Friday, October 14, 2016

बॉय स्काऊट


मैंने आज एक बॉय स्काऊट जैसा काम किया


जिस राह पर मैं रोज़ चलता हूँ

पुष्प और लताओं के बीच 

कुछ सुखमय पल बिताता हूँ

उस राह से

कल रात की आँधी से

टूटी टहनियों को हटाया

किसी धावक को

गिरने से बचाया


हे ईश्वर!

मुझे शक्ति दे

कि मैं 

हर दिन

हर अवस्था में 

हर परिस्थिति में 

बॉय स्काउट का धर्म निभा पाऊँ 


14 अक्टूबर 2016

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Tuesday, October 11, 2016

फ़ॉरवर्ड


साधन बढ़े 

संसाधन बढ़े हैं

फिर भी हम आज

मूक पड़े हैं


ऊँगलियाँ हिलती हैं

लब नहीं हिलते हैं

आस-पड़ोस से भी अब

हम नहीं मिलते हैं


ग्राहम बेल का फोन

मूक पड़ा है

हेनरी फ़ोर्ड की कार

मुँह ताक रही है


इधर की GIF

बस उधर हो रही है

किसी और की शुभकामनाएँ 

किसी और की हो रहीं हैं


हमने रखी

हमने दी हैं

मिनटों में बस 

छुट्टी की है


कट-पेस्ट होता

तो क्या हम करते?

फ़ॉरवर्ड होता

तो हम इतने बैकवर्ड होते

कि ...

साधन बढ़े 

संसाधन बढ़े हैं

फिर भी हम आज

मूक पड़े हैं


11 अक्टूबर 2016

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Saturday, October 8, 2016

काया एक रेडियो


आज मिलेगा, कल मिलेगा

जाने कब मिलेगा

सोच-सोच के मैं परेशान था

क्यूँ मिलता, कैसे मिलता

जब वो मुझमें ही विद्यमान था


जहाँ-जहाँ खोजा उसे

वहाँ-वहाँ साथ था

आगे था, पीछे था

सदा मेरे पास था


खोया था, पाया है

भेद अब समझ आया है

मैं था, मैं हूँ

बाक़ी सब माया है


माया से काया है

काया ने सब जुटाया है

मुझे तुमसे

तुम्हें मुझसे मिलवाया है


परिजनों से आशीर्वाद दिलवाया

प्रियजनों को गले लगवाया है

गाने सुनाए, गीत गवाए

सफ़ेदी में रंग लाया है


यह वाहन है

मन-भावन है

क्यूँ इसका मान करूँ

क्यूँ इसका गुणगान करूँ?

यह है तो मैं हूँ

मैं हूँ तो यह है

इन दोनों के मिश्रण को ही

कहते हम जीवन हैं


-*-*-*-


काया एक रेडियो

प्राण इसकी बैटरी


चालू करो 

रोशनी जले

खटर-पटर

कुछ आवाज़ करे


यदि

करें ध्यान

रखें संयम

तो हो सकता है

कोई स्टेशन लगे

उसी को कहते आत्मज्ञान हैं


कोई गीत सुने

कोई समाचार

तो कोई खेलकूद ही समझ पाता है

जैसी-जैसी जिसकी रूचि

वैसा-वैसा स्टेशन पकड़ पाता है

पर हर सुनने वाले का चित्त आनन्दमय हो जाता है


8 अक्टूबर 2016

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Wednesday, October 5, 2016

पास पोर्ट हो

पास पोर्ट हो

फिर भी पासपोर्ट चाहिए


ये जो सीमाएँ हैं

अदृश्य रेखाएँ हैं

जो कहने को तो अभेद्य हैं

पर खींची गई हैं

मुझसे-तुमसे

राजनेताओं से

पा सपोर्ट 


हर दीवार

एक वार है 

उस पर

जो

उस पार है


हर वार

एक दीवार पैदा करता है


हर दीवार

एक नई दीवार पैदा करती है


दीवारों के जंगल में 

हम सुरक्षित महसूस करते हैं

और साथ ही साथ

हो जाते हैं वंचित

सौहार्द से

सहयोग से

सहभागीदारिता से


ताज का मोह

ऐसा ही होता है

मोहताज तो करेगा ही


पास पोर्ट है

फिर भी पासपोर्ट चाहिए


5 अक्टूबर 2016

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Wednesday, September 7, 2016

प्रणय-पहेली


प्रिय-मिलन 
इक सपना है
जानता हूँ
फिर भी जगना है

इक मोमबत्ती ख़त्म होने तक ख़त लिखे
दूसरी ख़त्म होने तक ख़त पढ़े
फिर भी लौ जलती रही
मन मंदिर में तुम कुछ ऐसे गड़े

नित देखा
नित आस रही
मन में 
मन की बात रही

'गर कह डाली
ख़त्म हो जाऊँगा
सदा-सदा के लिए
सो जाऊँगा

यह सम्बन्ध ही
कुछ ऐसा होता है
हर मोड़ पे
अंदेशा होता है

कि खो न दूँ 
जिसे पा न सका
और रह जाऊँ 
बस उसे मान सखा

इक मोमबत्ती बुझने तक छंद लिखे
दूसरी बुझने तक छंद पढ़े
इस जलने-बुझने में रात कटी
और प्रणय-पहेली अनबूझ रही

प्रिय-मिलन 
इक सपना है
जानता हूँ
फिर भी जगना है

7 सितम्बर 2016
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Saturday, September 3, 2016

घोषणापत्र एक weed का



(अगर आपके पास घर है, और घर के आजू-बाज़ू ज़मीन है, जहाँ आप अपना मनचाहा बाग़ लगाना चाहते हैं, तो weeds बिन बुलाए मेहमान की तरह चली आतीं हैं और आपके लिए एक चुनौती बन जाती है। weeds के लिए उपयुक्त हिंदी शब्द नहीं मिला, जिसमें वो भाव हो जो मैं यहाँ लाना चाहता हूँ।)

कहते हो जंगली मुझको 
मैं भी एक फूल हूँ
चुभता हूँ क्यूँ आँखों में?
उड़ती न धूल हूँ

तिरस्कृत कितना भी कर लो
चाहे न दो दाना-पानी
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

जल चुकी घास सारी
झड़ चुके फल-फूल सारे
मैं ही हूँ एक हठधर्मी
जिसने की रंग की बौछारें 

तुम चाहे काट डालो
या फिर जड़ से उखाड़ो
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

चढ़ता न पूजा की वेदी
गूँथता न कोई माला
सजता न गुलदस्ते में मैं
पहनती न बालों में बाला

कितना भी ठुकराया जाऊँ 
फिर भी मैं खिलता जाऊँ 
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

बू आती बग़ावत की है
लगती हिमाक़त भी है
पर तुम ध्यान से सोचो 
तो ये तर्कसंगत भी है

करता न गिला-शिकवा
करता मैं कर्म अपना
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

तुम क्यों हो लाल-पीले
क़ुदरत की लीला सारी
न होता डी-एन-ए ऐसा
न लेता ज़िम्मेदारी 

हो धरती का कोई कोना
मुझको हर जगह है होना
खिलना मेरी फ़ितरत है
खिलने की मैंने ठानी

3 सितम्बर 2016
सिएटल | 425-445-0827

Thursday, September 1, 2016

सुनसान राहों में


सुनसान राहों में 
विकसित सभ्यता बोलती है
पदचिह्न तो हैं नहीं
मार्गचिह्न बोलते हैं

इधर मुड़ो
उधर चलो
यहाँ रूको 
वहाँ देखो

सभ्यता के मायने
दायरे समझा रहे हैं
Invisible fence से हम
सहर्ष घिरे जा रहे हैं
समाजशास्त्र के पाठ
अब याद आ रहे हैं

सुनसान राहों में ...

1 सितम्बर 2016
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