Sunday, November 9, 2014

छू लेने दो मोदीजी को झाड़ू

छू लेने दो मोदीजी को झाड़ू
कुछ और नहीं हैं नाटककार  हैं ये
इन महाशय को हमने चुना है
चूना लगाने के हक़दार हैं ये

गुंडों को नेता बनाना
वोटर की पुरानी आदत है
मोदीजी को भी न संत समझ
माना कि नहीं गुनहगार हैं ये

मत पा के हुए ये मतवाले
मस्ती का नज़ारा तुम देखो
भेड़ और बकरी की टोली है
कहते जिसे सरकार हैं ये

(साहिर से क्षमायाचना सहित)
9 नवम्बर 2014
सिएटल । 513-341-6798

Friday, November 7, 2014

कब किसने किसको घर जाते देखा

कब किसने किसको घर जाते देखा
सबने सबको बस इधर आते देखा

कोई होता घर पर तो घर भी होता
बेटा-बहू सबको हमने कमाते देखा

सब के सब हैं अपनी धुन में मगन
न सुनते किसी को न सुनाते देखा

जहाँ हो अपने, वहीं लगता है मन
मगर किसने किसको अपनाते देखा

बड़ा सा घर है और कोई बड़ा नहीं है
बच्चे बढ़े, तो उन्हें भी कदम बढ़ाते देखा

7 नवम्बर 2014
सिएटल । 513-341-6798

Monday, November 3, 2014

डूबता सूरज

डूबता सूरज सुंदर है
झड़ते पत्ते लगते प्रियकर हैं
ये कैसे 'एम्बुलेंस चेज़र' हैं हम
कि मरणासन्न को देख खुलते 'शटर' हैं

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डूबता सूरज
डूबता रहा
डूबता गया
और फिर डूब ही गया

लोग कैमरे क्लिक करते रहें
प्रियजन पीठ दिखाकर 'पोज़' देते रहें

किसी ने उसे डूबने से न रोका
किसी ने हाथ बढ़ाकर उठाने का न सोचा

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हम सब ज्ञानी-ध्यानी हैं
ज्ञान-विज्ञान की खान हैं

वो डूबा कहाँ?
वो डूबा नहीं

सब माया है
छलावा है
आज गया है
कल फिर आएगा
बस कपड़े 'लॉन्ड्री' में डाले हैं
कल नए कपड़े पहन के आएगा

और नहीं आया
तो और खुशियाँ मनाओ
कि उसे मोक्ष प्राप्त हो गया
सार बंधनों से वो मुक्त हो गया

3 नवम्बर 2014
सिएटल । 513-341-6798

परिणाम चाहे जो भी हो


कल अमरीका में मध्यावधि चुनाव है. मुझे अपनी 10 साल पुरानी लिखी कविता याद आ गई.

डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते, हमें क्या
ये मुल्क नहीं मिल्कियत हमारी
हम इन्हें समझे, हम इन्हें जाने
ये नहीं अहमियत हमारी

तलाश-ए-दौलत आए थे हम
आजमाने किस्मत आए थे हम
आते हैं खयाल हर एक दिन
जाएंगे अपने घर एक दिन
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
बदलेगी नहीं नीयत हमारी

ना तो हैं हम डेमोक्रेट
और ना ही हैं हम रिपब्लिकन
बन भी गये अगर सिटीज़न
बन न पाएंगे अमेरिकन
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
छुपेगी नहीं असलियत हमारी

न डेमोक्रेट्स के प्लान
न रिपब्लिकन्स के उद्गार
कर सकते हैं
हमारा उद्धार
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
पूछेगा नहीं कोई खैरियत हमारी

हम जो भी हैं
अपने श्रम से हैं
हम जहाँ भी हैं
अपने दम से हैं
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
काम आयेगी बस काबिलियत हमारी

फूल तो है पर वो खुशबू नहीं
फल तो है पर वो स्वाद नहीं
हर तरह की आज़ादी है
फिर भी हम आबाद नहीं
डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते
यहाँ लगेगी नहीं तबियत हमारी

Thursday, October 30, 2014

कागज़ी दुनिया

कागज़ी दुनिया
कागज़ के लोग
कागज़ है तो वजूद है
वरना आप
सूखे दरख्त से चिपका
एक काँपता हुआ पत्ता है
जो न गिरे
न भरे
बस फड़फड़ाता रहे
इस आस में कि
कब जा के माटी में मिले

किसी न किसी से
कहीं न कहीं से
आपका सम्बन्ध होना ज़रूरी है
किसी गाँव, शहर या देश की
शिनाख्त होनी ज़रूरी है
जन्मतिथि तय करना बहुत ज़रूरी है

कहा जाता है कि
झूठ बोलना पाप है
लेकिन फिर भी हज़ारों
या कहूँ कि लाखों लोग
रोज़ बेधड़क झूठ बोल रहे हैं
जो ठीक से मालूम नहीं
उसे ताल ठोक के कह रहे हैं

माँ तक को याद नहीं कि
आप कब हुए थे तो आपकी क्या बिसात

माँ कहती है कि
सावन का महीना रहा होगा
जन्माष्टमी आने वाली थी
शायद द्वादशी रही होगी
मुझे अच्छी तरह से याद है
उसी रात पड़ोसी का कुत्ता मरा था
और उन दिनों बारिश ने बुरा हाल कर रखा था
सैलाना और शिवगढ़ के बीच बसों का आना जाना बंद हो गया था
तभी तू हुआ था
जा ले आ कोई पचास साल पुराना पंचांग
और लगा ले तू हिसाब

(कितनी दयनीय स्थिति है कि
कितने अजन्मे देवताओं के (देवियों के क्यों नहीं?)
जन्मदिन हमें अच्छी तरह से याद है
और उन्हें हम धूम-धाम से मनाते हैं
और अपने ही परिजनों के जन्मदिन या तो पता नहीं होते या उन्हें हम भूल जाते हैं)

इसी कागज़ के टुकड़े से
कागज़ी सफ़र शुरू होता है

सारा ज्ञान
सारी सरस्वती
हर्फ़ों में समाई हुई है
सफ़ेद पन्नों पर
काले अक्षर हम पढ़ते जाते हैं
कागज़ काले करते जाते हैं
हरे कागज़ कमाते जाते हैं
कुछ काले हो जाते हैं
तो उन्हें सफ़ेद करने के चक्कर में
कुछ और कागज़ी कार्यवाही करने लग जाते हैं

कागज़ी दुनिया
कागज़ के लोग
कागज़ है तो वजूद है
वरना आप भूत हैं

30 अक्टूबर 2014
सिएटल । 513-341-6798

Monday, October 27, 2014

उत्सव आते हैं, उत्सव जाते हैं


उत्सव आते हैं
उत्सव जाते हैं
शुभकामनाओं के संदेश
कट-पेस्ट कर दिए जाते हैं

कब, कहॉं, किसपे क्या विपदा पड़ी
इससे किसीको कोई सरोकार नहीं
कब किसका उद्धार हुआ
किसीको कुछ पता नहीं
कब किसकी कौनसी समस्या का निवारण हुआ
इसे जानने-समझने की भी कोई ज़रूरत नहीं

पहले
पन्द्रह-बीस दिन पहले ही
संदेशे भेज दिए जाते थे
और मिल भी जाया करते थे

और अब?
मजाल है जो
दो दिन पहले भी मिल जाए
जनाब, जिस दिन पर्व होगा
उसी दिन मिलेगा
ताकि कहीं गलती से भी आप
एक दिन पहले
या एक दिन बाद
खुश न हो लें

पहले जब संदेशे भेजे जाते थे
सामनेवाला बड़ी मेहनत करता था
सोच-समझ कर कार्ड ख़रीदता था
एक अच्छी सी क़लम लेकर
अपने हाथों से आपका नाम लिखता था
रंग-बिरंगे लिफ़ाफ़ों पर
त्योहारी डाक-टिकट लगाकर
पोस्ट करता था

फिर डिजीटल युग आया
लेकिन तब भी सामनेवाला
अपने सैकड़ों कॉंटेक्ट्स में से
आपका नाम चुनकर
कम से कम
टू, सीसी या बीसीसी में
जोड़ता तो था

अब तो ये आलम है कि
शुभकामनाएँ दीवार पर चिपका दी हैं
जिसे देखना है वो देख ले
वरना हमें कौनसी गरज पड़ी है
आपको शुभकामनाएँ देने की

उत्सव आते हैं
उत्सव जाते हैं
शुभकामनाओं के संदेश
कट-पेस्ट कर दिए जाते हैं

27 अक्टूबर 2014
सिएटल । 513-341-6798

Monday, October 6, 2014

'जोक' पे 'जोक' सुनाते चलो

'जोक' पे 'जोक' सुनाते चलो
देश की लुटिया डूबोते चलो
राह में आए जो वोटर सभी
सब को उल्लू बनाते चलो
 
एक तरफ़ है ऑटो-रिक्शा
दूजी तरफ़ मंगलयान हमारा
दोनों में नहीं कोई बराबरी
पर ये बराबरी करवाए
सेव से संतरे की तुलना कराते चलो
 
जब कभी भी भाषण मारे
निर्यात के ही लगाए नारे
निर्यात से भला किसका भला हुआ
निर्यात श्रमिक को निचोड़े
देश को बंग्लादेश बनाते चलो
 
अमरीका आए, सब पे छाए
ब्रेन-ड्रेनियों का 'ब्रेन-वाश' किया
'मेक इन इण्डिया' नारा इनका
'बोर्न इन इण्डिया' बाहर भेजना इनको
'ब्रेन-ड्रेन' बढ़ाते चलो
 
6 अक्टूबर 2014
सिएटल । 513-341-6798
(मोदीजी के मेडिसन स्क्वेयर गार्डन में दिए गए भाषण से प्रेरित, भरत व्यास से क्षमायाचना सहित)
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जोक = joke
ब्रेन-ड्रेन = brain-drain
ब्रेन-वाश = brain-wash
मेक इन इण्डिया = make in India
बोर्न इन इण्डिया = born in India