Sunday, May 20, 2012

झुलसता हूँ मैं


झुलसता हूँ मैं
और तुम समझते हो कि
मैं छुट्टी कर गया

झूठ है कि
अमावस को मैं उगता नहीं
उगता तो हूँ
पर तुम्हें दिखता नहीं

और आज
जब दिखाई दे रहा हूँ
तो
तुम देख सकते नहीं
बड़े आए सच जानने वाले
तुम सच झेल सकते नहीं

झुलसता हूँ मैं
और तुम समझते हो कि...

सिएटल । 513-341-6798
20 मई 2012 (सूर्यग्रहण)


Friday, May 18, 2012

ए भाई, ज़रा देखके खरीद


ए भाई, ज़रा देखके खरीद
facebook ही नहीं apple भी
apple ही नहीं google भी,
google ही नहीं groupon भी

तू जहाँ धन लगाएगा,
वो तेरा -
घर नहीं,
गली नहीं,
गाँव नहीं,
कूचा नहीं,
बस्ती नहीं,
रस्ता नहीं,
स्टॉक मार्केट है,
और प्यारे,
स्टॉक मार्केट ये सर्कस है
और सर्कस में -
बड़े को भी, छोटे को भी
खरे को भी, खोटे को भी,
दुबले  को भी, मोटे को भी,
ऊँचे को नीचे में,
महंगे को सस्ते में
बेच जाना यहाँ पड़ता है

और रिंग मास्टर के कोड़े पर -
कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो पैसा है,
कोड़ा जो क़िस्मत है
तरह-तरह नाच के दिखाना यहाँ पड़ता है
बार-बार रोना और गाना यहाँ पड़ता है
हीरो से जोकर बन जाना यहाँ पड़ता है

Yahoo से न सीखता है क्यूँ?
AOL को भूलता है क्यूँ?
सोच के खरीद
वरना इनके चंगुल में फ़ँस जाएगा
खरीदेगा एक बार
फिर खरीदता चला जाएगा
डॉट-कॉम है चीज़ क्या तभी जान पायेगा
हँसता हुआ आया है, रोता चला जाएगा

क्या है करिश्मा,
कैसा खिलवाड़ है
अप, अप
ओनर, बैंकर
लेते बाजी मार है
अप, अप
करते हैं कैश ये
देते हैं बेच ये
फिर भी हम इनसे सीखते नहीं यार हैं

और यहाँ तक कि
पैसा जितना खोते हैं
लुट जितना जाते हैं
उधार उतना लेते हैं
और स्टॉक पे स्टॉक लेते रहते यार हैं
कहिए श्रीमान आपका क्या विचार है?

सर्कस
हाँ बाबू, ये सर्कस है
और ये सर्कस है
शो तीन घंटे का
पहला घंटा हाईप है,
दूसरा करेक्शन है
तीसरा डाऊनग्रेड है

और उसके बाद - माँ नहीं, बाप नहीं
बेटा नहीं, बेटी नहीं, तू नहीं,
मैं नहीं, कुछ भी नहीं रहता है
रहता है जो कुछ वो - ख़ाली-ख़ाली कुर्सियाँ हैं
ख़ाली-ख़ाली तम्बू है, ख़ाली-ख़ाली घेरा है
बिना चिड़िया का बसेरा है, न तेरा है, न मेरा है

सिएटल,
18 मई 2012
(नीरज से क्षमायाचना सहित)
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डॉट-कॉम = .com
ओनर = owner
बैंकर = banker
कैश = cash
हाईप = hype
करेक्शन = correction
डाऊनग्रेड है = downgrade

Tuesday, May 15, 2012

चरण स्पर्श करने वाले हाथ मिलाने लगे हैं

चरण स्पर्श करने वाले हाथ मिलाने लगे हैं
बदला है मौसम, गिरगिट बताने लगे हैं

यारो, यारी की ये दुनिया नहीं है
भाई साहब कह के लोग बुलाने लगे हैं

उन्हें देखते ही वो सब हरे हो गए
सुखाने में जिन्हें ज़माने लगे हैं

जिन्हें कहते थे जी भर के सुनाओ जी नगमें
आज वो ही हमें खूब पकाने लगे हैं

पढ़ने और सुनने की चीज़ है कविता
क्लिफ़ नोट्स के सहारे वो पढ़ाने लगे हैं

सिएटल । +1-513-341-6798
15 मई 2012
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 क्लिफ़ नोट्स = Cliff Notes

Thursday, May 10, 2012

मैं अपनी माँ से दूर

मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

हर हफ़्ते
मैं उसका हाल पूछता हूँ
और अपना हाल सुनाता हूँ

सुनो माँ,
कुछ दिन पहले
हम ग्राँड केन्यन गए थे
कुछ दिन बाद
हम विक्टोरिया-वेन्कूवर जाएगें
दिसम्बर में हम केन्कून गए थे
और जून में माउंट रेनियर जाने का विचार है

देखो न माँ,
ये कितना बड़ा देश है
और यहाँ देखने को कितना कुछ है
चाहे दूर हो या पास
गाड़ी उठाई और पहुँच गए
फोन घुमाया
कम्प्यूटर का बटन दबाया
और प्लेन का टिकट, होटल आदि
सब मिनटों में तैयार है

तुम आओगी न माँ
तो मैं तुम्हे भी सब दिखलाऊँगा

लेकिन
यह सच नहीं बता पाता हूँ कि
20 मील की दूरी पर रहने वालो से
मैं तुम्हें नहीं मिला पाऊँगा
क्यूंकि कहने को तो हैं मेरे दोस्त
लेकिन मैं खुद उनसे कभी-कभार ही मिल पाता हूँ

माँ खुश है कि
मैं यहाँ मंदिर भी जाता हूँ
लेकिन
मैं यह सच कहने का साहस नहीं जुटा पाता हूँ
कि मैं वहाँ पूजा नहीं
सिर्फ़ पेट-पूजा ही कर पाता हूँ

बार बार उसे जताता हूँ कि
मेरे पास एक बड़ा घर है
यार्ड है
लाँन में हरी-हरी घास है
न चिंता है
न फ़िक्र है
हर चीज मेरे पास है
लेकिन
सच नहीं बता पाता हूँ कि
मुझे किसी न किसी कमी का
हर वक्त रहता अहसास है

न काम की है दिक्कत
न ट्रैफ़िक की है झिकझिक
लेकिन हर रात
एक नए कल की
आशंका से घिर जाता हूँ
आधी रात को नींद खुलने पर
घबरा के बैठ जाता हूँ

मैं लिखता हूँ कविताएँ
लोगो को सुनाता हूँ
लेकिन
मैं यह कविता
अपनी माँ को ही नहीं सुना पाता हूँ

लोग हँसते हैं
मैं रोता हूँ

मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

Wednesday, May 2, 2012

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की



कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत मगर सांवली सी
चलो चेक करूँ ई-मेल आती ही होगी
कह कह के लॉगिन करती तो होगी
कोई कॉल शायद मिस हो गया हो
सेल फोन बार बार देखती तो होगी
और फिर फोन की घंटी बजते ही वो
उसी फोन से डर डर जाती तो होगी

चलो पिंग करूँ जी में आता तो होगा
मगर उंगलियां कँप-कँपाती तो होंगी
माऊस हाथ से छूट जाता तो होगा
उमंगें माऊस फिर उठाती तो होंगी
मेरे नाम खास ईमोटिकॉन सोचकर
वो दांतों में उँगली दबाती तो होगी

चलो देखूँ क्या कुछ नया हो रहा है
कह कह के फ़ेसबुक पे आती तो होगी
कोई 'अपडेट' शायद मिस हो गया हो
बार-बार टाईम-लाईन टटोलती तो होगी
मेरी 'अपडेट' में ख़ुद को कविता में पाकर
बदन धीमे धीमे सुलगता तो होगा
लिखूँ कमेंट जी में आता तो होगा
कीबोर्ड पे उंगली थरथराती तो होगी
कई बार मन की उमंगो को लिख कर
वो ’कैन्सल’ बटन फ़िर दबाती तो होगी

(कमाल अमरोही से क्षमायाचना सहित)

Sunday, April 15, 2012

उससे बात हो और बात न हो

उससे बात हो और बात न हो
अच्छा लगता है

वो साथ न हो
और फिर भी साथ हो
अच्छा लगता है

इस हँसती-गाती दुनिया में
कोई मेरे लिए भी
उदास हो,
बेकरार हो
अच्छा लगता है

Few weeks ago I hurriedly went home
After spending a few days, I came back home

What a life we all live

A life there
A life here

And yet
Everyone is
So near and dear