Sunday, June 19, 2022

इतवारी पहेली: 2022/06/19


इतवारी पहेली:


सूरज पिता और ## ## #

प्रकृति ही हमारी #%## #


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya 


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 


सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 26 जून को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 19 जून 2022 । सिएटल 
















Re: इतवारी पहेली: 2022/06/12



शनि, 11 जून 2022 को अ 10:49 पर को Rahul Upadhyaya <kavishavi@gmail.com> ने लिखा:

इतवारी पहेली:


एक विवाद पर हुई कितनी ###

क्या कभी सोचा है आपने ## #?


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya 


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 


सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 19 जून को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 12 जून 2022 । सिएटल 
















Friday, June 17, 2022

बड़ा कर्कश है रे हमरा खेवैया

बड़ा कर्कश है रे हमरा खेवैया

पार करे ना सबकी नैया 


लूटे रे बगिया

बगिया का मोर

फूल सारे तोड़ डाले

वही चहुँ ओर

लड़ रहा ऐसे जैसे हो ततैया 


घूमे दुनिया

दुनिया के देश

इत-उत डोले, कहे

मैं हूँ नरेश

ख़ुद को ही देता, देता बधईयाँ


बातें करता

करता है मन की

जो कहें सुनो, नहीं 

सुनता है जन की

फेंकता रहता है सुर में गवईया


राहुल उपाध्याय । 17 जून 2022 । सिएटल 




कुछ लोगों के लिए

कुछ लोगों के लिए

मोटा होना बहुत आसान है 

इतना आसान कि

यह एक समस्या है 


और 

बाक़ी सब के लिए …


कुछ लोगों के लिए

समय काटना मुश्किल है

इतना मुश्किल कि

कोई ढंग की वेब सीरीज़ नहीं मिलती 


और 

बाक़ी सब के लिए …


राहुल उपाध्याय । 17 जून 2022 । सिएटल 


Thursday, June 16, 2022

काँटों भरें ख़्वाब

आज की ख़बरों में हैं 

ले-ऑफ के सैलाब भी

आजकल तो आम हैं 

काँटों भरें ख़्वाब भी


काम मिले तो काम की 

होती कभी ख़ुशियाँ नहीं 

रात ढले तो रात की 

होती कभी ख़ुशियाँ नहीं 

रात हो या दिन रहें

रहते नहीं बेताब हैं 


रोइए या नाचिए 

फ़र्क कभी पड़ता नहीं

खाइए ना पीजिए 

कोई कभी पूछता नहीं 

पास हो या दूर हो

रहते वही असबाब हैं 


राहुल उपाध्याय । 16 जून 2022 । सिएटल 

https://youtu.be/wj_hQhuYsOI



Wednesday, June 15, 2022

मेरा देस से रिश्ता क्या है

छोड़ के आना और अपनाना

देस पराया जब होता है 

कितना सुंदर, कितना न्यारा

देस पराया तब होता है 


चाँद-तारों के 

सुनें थे अफ़साने 

चाँद पाया तो

समझ में ये आया

ख़ुशी बिकती नहीं है

ख़ुशी न ले पाया

मिलें मंज़र इतने

कभी न कुछ भाया 

दिल में ऐसी इच्छा जागी 

दिल हुआ रूखा सा

प्यार था इतना पैसों से कि 

सोच के भी दिल रोता है 


भूला था जो आँगन

याद वो भी आया

हुआ था दूर जिससे

याद वो भी आया

पहर वो भी आया

फँसा ख़ुद को पाया

चाह कर जाना भी 

घर न जा पाया

दिल से देस की याद न जाए 

दिल हो गया दीवाना

मेरा देस से रिश्ता क्या है 

साफ़ भला ये कब होता है


राहुल उपाध्याय । 15 जून 2022 । सिएटल 

https://youtu.be/4u7XJvgHUyo



Monday, June 13, 2022

कुछ तो है





इतने कुत्ते हैं 

एक भी भौंकता नहीं 


इतने इंसान हैं 

एक भी चीखता नहीं 


सब सभ्य हैं 

संतुष्ट हैं 


कुछ तो है कि 

बंदूक चल जाती है 

युद्ध हो जाते हैं 

जेलें भर जातीं हैं 


राहुल उपाध्याय । 13 जून 2022 । सिएटल