उनके प्रति आदर जताने के लिए
हम काम-धाम छोड़ के आराम करते हैं
अव्वल तो कोई है ही नहीं जिसके पदचिन्हों पर चला जा सके
हाँ, स्वयंसेवकों के डर से भेड़चाल चलने को अवश्य तैयार रहते हैं
थे अच्छे या बुरे? है किसको पता
दिवंगत को सब आँख बंद करके प्रणाम करते हैं
राष्ट्रपिता, राज्यपिता, प्रांतपिता, धर्मपिता
न जाने क्या-क्या नाम दे कर, पिता के नाम को बदनाम करते हैं
ऐसा नहीं कि ऐसा पहले कभी हुआ नहीं
लेकिन गलती दोहराने की गलती क्यों बार-बार करते हैं?
19 नवम्बर 2012
सिएटल । 513-341-6798
