Wednesday, July 26, 2017

भरा हुआ अर्ध विराम (1)

तुमने कभी नदी को सागर से मिलते देखा है?

नदी फैल सी जाती है

सागर उमड़ता आता है


तुमने कभी किसी को बाँहों में भरते देखा है?

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अर्ध विराम = ;

भरा हुआ अर्ध विराम = pregnant pause

(1) - इस श्रंखला की पहली कड़ी


Tuesday, July 25, 2017

पग-पग का है अहसास मुझे

क्या भूलूँ 

क्या मैं याद करूँ 

पग-पग का है अहसास मुझे


कई प्रधानमंत्री गए

कई प्रधानमंत्री आए

कई राष्ट्रपति गए

कई राष्ट्रपति आए

इन सब का मुझे कोई भास नहीं 

पर

कब किसने मेरी बाँह थामी

कब किसका मैंने साथ दिया

इन सबका है अहसास मुझे

पग-पग का है अहसास मुझे


चला था नीड़ से नीड़ निर्माण की ओर

पता न चला कब टूटी डोर

रात भयावह सी आती है

माँ की ममता चीत्कारती है

सुबह होते-होते

तस्वीर बदल सी जाती है

घड़ी के काँटों में मैं फँस जाता हूँ

कब ह्रास हुआ

कब हास हुआ

इन सबका है अहसास मुझे

पग-पग का है अहसास मुझे


क्या कर्म मेरा

क्या वर्ण मेरा

उत्तर क्या

ये प्रश्न मेरा


पश्चिम में क्यूँ पूरब के ख़्वाब आते

घर होते हुए क्यूँ हम बेघर हो जाते


एक-एक प्रश्न है याद मुझे

पग-पग का है अहसास मुझे


क्या भूलूँ 

क्या मैं याद करूँ 

पग-पग का है अहसास मुझे


(घर छोड़ने की 35 वीं वर्षगाँठ पर)

25 जुलाई 2017

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नीड़ = घोंसला, घर

ह्वास = घिस जाना, कम हो जाना, घट जाना

हास = परिहास, हँसी




Friday, June 30, 2017

इन्द्रधनुष का गणित

इन्द्रधनुष का गणित

जबसे समझ में आया

गार्डन होज़ के फ़व्वारे को

घुमा-फिरा के 

इन्द्रधनुष बना लेता हूँ


अब वो मज़ा कहाँ

भाग-भाग के

देखने का

दिखाने का

अड़ोसी-पॾोसी को

बताने का


अब रंगीं खिलौने भी

बेरंग से लगते हैं

जादूगरी के वीडियों भी

बचकाने से लगते हैं


वही कबूतर

वही रूमाल

वही लड़की

वही आरी


सब कुछ वही है

कुछ भी नया नहीं है


ग़म और ख़ुशी 

सब देख चुके हैं

पॉवर बदलते

बाईफोकल लैंस


कभी बहुत दु:ख हुआ था

छतरी के खोने पे

आज कोई इंसान भी चला जाए

तो सोचता हूँ

क्या रखा है रोने-धोने में 


इन्द्रधनुष का गणित

जबसे समझ में आया ...


30 जून 2017

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Friday, June 23, 2017

फ़ेसबुक की तरह हँसता ही रहा हूँ मैं

फ़ेसबुक की तरह

हँसता ही रहा हूँ मैं 

कभी इस 'पोज़' में 

कभी उस 'पोज़' में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


मैं देता रहा

ख़ुशख़बरियाँ कई

मेरी बात मेरे

मन ही में रही

यूँही घुट-घुट के

यूँही झूठमूठ में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


कैसे जुड़ गया

कैसे जोड़ा गया

किस-किससे मुझे

फिर जोड़ा गया

कभी इस गुट में 

कभी उस गुट में 

हँसता ही रहा हूँ मैं 


अपनों की सुनूँ 

या कि ग़ैरों की

हर तरफ़ है फ़ौज 

बे-सर-पैरों की

कभी इस तर्क पे

कभी उस तर्क पे

हँसता ही रहा हूँ मैं 


(रवीन्द्र जैन से क्षमायाचना सहित)

23 जून 2017

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Friday, June 2, 2017

सपाट ही बहता 'गर टकराया न होता

सपाट ही बहता

'गर टकराया न होता

न लहरें उठतीं

न उफान ही आता

'गर किनारा न होता


कोई सहारा कहे

और सराहा करे

और कोई कि काश!

माथे पे सेहरा

बाँधा न होता


है पत्थर एक नींव 

कि बाधा है कोई

कोई बताता भी भेद

तो माना न होता


घड़ी के काँटों सा है

सबका सफ़र 

बारह पर पहुँच कर भी

पूरा न होता


हमें होता पता

कि मंज़िल नहीं है

तो एक भी क़दम 

उठाया न होता


2 जून 2017

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Friday, May 26, 2017

मेरी कविता में कईयों की छाप है

मेरी कविता में 

कईयों की छाप है


किसी रेवड़ी वाले की पुकार है

किसी खोमचे वाले की आवाज़ है

किसी शिक्षक की सीख है

किसी अल्हड़ का सुराग़ है

किसी अंचल का शब्द है

किसी आँचल का लाड़ है

किसी बेटे का दर्द है

किसी प्रेमी का प्यार है

किसी जवाँ का जोश है

किसी अधेड़ की भड़ास है


नहीं है तो बस वह

जिसे कहते प्रबुद्धजन

छन्द, बिम्ब या अलंकार हैं


26 मई 2017

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Wednesday, May 10, 2017

न दिल देखा, न जां देखी

आदमी सेवा से बड़ा 

और मेवा से मोटा बनता है

घर चाहे कितना ही बड़ा हो

ग़ैरों के लिए छोटा पड़ता है


ये नदी, ये नाले

ये पर्वत श्रंखलाएँ 

इनका भी हिसाब

इंसान अब जोड़ा करता है


तुम कितने अच्छे हो

तुम्हें कैसे बताऊँ 

जितना भी कहूँ 

थोड़ा लगता है


न दिल देखा

न जां देखी

आँखों में ही तो

इन्सान सोता-जगता है


मोहब्बत की राहें 

इतनी मुश्किल भी नहीं 'राहुल'

क्यूँ बात-बात पे यूँ

रोता रहता है


10 मई 2017

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