Friday, June 24, 2022

एकतरफ़ा प्यार

कौन कहता है कि

इश्क़ छुपता नहीं है 

फिर ये एकतरफ़ा प्यार क्या है?


वो क्यों नहीं देख पाती है कि

मैं हर पल बेचैन हूँ 

जोहता उसके नैन हूँ 

रहता उसके साथ हूँ 

उसका ही मैं दास हूँ 

मुस्कान पे उसके 

छिड़कता अपनी जान हूँ 

लहराती ज़ुल्फ़ 

शानों पे दुपट्टा

आँखों में चमक

मोती से दांत 

हर लेते हैं मेरा

सब कुछ अकस्मात् 


क्यूँ देखती नहीं है 

समझती नहीं है 

मोहब्बत नहीं 

तो नफ़रत ही कर ले

कुछ तो मेरी इज़्ज़त रख ले


राहुल उपाध्याय । 24 जून 2022 । सिएटल 

http://mere--words.blogspot.com/2022/06/blog-post_8.html?m=1




एकतरफ़ा प्यार

कौन कहता है कि

इश्क़ छुपता नहीं है 

फिर ये एकतरफ़ा प्यार क्या है?


वो क्यों नहीं देख पाती है कि

मैं हर पल बेचैन हूँ 

जोहता उसके नैन हूँ 

रहता उसके साथ हूँ 

उसका ही मैं दास हूँ 

मुस्कान पे उसके 

छिड़कता अपनी जान हूँ 

लहराती ज़ुल्फ़ 

शानों पे दुपट्टा

आँखों में चमक

मोती से दांत 

हर लेते हैं मेरा

सब कुछ अकस्मात् 


क्यूँ देखती नहीं है 

समझती नहीं है 

मोहब्बत नहीं 

तो नफ़रत ही कर ले

कुछ तो मेरी इज़्ज़त रख ले


राहुल उपाध्याय । 24 जून 2022 । सिएटल 



तो आँख लग भी जाए

ग़म है फ़िज़ा में 

न मिलती दवा है

वो पास आए

दिल से लगाए

तो आँख लग भी जाए


दर्द है, जवाँ है 

न मिलती दवा है

वो पास आए

दिल से लगाए

तो आँख लग भी जाए


हालात भी कुछ ठीक नहीं हैं हमारे 

क्या फ़ायदा जब डूबे हों चाँद-सितारे 

किससे कहें हम, किसको कहें हम

वो पास आए

दिल से लगाए

तो आँख लग भी जाए


हाँ आज भी रखते हैं हम आस उनसे

जो हो गए दूर बन के ख़िज़ाँ चमन से

जो रहते ख़फ़ा हैं, न करते वफ़ा हैं

वो पास आए

दिल से लगाए

तो आँख लग भी जाए


दाग भी लग गए हैं जो अब ना धुलेंगे 

राज़ भी दब गए हैं जो अब ना खुलेंगे

हमें इससे क्या है, हमें तो पता है

वो पास आए

दिल से लगाए

तो आँख लग भी जाए


राहुल उपाध्याय । 24 जून 2022 । सिएटल 


Thursday, June 23, 2022

पेड़? ये किस चिड़िया का नाम है?

जो सेब

पेड़ से मिलते हैं 

और दुकान पर मिलते हैं 

अलग होते हैं 


दिखते अलग हैं 

लगते अलग हैं 

फेसियल किए हुए

आकर्षक, चमकीले-दमकीले लगते हैं

दाग नहीं होते

आड़ें-टेढ़ें नहीं होते

कीड़े नहीं निकलते


क़ीमत बढ़ जाती है 

माँग बढ़ जाती है 


लोग 

पेड़ से लेना बंद कर देते हैं 

कौन इतनी झंझट पाले?

मेहनत की कमाई से

बैठे-बिठाए अच्छे, साफ़-सुथरे फल मिल जाते हैं 


जिससे लेना बंद कर दिया 

उसे देखना भी क्यों?

और पेड़ भी दिखना बंद हो जाते हैं 


कुछ दिनों बाद,

पेड़?

ये किस चिड़िया का नाम है?


न फल पेड़ से आते हैं 

न दूध गाय से आता है 

सब दुकान से आता है 


थोड़े दिनों बाद 

दुकानें भी न रह पाएँगी 

सब फ़ोन से मिल जाया करेगा


राहुल उपाध्याय । 23 जून 2022 । सिएटल 







भूल भुलैया - 2

भूल भुलैया- 2 एक वाहियात और एक बहुत अच्छी फ़िल्म है। 


वाहियात इसलिए कि कहानी के नाम पर कुछ नहीं है। 


बहुत अच्छी इसलिए कि कहानी न होते हुए भी आज के संदर्भों को जोड़ती हुए तेज गति से दौड़ती यह फ़िल्म दर्शक को बाँधे रखती है। इसका श्रेय चुस्त पटकथा, अनुपम निर्देशन और उच्च कोटि के अभिनय को जाता है। 


कार्तिक आर्यन अब अभिनय में परिपक्व हो गए हैं। अमोल पालेकर से लेकर नसीरूद्दीन शाह सब अच्छे अभिनेता हैं। लेकिन न नवाज़, न मनोज बाजपेयी वैसा नृत्य कर सकते हैं जैसा कार्तिक करते हैं या अल्लू अर्जुन। तभी इनका रुतबा है। ये स्टार हैं। 


फ़िल्म को मनोरंजक बनाने में स्टार का बड़ा हाथ होता है और यह आवश्यक है। 


फ़िल्म ख़त्म होने पर इस फ़्रेंचाइज़ का हिट गाना बजता है - हरे राम हरे कृष्ण- स्क्रोलिंग टाईटल्स के साथ। वाह क्या संगीत है, क्या गायन है और क्या सम्मोहित करने वाला नृत्य है। कार्तिक का फुटवर्क कमाल का है। 


घर पर देखने का फ़ायदा यह है कि यह गाना बार-बार देखा जा सकता है। 


तबू, राजपाल यादव, और संजय मिश्रा की अदायगी भी प्रशंसनीय है। 


पैसा वसूल फ़िल्म है। 


राहुल उपाध्याय । 23 जून 2022 । सिएटल 


Tuesday, June 21, 2022

बस यही बात ज़माने को बुरी लगती है

मेरी रातों में, मेरे दिन में वो साथ रहती है 

बस यही बात ज़माने को बुरी लगती है

मेरे गीतों में झलक उसकी सदा दिखती है 

बस यही बात ज़माने को बुरी लगती है


मेरे हर तार में वो नज़र आती है 

मेरी हर साँस में वो साँस ले आती है उसकी ख़ुशबू मेरे गीतों को जवां रखती है 

बस यही बात ज़माने को बुरी लगती है


मैंने बचपन से उसे साथ-साथ देखा है

अपनी आँखों से उसे साफ़-साफ़ देखा है 

उसकी रूनझून मेरे कानों में सदा रहती है 

बस यही बात ज़माने को बुरी लगती है


जो कहूँ सच तो मैं सच में बुरा बनता हूँ 

न कहूँ सच तो मैं बिक गया हूँ लगता हूँ

ये जो उलझन, परेशान न मुझे करती है 

बस यही बात ज़माने को बुरी लगती है


राहुल उपाध्याय । 21 जून 2022 । सिएटल 



उम्मीद

जब से ब्रेकअप हुआ है 

घर ज़्यादा ही साफ़ रखता हूँ 

न जाने वो कब आ जाए


वह नहीं चाहती कि

घर में चीज़ें फैली रहें

बिस्तर बना न हो

कपड़े बिखरे पड़े हो

सिंक में गंदे बर्तन हों

कहीं नमक गिरा हो

कहीं हल्दी के दाग हो

काउंटर पूरा साफ़ होना चाहिए 

क्लटर बिलकुल पसन्द नहीं 

सारी चीजें या तो अलमारी में हों

या दराज़ में

एक भी फ़ालतू चीज़ बाहर नहीं दिखनी चाहिए 


जानता हूँ 

वह बिन बुलाए 

या बिन बताए 

नहीं आएगी


लेकिन घर साफ़ रखने में 

बुराई ही क्या है 


यह सोच ही रहा था कि

उसका टेक्स्ट आ गया 

(जिसकी इस जन्म में तो कोई उम्मीद नहीं थी)

फ़ोन पर बात भी हो गई

(यह तो सात जन्म में भी सम्भव नहीं था)


बस वह नहीं कहा

जो मैं सुनना चाहता था 


उम्मीद पर दुनिया टिकी है 

और आशिक़ तो नहा-धो के बैठा है 


राहुल उपाध्याय । 21 जून 2022 । सिएटल