Thursday, November 14, 2019

मन्दिर तो बन जाएगा

मन्दिर तो बन जाएगा
पर उन जूतों का क्या होगा
जो इधर-उधर बिखरे रहते हैं
लाख हिदायत देने पर भी
सुव्यवस्थित नहीं रखे जाते हैं

मन्दिर तो बन जाएगा
पर उन मवेशियों का क्या होगा
जो इधर-उधर मुँह मारते रहते हैं
जिन्हें जो गुड़-रोटी खिलाना चाहते हैं
वे भी डंडे मारने से नहीं चूकते हैं

मन्दिर तो बन जाएगा
पर उन फूलों का क्या होगा
जो बाग़ से उजाड़ दिए जाते हैं
कुछ पल पंडित के हाथ लगते ही
नाली में बहने लगते हैं

मन्दिर तो बन जाएगा
पर उन मिठाइयों का क्या होगा
जिनसे मोटापा बढ़ता रहता है
डायबिटीज़ का घाटा होता है
न खाने पर भगवान का प्रकोप बढ़ता है

मन्दिर तो बन जाएगा
पर वैष्णोदेवी-तिरूपति को टक्कर नहीं दे पाएगा
कृष्ण जन्मभूमि अविवादित है
पर कौन वहाँ के मन्दिर की मान्यता के गुण गाता है

मन्दिर तो बन जाएगा
पर मन कहाँ ख़ुश हो पाएगा?

राहुल उपाध्याय । 14 नवम्बर 2019 । सिएटल

Friday, October 25, 2019

चिट्ठी कोई लिखता नहीं है

चिट्ठी कोई लिखता नहीं है
बिन बुलाए कोई घर आता नहीं है
और पतझड़ है कि
रंग-बिरंगी संदेश घनेरे
बरसा रहा है 
दर पर मेरे
कुछ तो इतने आतुर
कि घुस आए घर में
क़दमों से लिपटे

रंग इतने कि इन्द्रधनुष लजाए
आकार इतने कि गिने न जाए 

इनसे मेरा क्या नाता है?
इनसे न मिलूँ तो इनका क्या जाता है?
क्यूँ इनका मैं फ़ोटो खींचूँ?
व्हाट्सैप के स्टेटस पे इन्हें लगाऊँ?
कैनवास पे मढ़ के दीवार सजाऊँ?

इनसे नहीं कोई नाता मेरा
तभी तो न इन्होंने, न मैंने इनको
आज तलक कोई ताना मारा

जब आते हैं
अच्छे लगते हैं
जब जाते हैं
सपने लगते हैं
मधुर, सरस, सुवास, सुहाने
प्रियकर इतने जितने न प्रियकर से भी प्रियकर गाने

चिट्ठी कोई लिखता नहीं है
बिन बुलाए कोई घर आता नहीं है
और पतझड़ है कि ...

राहुल उपाध्याय । 25 अक्टूबर 2019 । सिएटल

Thursday, October 10, 2019

कहाँ से चला, कहाँ मैं आज

कहाँ से चला, कहाँ मैं आज
कर्क रेखा से उड़ा, हूँ पैतालिस के पार
सर्दी-गर्मी-बरसात के झंझट से दूर
है वातानुकूलित निवास

एक ग़रीब सा तबक़ा 
होंगी कोई सौ-दो-सौ झोपड़-पट्टी
जहाँ पाँच बसें सुबह आती थीं
शाम को चार
न था डॉक्टर
न कोई उपचार
स्कूल भी जाना हो
तो जाते थे रतलाम 
ऐसा था शिवगढ़
मेरा जन्मस्थान 

आमदनी के नाम पर भी
कहाँ था कुछ ख़ास
किसी की नहीं थी
कोई नियमित आय
या कोई स्थायी नौकरी
कोई पान बेचता था
कोई बीड़ी
कोई मिठाई
कोई दूध
कोई नाई
तो कोई बढ़ई 

वहाँ से आज मैं हूँ समामिश में
अमेरिका के एक ऐसे शहर में 
जहाँ के निवासियों की 
पूरे अमेरिका में हैं सबसे अधिक आय

हैं घर-गाड़ी-सारे ऐश-ओ-आराम
जिस सुविधा की कल्पना करो
वही सहज मुहैया आज

कहाँ से चला
कहाँ मैं आज

सच कहूँ तो मैं चला ही कहाँ
मुझे नियति ने चलाया और मैं चलता रहा
न मैंने कोई योजना बनाई
न कोई गुरू

राहें खुलती रहीं
मैं क़दम बढ़ाता रहा

जितना मैं धन्यवाद देता रहा
उतनी ही मेरी झोली भरती रहीं

जितना मैं ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत समझता रहा
उससे अधिक मुझे ख़ुशी मिलती रही

जितना मैं देता रहा
उससे कई गुना पाता रहा

बचपन में सुना था
तुम एक पैसा दोगे
वो दस लाख देगा

विडम्बना तो यह है कि
सिवाय धन्यवाद मैंने
आज तक किसी को
एक पैसा भी नहीं दिया 

राहुल उपाध्याय । 10 अक्टूबर 2019 । सिएटल

Friday, September 27, 2019

रोए यूँ पागल एन-आर-आई

चुभ जाती हैं ये हवाएँ
गड़गड़ाता है गगन
हो रही है जम के जग हँसाई
ज़ूबी डूबी परमपम
ज़ूबी डूबी, ज़ूबी डूबी परमपम
ज़ूबी डूबी, ज़ूबी डूबी परमपम
रोए यूँ पागल एन-आर-आई

शाख़ों से पत्ते गिर रहे हैं
फलों पे कीड़े लग रहे
सड़कों पे फिसलन हो रही है
ये पंछी चीख़ रहे
बगिया में दो बूढ़ों की 
हो रही है गुफ़्तगू 
जैसा बचपन में रोता था
रो रहा है हुबहू 

रिमझिम रिमझिम रिमझिम
सन सन सन सन हवा
टिप टिप टिप टिप बूँदे 
गुर्राती बिजलियाँ 
भीगा-भागा बैकपैक 
ढो के यूँ बस पकड़ता तू
जैसा बचपन में ढोता था 
ढो रहा है हुबहू 

आय-आय-टी का पास तू 
यहाँ बर्तन धो रहा
कच्चे-पक्के दाल-चावल 
खा के पेट भर रहा
हैं रातें अकेली तन्हा
सो रहा है हाथ में रिमोट ले तू
जैसा बचपन में सोता था
सो रहा है हुबहू 

(शान्तनु मोयत्रा से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 27 सितम्बर 2019 । सिएटल

Monday, September 16, 2019

ख़ला जो ख़ालिद है

ख़ला जो ख़ालिद है
ख़ला जो वालिद है
उसी में जीवन
ढूँढने की ज़िद है

चाँद चूमना
तो फ़क़त एक बहाना है
चाँद से भी दूर
दूर तलक जाना है

सोम से मंगल
मंगल से बुध
बुध से गुरू
गुरू से शुक्र-शनि
रवि पर भी जाना है
रवि पर भी रूककर
आराम कहाँ फ़रमाना है

किसी एक के 
गुरुत्वाकर्षण में 
किसी एक के
आगेश में
ठहरे वो 
जो सयाना है

अपना क्या?
न कोई अपना
न कोई बेगाना है
आज यहाँ तो 
कल कहीं जाना है
जीवन जीने का 
तरीक़ा यही जाना है

(अमेरिका में पदार्पण की 33वीं वर्षगाँठ पर)
राहुल उपाध्याय । 15 सितम्बर 2019 । सिएटल
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ख़ला = शून्य, अन्तरिक्ष 
ख़ालिद = अनश्वर, अमर
वालिद = पिता

Friday, September 13, 2019

मिलन की रात

मेरा नाम प्रज्ञान है
मैं कोई बुद्धू थोड़े ही हूँ
जो मिलन की रात भी 
फ़ोन उठाऊँ 
बात करूँ 
आँखों देखा हाल सुनाऊँ 
लाईव फ़ीड भेजूँ

राहुल उपाध्याय । 13 सितम्बर 2019 । सिएटल

Saturday, September 7, 2019

बिल्ली ने काट लिया होगा किसी का रास्ता

बिल्ली ने काट लिया होगा किसी का रास्ता
अण्डे का कर लिया होगा किसी ने नाश्ता
ऐन मौक़े पर आ गई होगी किसी को छींक
रोक दिया होगा किसी ने संदेश जो होना चाहिए था ग्यारह को फ़ॉरवर्ड 
सवा-रूपये-नारियल का वादा करके कोई गया होगा भूल
सत्यनारायण की पूजा से कोई उठ गया होगा बिना लिए प्रसाद
एकादशी को किसी ने खा लिया होगा अन्न

करोड़ों की तादाद में कुछ तो होंगे ऐसे
जिन्होंने किए होंगे अपशकुन ऐसे-वैसे
जिससे
श्रावण सोमवार को चले को
लग गई शनि की दशा
और हो गया दिशा भ्रम

राहुल उपाध्याय । 7 सितम्बर 2019 । सिएटल