पहले कपड़े
खूँटी पर टंगे दिखते थे
फिर अलमारी में बंद हो गए
अब अलमारी भी दीवार में
छुप गई है
बटोरना बंद नहीं हुआ
छुपाना शुरू हो गया है
राहुल उपाध्याय । 2 दिसम्बर 2024 । सिएटल
पहले कपड़े
खूँटी पर टंगे दिखते थे
फिर अलमारी में बंद हो गए
अब अलमारी भी दीवार में
छुप गई है
बटोरना बंद नहीं हुआ
छुपाना शुरू हो गया है
राहुल उपाध्याय । 2 दिसम्बर 2024 । सिएटल
इतवारी पहेली:
स्टॉक में आई ये कैसी ####
लग रहा है जैसे कहीं ## ##
इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर।
जैसे कि:
हे हनुमान, राम, जानकी
रक्षा करो मेरी जान की
ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं।
Https://tinyurl.com/RahulPaheliya
आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं।
सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 8 दिसम्बर 2024 को - उत्तर बता दूँगा।
राहुल उपाध्याय । 1 दिसम्बर 2024 । सिएटल
इतवारी पहेली:
त्रिपुरा की राजधानी है #####
मत खाइएगा कुछ, है ### ##
इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर।
जैसे कि:
हे हनुमान, राम, जानकी
रक्षा करो मेरी जान की
ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं।
Https://tinyurl.com/RahulPaheliya
आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं।
सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 1 दिसम्बर 2024 को - उत्तर बता दूँगा।
राहुल उपाध्याय । 24 नवम्बर 2024 । सिएटल
तुम अकेले रहते हो
इसका मतलब यह नहीं
कि विपासना करते हो
क्या बिन बोले,
सुने, देखे, पढ़े, लिखे
रह सकते हो?
जब तुम तन्हा हो
विचार रहित
तब तुम क्या हो?
साँस लेता पुतला?
ख़ुद ही को पालता-पोसता
शर्म आनी चाहिए तुम्हें
राहुल उपाध्याय । 30 नवम्बर 2024 । सिएटल
चलते-चलते आदमी हो जाता है ढेर
करना है तो आज कर, कल न हो सबेर
हार-जीत की सोच ना, सोच करे नुकसान
करने वाले कर गए काम बड़े महान
चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोए
आटा-वाटा रोग है, खाए बीमार होए
हाथों में है जान तो है सारा जहान
यार-दोस्त, भाई-भतीजे सब करे सम्मान
छोटी सी ये यात्रा, छोटा सा ये खेल
धक्का-मुक्का ना करो, कसो ना नकेल
राहुल उपाध्याय । 28 नवम्बर 2024 । सिएटल
पढ़-लिख के रात-दिन हुए नौकरी को भेंट
हैं कहाँ वो आदमी जो कर रहे इन्वेंट
आधे से ज़्यादा आदमी हैं बंधुआ मज़दूर
कहने को वे पा रहे छुट्टियाँ भरपूर
जोड़ते-जोड़ते आएगा एक दिन ऐसा मोड़
जाते वक़्त तुम जाओगे सब यहाँ पे छोड़
सब दिन होंगे एक से, याद रखो इक बात
सुख-दुख सारे एक हैं, सोच ही देती मात
वजन न होता कम कभी, देखो धरती ओर
घूमती-फिरती रात-दिन, खाए न एक भी कौर
राहुल उपाध्याय । 28 नवम्बर 2024 । सिएटल
कामकाज जो करे, मिले ना उचित दाम
बिन काम किये कोई पा रहा इनाम
इस दुनिया की रीत को कहूँ मैं अत्याचार
सीधा-सादा रो रहा, नाचे व्याभिचार
आगे-पीछे कुछ नहीं जो है सो ये सार
परलोक की बात पर करो ना सोच-विचार
जीवन है कुछ और नहीं पल दो पल का प्यार
जी लो इसमें ज़िंदगी, बाक़ी सब बेकार
राहुल उपाध्याय । 27 नवम्बर 2024 । सिएटल