Saturday, February 27, 2016

घड़ी


RTहुM presents


वक़्त की क़ैद में ज़िंदगी है मगर
चंद घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं
(फ़ैयाज़ हाशमी)

जी हाँ, फ़ैयाज़ साहब ने सही कहा, इन घड़ियों के अलावा सारी घड़ियाँ या तो कलाई पर पट्टे से बंधी हुई हैं या फिर खूँटे से टाँग दी गई हैं। 

लीजिए प्रस्तुत हैं मेरी दो कविताएँ घड़ी से सम्बन्धित। 

#1

घड़ी भी अजीब है
नई है
फिर भी सेकण्ड हैण्ड है

काँटे भी हैं
जो दिन-रात चेहरे पर चलते रहते हैं
फिर भी लहूलुहान नहीं होती

सुबह सवा-सात का तमंचा
ऐसा डराता है कि
मैं मवेशियों की तरह
निकल पड़ता हूँ घर से
और
पौने-पाँच का तमंचा देखकर
बटोरने लगता हूँ अपना बस्ता
लौट आता हूँ अपने घर

रात के
सवा-नौ बजे
चित्त हो जाता हूँ
सवा-नौ की तरह

दिन में दस-दस पर
मुस्कुराती भी होगी
पर मेरे पास फ़ुरसत ही कहाँ
इसे देखने की

देखने में है छोटी सी
ज़्यादा आवाज़ भी नहीं करती
लेकिन जाने क्या है कि
इसका दबदबा बना रहता है

#2
घड़ी भी चलते-चलते
थक जाती है
सुस्त हो जाती है

कभी
एक मिनट
तो कभी
दो मिनट 
पीछे हो जाती है
और कभी-कभी तो
घंटों पीछे हो जाती है

लेकिन समय
फिर भी साथ नहीं छोड़ता
कभी भी घड़ी को
छ: घंटे से ज्यादा
पीछे नहीं होने देता

यहाँ तक कि
कई बार तो ऐसा भी आभास होता है
कि समय पीछे रह गया
और घड़ी आगे निकल गई

और फिर वो दोनों
एक पल के लिए ही सही
साथ हो जाते हैं

दोनों एक दूसरे के साथ
आगे-पीछे
चलते रहते हैं
जैसे
शाम को
किसी मोहल्ले में
निकले हो
अंकल-आंटी
टहलने को

सिएटल | 425-445-0827

Tuesday, February 23, 2016

फूल और काँटे

RTहुM presents
 




कौन कहता है कि
फूल होंगे तो काँटे भी होंगे 

फल देने वाले पेड़ों पर
फूल तो होते हैं
पर काँटे नहीं होते

सिएटल | 425-445-0827

Monday, February 22, 2016

Chicken and egg

RTहुM presents

बीज है तो फल है
फल है तो बीज है

न पूर्वार्ध है कोई 
न उत्तरार्ध है कोई
सब के सब हैं
गोलार्ध  कोई 


सिएटल । 425-445-0827

Friday, February 19, 2016

कभी किसी को मुकम्मल फ़ोन नहीं मिलता


कभी किसी को मुकम्मल फ़ोन नहीं मिलता
कहीं ये फ़ीचर तो कहीं वो फ़ीचर नहीं मिलता

जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है
फ़ोन मिला है पर फ़ोन पर नहीं मिलता

तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि नेटवर्क न हो
जहाँ ज़रूरत हो इसकी उधर नहीं मिलता

सूखा सका है भला कौन स्मार्टफ़ोन गीले
गिले हो लाख अगर सुख नहीं मिलता

उनको मिले ख़ुदा जिन्हें है ख़ुदा की तलाश
मुझको तो मेरे यार का नम्बर नहीं मिलता

सिएटल । 425-445-0827
(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)






Tuesday, December 15, 2015

आजकल टाईम देखने का भी टाईम नहीं है

आजकल 
टाईम देखने का भी टाईम नहीं है
टाईम देखो तो टाईम ख़र्च होता है

पता चलता है कि
दो व्हाट्सैप मैसेजेस आए हैं
तीन फ़ेसबुक अपडेट्स
और पचासों फ़ीड्स
जिनको देखते-देखते
घंटा कब निकल जाता है
पता ही नहीं चलता है

फ़ोन है
पर फ़ोन आता नहीं 

घड़ी है
पर घड़ी पहनते नहीं

घर है
पर घर पर मिलते नहीं 
(स्टारबक्स पर मिलें?)

हम जबसे स्मार्ट हुए है
तबसे चीज़ों का सही 
इस्तेमाल करना
भूल गए हैं

ये न सोचो 
इसमें अपनी
कार है कि जीप है
उसे अपना लो
जो भी करती भीड़ है
ये ज़िद छोड़ो
मुँह न मोड़ो
हर घर का दर्शन है
ये गराज है
इस गराज का
यही है
यही है
सदुपयोग
थोड़ी कुर्सियाँ 
थोड़े डब्बे
पिंग-पांग टेबल
दो-चार पंखे
यही है
यही है
इनका सही स्थान
ये गराज है
इस गराज का
यही है
यही है
सदुपयोग

15 दिसम्बर 2015
सिएटल | 425-445-0827
(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)





Friday, December 11, 2015

जब भी कोई फ़ैसला आता है


जब भी कोई फ़ैसला आता है
हम जज बन जाते हैं
और जब बात अपने पर आती है
तो वकालत करने लगते हैं

दो-चार
समाचार क्या पढ़ लिए
एक-दो
विडियो क्या देख लिए
पा जाते हैं
आधार
पर्याप्त 
किसी को भी
कोई भी
सज़ा
सुनाने के लिए

बस चले
तो
फाँसी पर लटका भी सकते हैं

अच्छा ही हुआ
हम
ज़्यादा 
पढ़े-लिखे नहीं
वरना
आज
किसी कोर्ट में होते
किसी न किसी पर
अपने पूर्वाग्रह
थोप रहे होते 

11 दिसम्बर 2015
सिएटल | 425-445-0827

Sunday, December 6, 2015

ये आँखें बोलती हैं


ये आँखें बोलती हैं
सब को तोलती हैं
ज़बाँ का, कान का काम
ख़ुद को सौंपती हैं

कहे इससे न मिलना
कहे उससे न मिलना
ये दुनिया है सयानी
दिलों को तोड़ती है

कहे इससे न मिलना
कहे उससे न मिलना
ये दुनिया की नादानी
दिलों को जोड़ती है

है कोई मीरा कहीं पे
है कोई राधा कहीं पे
तो कोई तुलसी के दल सी
प्रभु को ओढ़ती है

कभी हम थे बेगाने
तो थे हम भी सयाने
है आज दिल जो लगाया
आत्मा झकझोड़ती है

6 दिसम्बर 2015
सिएटल | 425-445-0827