जानेवाले जाते-जाते क्यूँ जूते छोड़ जाते हैं?
और जो जुते हुए हैं उनसे क्यों नाते तोड़ जाते हैं?

जो जन्मे थे कल
वही जन्मेंगे आज
कहने की बात है
कोई करे न विश्वास

करे न विश्वास
करे तर्क हज़ार
सच है अगर
तो बताए भाई साब
कहाँ गए राम
और कहाँ श्याम आज?

कैसे कोई उनसे कहे
देखो संग-तराश
भिन्न-भिन्न भित्त बनाए
लेकिन वही हाड़-माँस

वही हाड़-माँस
वही फ़ेफ़ड़ों में साँस

जो गया है वो गया नहीं
जो आया है वो आया नहीं
काल के ग्रास में
कोई भी समाया नहीं

सब यहीं थे, यहीं हैं
सत्य सिर्फ़ यही है

सिएटल, 13 मई 2011