Thursday, April 16, 2020
इक बात समझनी है
इक बात समझनी है
हमें जान बचानी है
ज़िन्दगी और कुछ दिन
घर में ही बीतानी है
हाथ जमकर धोना है
धोते ही जाना है
धोने का मतलब तो
साबुन भी लगाना है
कुछ पल भर धोने से
इक उम्र चुरानी है
कोरोना को जाना है
जाकर मिट जाना है
बादल है ये कुछ पल का
छा कर ढल जाना है
परछाइयाँ रह जातीं
रह जाती निशानी है
हम फूल हैं बगिया के
जो फूल महकते हैं
हम बात समझते हैं
हाँ ख़ूब समझते हैं
'गर बात है लॉकडाउन की
वो बात भी मानी है
राहुल उपाध्याय । 15 अप्रैल 2020 । सिएटल
मूल शब्द: संतोष आनन्द
मूल संगीत: लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल
शब्दों में फेर-बदल: राहुल
बाक़ी सब: उमेश
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:21 AM
आपका क्या कहना है??
सबसे पहली टिप्पणी आप दें!
Labels: corona, parodies, Santosh Anand, YouTube
Wednesday, April 15, 2020
ब्रश बदल-बदल कर ब्रश कर रहा हूँ
ब्रश बदल-बदल कर ब्रश कर रहा हूँ
नीरस-सपाट ज़िन्दगी में रंग भर रहा हूँ
नाख़ून भी तो बढ़ते नहीं
कि रोज़ काट लूँ
हमदर्द भी तो साथ नहीं
कि दर्द बाँट लूँ
ख़ुद ही कर्ता, ख़ुद ही हर्ता,
हर किरदार कर रहा हूँ
क्या करूँ, क्या ना करूँ
कुछ सूझता नहीं
समय है इतना मगर
कुछ सूझता नहीं
मीलों का है सफ़र और
ट्रैडमील पे चल रहा हूँ
सुबह हुई, शाम हुई
अब हुई रात है
व्हाट्सैप पर आपका
पल-पल का साथ है
कहना जो चाहता हूँ
कहने से डर रहा हूँ
राहुल उपाध्याय । 15 अप्रैल 2020 । सिएटल
Tuesday, April 14, 2020
सवाल यूँ आइने से न पूछा करो
सवाल यूँ आइने से न पूछा करो
बचपना न बेसबब दिखाया करो
न जाने कौन क़त्ल कर बैठे
नज़रें किसी से न मिलाया करो
मुसीबत न कहीं गले पड़ जाए
गले किसी को न लगाया करो
न जाने कौन जान ले बैठे
हाथ किसी से न मिलाया करो
न जाने कब कर जाओ कूच
पास किसी के न जाया करो
टूटते हैं सम्बन्ध तो टूट जाने दो
भावुकता में न जान जाया करो
राहुल उपाध्याय । 14 अप्रैल 2020 । सिएटल
Wednesday, April 8, 2020
कोविड और हम
आँकड़े भयावह हैं। हर तरफ़ तबाही है। पिछले 24 घण्टों में 7,326 मौत के घाट उतर गए। यानि हर 12 सेकण्ड में कहीं न कहीं कोई न कोई कोरोना बीमारी से तड़प कर गुज़र गया।
लेकिन इन में से कोई भी चेहरा हमारा जाना-पहचाना नहीं। सो हमें कुछ महसूस ही नहीं होता है। जैसे कि किसी आतंकवादी घटना में पचासों गुज़र जाए, हमें कुछ नहीं होता।
एक काल्पनिक पात्र आनन्द पर्दे पर मरता है, तो हमारी आँखें भर आती हैं।
हम कहानी पर रोते हैं। आँकड़ो पर नहीं।
यह कहानी है अमेरिका के एक बड़े शहर डिट्रोयट के बस ड्राईवर की। उसने फ़ेसबुक पर एक वीडियो डाला कि कैसे एक यात्री बहुत लापरवाही से उस पर खाँस रही थी। उसे डर था कहीं वह संक्रमित न हो जाए। और जिसका डर था वही हुआ। वह संक्रमित भी हुआ और वह अब इस दुनिया में नहीं है।
जो नहीं चेतें हैं, अब चेत जाए।
किसी अनजानी शक्ति से रक्षा की आस न रखें। आज हनुमान जयंति पर फिर वही घिसी-पिटी चौपाइयाँ दौड़ रहीं हैं। संकट हरे मिटे सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना।
जितना भी जप लो। जिसको भी जप लो। कोई रक्षा करने वाला नहीं है। मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर क्यूँ बन्द हैं? क्यूँकि जप, तप, भजन, प्रवचन से कुछ हासिल नहीं होता।
कई जगह तो अफ़वाह भी उड़ रही है कि शाकाहारी सुरक्षित हैं। जबकि इसका कोई प्रमाण नहीं है।
घर में रहें। सुरक्षित रहें। ज़रूरी काम से यदि कहीं जाए तो दूरी बनाए रखें एवं शीघ्र वापस लौट आए।
राहुल उपाध्याय । 8 अप्रैल 2020 । सिएटल
Sunday, April 5, 2020
काल का ग्रास
कभी किसी रविवार को
यदि इतवारी पहेली का हल न भेजूँ
तो समझ लेना मैं काल का ग्रास बन गया हूँ
ऐसा नहीं कि
मैंने एहतियात नहीं बरती
माँ के साथ मन्दिर गया
होली मनाई
दूध-मिश्री-सब्ज़ी लेने बाज़ार गया
नवरात्रि के लिए नारियल-फूल लाया
लहलहाते जौ बहते पानी में छोड़े
कॉस्टको से गाड़ी में तेल भरा
और कोरोना मुझे डस गया
या कि
मैंने ताली-थाली नहीं बजाई
या निर्धारित समय पर दीप नहीं जलाए
और नौ मिनट की अवधि माप न सका
मैंने डायबीटीज़ पर विजय पा ली है
रोज़ कम से कम पाँच मील चलता हूँ
सिर्फ सब्ज़ी खाता हूँ
और सूर्यास्त के बाद कुछ भी नहीं
फिर भी ऐसा नहीं कि
सारे रविवार मेरे हों
न बुद्ध के हुए, न राम के, न गाँधी के
एक दिन तो ऐसा आएगा ही
जब मैं हल नहीं भेज पाऊँगा
तब समझ लेना मैं काल का ग्रास बन गया हूँ
लेकिन मेरी आत्मा की शांति प्रार्थना मत करना
वह तो स्थितप्रज्ञ है
वह क्यूँ अशांत होने लगी
न ही झूठी प्रशंसा करना
या कोई अच्छा काम ढूँढने की कोशिश करना
जो तुम आज, अभी मेरे बारे में सोच रहे हो
वही सच है
उसे नकारना मत
मुझे वही राहुल ज़िन्दा रखना है
कोई नक़ली राहुल नहीं
मैं जैसा हूँ
मुझे वैसा ही रहने देना
उस पर फ़िल्टर नहीं लगाना
कुछ और ही नहीं बना देना
राहुल उपाध्याय । 6 अप्रैल 2020 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:56 PM
आपका क्या कहना है??
4 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
Labels: bio
Friday, April 3, 2020
मिटती है हर बीमारी
सुना है इन दिनों तुम बहुत हाथ धो रही हो
चाहे कितनी ही कोशिश कर लो
मुझसे हाथ तुम धो न सकोगी
ख़ुशबू जो मेरी रग-रग में बसी है
किसी भी साबुन से खो न सकोगी
छ: फ़ुट की दूरी रख लो सबसे
खुद को मुझसे दूर कर न सकोगी
द्वार चाहे बन्द कर लो सारे
मन से मुझे निकाल न सकोगी
तमाम सामान भले उठ जाए दुकानों से
मुझ पर जो है भरोसा वो उठ न सकेगा
ऑनलाइन डिलिवर करवा लो सब कुछ
पर मुझसा दीवाना मिल ना सकेगा
रूमाल लगाओ
नक़ाब चड़ाओ
दस्ताने पहनो
भाप लो
पर इतना ज़रूर तुम भाँप लो
कि
महामारी आज नहीं तो कल गुज़र ही जाएगी
लेकिन दास्ताँ हमारी सदियों तक गाई जाएगी
कोशिश कर के देख ले
दुनिया की दवा सारी
दिल की लगी नहीं मिटती है
मिटती है हर बीमारी
राहुल उपाध्याय । 3 अप्रैल 2020 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:46 AM
आपका क्या कहना है??
सबसे पहली टिप्पणी आप दें!
Labels: relationship, valentine
Thursday, April 2, 2020
न किया गिला
न किया गिला
न किया शिकवा कभी
सर आँखों लिया
जो भी मिला सिला कभी
हम भी तुम्हें
बाँहों में लेते
जो होता मेहरबाँ
तुझपे तेरा खुदा कभी
अब फ़ुरसत ही
फ़ुरसत है रात-दिन
कोरोना दे राहत तो
करें तस्सवुर-ए-जानाँ कभी
ये दूरी जो
आज है सुरक्षा-कवच
क्या बन जाएगी
न मिलने का बहाना कभी
बेख़ौफ़ है ज़िन्दगी
और बेख़ौफ़ ही रहेगी
डरता जो राहुल
घर छोड़ न यूँ आता कभी
राहुल उपाध्याय । 2 अप्रैल 2020 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:28 AM
आपका क्या कहना है??
सबसे पहली टिप्पणी आप दें!
Labels: relationship
Subscribe to:
Posts (Atom)
