Tuesday, June 9, 2020

20200609 सौ सुनार की


Monday, June 8, 2020

नए जूते

नए जूतों को मैं
दरवाज़े पर नहीं 
छोड़ता हूँ

उतार कर
क़ायदे से
हाथ में उठाकर 
झाड़-पौछ कर
सम्हाल कर रखता हूँ

बाहर बारिश में भीग गए तो?
धूल-मिट्टी-कचरे में सन गए तो?

दस साल पुराने जूते
यूँही पटक दिया करता था
हज़ारों मील मेरे साथ रहे हैं
मुझे छोड़कर जाएँगे कहाँ
और कोई और उन्हें लेगा भी क्यों

घर के बाहर 
पड़े-पड़े
वे राह तकते थे
दरवाज़े की ओर
टकटकी लगाए रहते थे
कब खुलेगा
और कब उन्हें मैं
अपने साथ ले चलूँगा 
किसी बाग़ में
किसी उपवन में
किसी झील
किसी झरने पर

वे जानते थे कि
घर से थोड़ी दूर जाते ही
जहाँ नेटवर्क अच्छा होगा
वहाँ से मैं अपनी माँ से बात करूँगा 
कोई ज़्यादा लम्बी नहीं 
बस कैसी हो?-मैं अच्छा हूँ-सब ठीक?-रखूँ?

मेरे सुख-दुख के साथी थे
पैडमैन साथ देखी
आँखों से बहुत दूरी थी उनकी
और अंधेरा भी
पर शायद समझ जाते थे
कि कुछ तो गड़बड़ है
तभी तो एक पाँव 
एक के उपर है

वे 
यह भी जानते थे
कि मैं कब किस से मिला
और किस से एक अरसा हुआ नहीं मिला 

अभी चार ही दिन हुए हैं
नए जूतों को पहने
धीरे-धीरे
ये भी मुझे 
जानने
पहचानने लगेंगे

पुराने जूते
अब अंदर आ गए हैं
कोई क्रिया कर्म तो इनका होता नहीं 
फेंके मुझसे जाते नहीं 

क्या पता एक दिन काम आ जाए
जब जाना हो किसी कीचड़ में 

राहुल उपाध्याय । 8 जून 2020 । सिएटल

कोरोना हूँ

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कोरोना हूँ 
सारी दुनिया भर का रोना-घोना हूँ

घर-बार नहीं, संसार नहीं
मुझसे किसी को प्यार नहीं 
उस पार किसी से 
मिलने का इकरार नहीं
टूटा फूटा भटका हुआ खिलौना हूँ

ग़रीबी कहीं, भूखमरी कहीं, 
बढ़ रही बेरोज़गारी कहीं
है रोग इधर है रोग उधर
पर है कहीं उपचार नहीं 
दुनिया मैं सारे रोगों में, सारे रोगों में बौना हूँ

(शैलेन्द्र से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 7 जून 2020 । सिएटल


Saturday, June 6, 2020

लो बीमारी, दो बीमारी

लो बीमारी
दो बीमारी
है बस यही पहचान हमारी

अलग-थलग हैं
कटे-कटे से
कहने को जात इंसान हमारी

न आँखों में चमक
न होंठों पे हँसी है
दबी-छुपी है मुस्कान हमारी

कोई घूरे हमें
कोई नज़रें फेरे
जैसे हो सूरत हैवान हमारी 

न हम इसके
न ये हमारी
साँसें हैं मेहमान हमारी

राहुल उपाध्याय । 6 जून 2020 । सिएटल

Friday, June 5, 2020

मैं तुम्हारे साथ हूँ

जब मैं ख़ुश होता हूँ
तब कोई क्यों नहीं कहता
मैं तुम्हारे साथ हूँ

क्या वे मुझसे जलते हैं?
कि कहीं साथ दे दिया
तो दिन दूनी रात चौगुनी 
सफलता की सीढ़ियाँ 
न चढ़ता जाए
और हम बुद्धु की तरह
देखते ही रह जाए

क्या किसी का 
साथ पाने के लिए
दुखी होना
आवश्यक है?

राहुल उपाध्याय । 5 जून 2020 । सिएटल

Thursday, June 4, 2020

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े किसी के न लागू पाय


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गुरू गोविन्द दोऊ खड़े किसी के न लागू पाय
कोविड के इस जुग में दो गज दूरी सुहाय

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे अमरीका देश
है यहाँ के रोग वहाँ और वही के वही कलेश

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई अंगुल मास्क का, लगाए सो पंडित होय

आई है तो जाएगी महामारी एक दिन
तब तक धीरज धरिए बन रही वैक्सीन

राहुल दूरी दो गज की मत तोड़ो चटकाय
टूटे फिर बचे नहीं जग से दूर हुई जाय

(कबीर, रहीम से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 4 जून 2020 । सिएटल

Monday, June 1, 2020

वही हो रहा है

जो नहीं होता था 
हो रहा है
एक-दूसरे से 
एक दूसरे को
ख़तरा हो रहा है

पहले भी
किसे फ़ुरसत थी
किसी से मिलने की
ग़लती से सामना हो जाने पर
बस नाटक करते थे
गले लगाने का

कोई कहता है कि
हम तो उकता गए हैं
घर बैठे-बैठे
एक यही थे
जो चाहते थे कि
मिल जाए उन्हें सब
घर बैठे-बैठे

अमेज़ॉन प्राइम
नेटफ्लिक्स
उबर ईट्स
और ज़ूम
आज की
इजाद नहीं है
भोले हैं लोग
भूलने लगे हैं
रहता कुछ
याद नहीं है 

जो चाहा था
वही हो रहा है

राहुल उपाध्याय । 1 जून 2020 । सिएटल