Friday, August 13, 2021

बादल

बादल 

यदि न बरसे

तो निरर्थक है


छाँव अच्छी है

चिलचिलाती धूप से बचाती है


लेकिन बरसें नहीं तो

धान नहीं पकते

जलाशय नहीं भरते

काग़ज़ की कश्ती नहीं चलती

प्यार की पीर नहीं बढ़ती


इधर-उधर डोलती घटा की 

ज़िंदगी तब पूरी होती है 

जब वह बरस जाती है 

मिट जाती है 


राहुल उपाध्याय । 13 अगस्त 2021 । सिएटल 






Monday, August 9, 2021

तुम ख़्वाब में आए हक़ीक़त बनकर

तुम ख़्वाब में आए हक़ीक़त बनकर 

झूठ में सच की एक सूरत बनकर 


वलवले हसीन से हसीन हो गए

एक से एक ख़ूबसूरत बनकर 

(वलवले = उमंगें)


आते-जाते रहें मतभेद हमारे

आफ़त या मुसीबत बनकर 


जो टिका रहा वो मोहब्बत था

साँसों की तरह आदत बनकर 


प्रेम ही देता ईंधन जीवन को

जीव से जीव की लगावत बनकर 


राहुल उपाध्याय । 9 अगस्त 2021 । सिएटल 





Sunday, August 8, 2021

इतवारी पहेली: 2021/08/08

इतवारी पहेली:

अंगूर का दाना ये ## #

मैं क्यूँ कहूँ कि # # #


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya 


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 


सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 15 अगस्त को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 8 अगस्त 2021 । सिएटल















Sunday, August 1, 2021

मेरी कमी को मैंने ताक़त समझा

मेरी कमी को मैंने ताक़त समझा

उसी कमी को उसने आदत समझा


होते रहते सबसे मतभेद मेरे

कभी न किसी को लानत समझा


आते जाते रहते ग़म सुबह-शाम

कभी न किसी को आफ़त समझा


जब भी किसी ने हिदायत दी

हिदायत को बस हिदायत समझा 

(हिदायत = सलाह)


लड़ना-झगड़ना नहीं रग में मेरे

छोड़ दिया तो उसने बग़ावत समझा


राहुल उपाध्याय । 1 अगस्त 2021 । सिएटल 

मीराबाई चानू

मैंने उसके करोड़ को देखा

पथ को लेते मोड़ को देखा


ग़रीब थी धनवान हुई

देश की आज शान हुई


छोटा था, बड़ा पद मिला

यथोचित प्रेम, यश मिला


दिखता उसका संघर्ष नहीं 

परिश्रम से भरे वर्ष नहीं 


रोज़ सुबह जल्दी उठना

पुश-अप करना, पुल-अप करना

घंटो-घंटो रियाज़ करना

इससे भिड़ना उससे लड़ना

छोटे-बड़े अवार्ड जीतना

हार के भी न साहस खोना

आगे-आगे बढ़ते जाना

हर क़दम पे जान लगाना

मन को थामें, बांधे रखना

एक इंच भी न पथ से हटना

जो भी करना ख़ुद को करना

न इससे मिलना, न उससे मिलना

काम से काम, और काम ही करना

घर-परिवार से दूर ही रहना


इतना सब करके भी 

क्या गारंटी है कि 

मिलेगा डेढ़ फुट ऊँची पोडियम पर 

चढ़ के पैर जमाना?

अपने गले में मेडल लटकाना?


एक शाम मैंने उसे सब पाते देखा

नहीं देखा कि लगा उसमें 

जीवन नहीं 

एक ज़माना

ख़ून-पसीना

आँसू-वासू

बस के धक्के 

ट्रेन के डिब्बे 

बरसात की रातें 

गर्मी के दिन

सर्दी की छाँव 

थके से पाँव 


मैंने उसके करोड़ को देखा …


राहुल उपाध्याय । 1 अगस्त 2021 । सिएटल 








Saturday, July 31, 2021

इतवारी पहेली: 2021/08/01


इतवारी पहेली:


उनके बच्चों के नाम हैं ###-##

शायद है किसी बात की #### 


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya 


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 


सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 8 अगस्त को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 1 अगस्त 2021 । सिएटल















महका गुलाब

कभी-कभी दुआओं का 

जवाब आता है 

और कुछ इस तरह कि 

बेहिसाब आता है


कहाँ तो मयस्सर नहीं था

एक बूँद भी पानी

और अब आया तो ऐसे 

जैसे सैलाब आता है 

(मयस्सर = उपलब्ध)

(सैलाब = बाढ़)


कोई वीडियो बनाता है 

कोई कविता है लिखता

किसी को न किसी को 

बचाने का ख़्वाब आता है 


इस लम्बी ज़िन्दगी में भी 

आते हैं कुछ ऐसे क्षण

जब चल के ख़ुद बाँहों में 

महका गुलाब आता है 


बहुत आसां है जीतना जंग 

हज़ारों अहबाब के साथ

जिगर फ़ौलाद का हो तो 

ओलम्पिक में ख़िताब आता है 

(अहबाब = हबीब (दोस्त) का बहुवचन)


बुराईयों की फ़ेहरिस्त 

वैसे तो है बहुत लम्बी 

पर बीड़ी-सिगरेट का ही नाम 

होंठों पे जनाब आता है

(फ़ेहरिस्त = लिस्ट, सूची)


ढूँढते रहते हैं रात-दिन 

जो फुरसत के रात-दिन

हो जाते हैं पस्त जब 

पर्चा रंग-ए-गुलाब आता है 

(पर्चा रंग-ए-गुलाब = नौकरी से बर्ख़ास्तगी का आदेश )


चश्मा बदल-बदल कर 

कई बार देखा

हर बार नज़रों से दूर 

नज़र सराब आता है 

(सराब = मरीचिका, मृगतृष्णा)


जा के विदेश जाके पूत 

डालते हो डेरा 

वैसे मुल्क में कहाँ 

आफ़ताब आता है 

(जाके = जिसके)

(आफ़ताब = सूरज)


कुकर पे सीटी 

न जब तक लगी हो 

दाल में भी कहाँ 

इंकलाब आता है 


पराए भी अपनों की तरह 

पेश आते हैं 'राहुल'

वक़्त कभी-कभी ऐसा भी 

खराब आता है


राहुल उपाध्याय । 31 जुलाई 2021 । सिएटल