Saturday, October 14, 2023

ग़ज़ब तेरा सिस्टम

ग़ज़ब तेरा सिस्टम 

ग़ज़ब तेरी माया

न समझा है कोई 

न तू समझाने आया


ये कैसी उदासी

ये कैसा समां है

ये हम रो रहे हैं कि 

तूने रूलाया


ये दुनिया के झगड़े 

ये दुनिया के लफड़े 

ये हम लड़ रहे हैं कि 

तूने लड़ाया 


बरसते हैं बादल

उभरते हैं सौ फल

ये सिस्टम परफ़ेक्ट 

है कैसे बनाया


कभी तू है सब कुछ 

कभी तू नहीं है

ये तेरी है लीला कि 

धोखा है खाया


ये प्रलय हो रहा है 

कि सृजन हो रहा है 

भ्रम में है हर कोई 

क़हर क्यूँ है ढाया


ये कैसा सफ़र है

ये कैसी डगर है

चलते हैं सब और

है मंज़िल बकाया 


राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2023 । सिंगापुर 










Wednesday, October 11, 2023

समय सबका जो तू बाँध ले

समय सबका जो चू बाँध ले

क्या नहीं जो तू साध ले


कब तू सोए, कब तू जागे

कब लिखे, कब पढ़े तू

कब करे मेहनत बड़ी

कब करे विश्राम तू

कब मूवी कोई देख ले

कब चला ले व्हाट्सएप 

कब फ़ेसबुक पे झांक ले


सब की एक सूची बना

उनपे ही तू काम कर

उनके अलावा न ध्यान दे

और किसी बात पर


पाँच बजे सुबह उठ

नींद से तू हाथ धो

नित्य कर्म से निवृत्त हो

कर प्रणाम भोर को


रख हिसाब हर मिनट का

न कम कर, न ज़्यादा कर

कर तू सब नाप-तोल कर 


कर ले जो सब नियम से

ख़्वाब लगेंगे सब सरल से

सफलता की सीड़ी पर

गगन चूमेंगे कदम तेरे


बात और एक तू जान ले

लीक से जो हटा नहीं 

उसने कभी कुछ किया नहीं 

वही एक इंसान है

जिसका ए-आई ले सकती स्थान है

सब कुछ है जो नपा-तुला 

पूर्व नियोजित स्क्रिप्ट सा


जो जी रहा है रेण्डम सा

कर के न कुछ कर रहा 

क्या उखाड़ सकती भला 

ए-आई उस जीव का 


राहुल उपाध्याय । 12 अक्टूबर 2023 । सिंगापुर 









एक फूल की चाह

एक फूल की चाह को

कैसे मैं नकार दूँ 

पल रहे जो ख़ार से

उनको क्यूँ बिसार दूँ


जो भी राग-द्वेष हैं

हो रहे जो क्लेश है

ये सृष्टि के बीज हैं

बनते इनसे देश है


न युद्ध हो, न कमान हो

गीता का फिर क्यों ज्ञान हो 


न पाप हो, संहार हो

पैदा क्यों अवतार हो


बढ़ रहे मसअलों से

बढ़ रहा विकास है

एक जैसी सोच से

कब हुआ विकास है


ये काँपतीं ये टोलियाँ 

ये चीखती ये गोलियाँ 

सब उचित कहलाएँगी

सब विस्मृत हो जाएँगी 

जब ध्वज नया कोई लहराएगा 

जब राष्ट्रगीत एक बन जाएगा 


राहुल उपाध्याय । 11 अक्टूबर 2023 । सिंगापुर 










Saturday, October 7, 2023

पुरस्कार

पुरस्कार पाने के लिए 

कितनी मेहनत करनी पड़ती है

आप नहीं जानते


पहले अपनी ही कृति पर

मंत्र-मुग्ध होना पड़ता है

इससे अच्छा कोई रच नहीं सकता

इसका भरोसा दिलाना पड़ता है 


फिर प्रकाशन के लिए

प्रचुर मात्रा में धन कमाना पड़ता है

या फिर किसी संस्थान से

अनुदान हथियाना पड़ता है 


छपने के बाद 

तमाम अकादमियों को 

ढूँढना पड़ता है

जो अमुक वर्ष में अमुक प्रकार की

प्रकाशित कृतियों को स्वीकार करता हो

उस अमुक प्रांत का बन के दिखाना पड़ता है 

हाँ यहीं हम पैदा हुए थे

नहीं यहाँ हम स्कूल गए थे

नहीं यहाँ हमारी बहन की ससुराल है

क्या बात कर रहे हैं?

यहीं तो हर साल हम अपने गुरूजी से मिलने आते हैं 


रचना पड़ने की फ़ुरसत किसे है

तो विज्ञप्ति लिखने की ज़हमत भी कोई क्यों उठाए

अकादमी ही स्वयं कह देती है कि

जब आप ही कह रहे हैं कि ये पुरस्कार के लायक़ है

तो आप ही लिख दीजिए 


राहुल उपाध्याय । 8 अक्टूबर 2023 । सिंगापुर 



इतवारी पहेली: 2023/10/8


इतवारी पहेली:


न साधु से कर, न ## ## #

मोहब्बत कर किसी #%# #


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya



आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 

सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 15 अक्टूबर 2023 को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 8 अक्टूबर 2023 । सिंगापुर 




Re: इतवारी पहेली: 2023/10/1



On Sun, Oct 1, 2023 at 9:03 AM Rahul Upadhyaya <kavishavi@gmail.com> wrote:

इतवारी पहेली:


पहुँचते ही पश्चिम #%## #

ख़ुशी से गड्ढे गए ## ## #


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya



आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 

सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 8 अक्टूबर 2023 को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 1 अक्टूबर 2023 । सिंगापुर 




Thursday, October 5, 2023

मुझे सुख जहान के मिल गए

इतने मज़े में मैं कभी न था

मुझे सुख जहान के मिल गए


भटक रहा था अंधेरों में मैं 

मुझे दो चिराग़ से मिल गए 


इतनी हसीन है ये ज़िन्दगी 

चाहे जो भी वे मुझे मिल गए


जो न मिट सके, नश्वर नहीं 

मुझे सब यहीं पे मिल गए


मैं हूँ इक खड़ूस, इक कठोर सा

मुझे किसलिए ये मिल गए


राहुल उपाध्याय । 6 अक्टूबर 2023 । सिंगापुर