आगे बढ़ कर उसे मिटाने का प्रयास न किया
सिर्फ़ संडास है कह के चले आए हम
हाथ तो धोए पर संडास साफ़ न किया
हम देशभक्त नहीं, करते देश से प्यार नहीं
थोड़ी दौलत, थोड़ी सहूलियत पे फ़िदा होते हैं
चाहे हिंदू हो, मुसलमां हो, या हो धर्म कोई
बन के एन-आर-आई, देश से विदा होते हैं
कभी बच्चे, कभी बीवी, कभी कैरियर की फ़िक्र
कभी किसी और ही स्वार्थ में डूबे रहते हैं
खास कुछ करते नहीं, हाँकते जोरो की मगर
एक एक बात में दस दस झूठ छुपे रहते हैं
सिएटल 425-445-0827
23 अप्रैल 2009
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)
