Friday, March 28, 2008

भगवान

https://youtu.be/HfwFsLm15Tk हम सुबह शाम भगवान को सजा देते हैं न जाने किस भूल की उसे सज़ा देते हैं ईश्वर जो कि अजर अमर है उसे पत्थर में पनाह देते हैं सब अपनी मनमानी मूरत गढ़ते हैं उसने हमें बनाया हम उसे बना देते हैं फ़ुरसत नहीं हैं जिन्हे मिंटों की मन्दिरों में घंटे लगा देते हैं मना के मनगढ़ंत जनमदिन और तीज त्योहार बात बात पर हम अपना हक़ जता देते हैं

अहसास

अहसास होता है जिसका हरदम
हर वक़्त जिसका साया है
क्यू न अब तक मुझे
वो कहीं मिल पाया है

वेद, पुराण, बुद्ध और ईसा
सब ने यहीं बताया है
जिसे मैं छू पाता नहीं
उसे मैंने ही कहीं छुपाया है

न जाने किस भूल को
हम भूल बैठे हैं
हज़ारों पेगम्बरों के बाद भी
याद नहीं कुछ आया है

गोया याद नहीं है कुछ भी
पर उसकी याद ने बहुत सताया है
यही मुझे गिला है उससे
क्यू न दीवाना मुझे बनाया है

जब तक ये होश है बाकी
जब तक मेरा सरमाया है
तब तक चलेगा ये सफ़र
जीते जी कौन इसे तय कर पाया है

मिलने की अभिलाषा

देखता हूँ उसे रोज़
जाते हुए दफ़्तर
आते हुए घर

देखता हूँ उसे रोज़
लेकिन रुकता नहीं 
है कभी आँफ़िस की झंझट
तो कभी परिवार के बंधन

सोचता हूँ
एक दिन
उतरूँ अपनी गाड़ी से
चल के जाऊँ उस पगडंडी से
समेट लूँ उसकी खुशबू अपनी सांसों में
निहारूँ औंधें पड़े गगन को

लेकिन नहीं 
अभी थोड़ा और कमाना है
सुंदर सा घर बनाना है
अपनो को सताना है
गैरों को बताना है

देखता हूँ उसे रोज़
जाते हुए दफ़्तर
आते हुए घर

राहुल उपाध्याय | 28 मार्च 2008 | सिएटल

m&m

One touch and you would melt
Those were the days

You are a fountain of youth
Very colorful
Very sweet
Very bright

On the other hand
I am a diabetic
And must maintain a safe distance

What a pity
Without a warm hug
You will still be nice
But as cold as a cube of ice

Seattle,
March 28, 2008

I suck

There was a time when I could write
There was a time when I could bite

Now
My teeth are dull
My words are mellow

I suck.

Seattle,
March 28, 2008

Thursday, March 27, 2008

मोल-भाव

सौदापरस्त दुनिया में अक्सर ऐसा ही है होता
कोई बेचता है कविता तो कोई खरीदता है श्रोता

सस्ता हो सौदा या महंगा हो सौदा
सौदा किसी भी नाम से होता है सौदा

कोई झुकाता है सर तो कोई पकड़ता है पद
ताकि आज नहीं तो कल उसे मिल जाए पद

कोई खरीदता है पद तो कोई बेचता है पद
पाने के बाद फ़िर नहीं कोई छोड़ता है पद

पद वाले छोड़ देते हैं लिखना पद और छंद
नई विचारधारा के लिए पट कर देते हैं बंद
हमेशा आगे कर देते हैं अपने भाई और बंद
नगर-नगर गाते हैं कि समाज में फ़ैला है गंद

समझना हो 'गर भारत-पाकिस्तान का द्वन्द्व
बनाए आप एक संगठन और बनाए पद चंद
हिलेरी और ओबामा को भी मात दे देंगे
पद लोभी जिनके मुख कल तक रहते थे बंद



राहुल उपाध्याय | 27 मार्च 2008क्ष | सिएटल
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Glossary:
पद = 1. feet 2. title 3. stanza
द्वन्द्व = fight, due

Wednesday, March 26, 2008

Q.E.D.

चूँकि उपभोक्ता हूँ मैं
क्या इस कारण जनता हूँ मैं?
या चूँकि जनता हूँ मैं
इस कारण उपभोक्ता हूँ मैं?

हवा-पानी
पेड़-पौधें
चाँद-सितारें
ये सब आए कैसे?
और हैं किसके सहारे?
सोचने लगा
तो समझ में आया
कि सच पूछो तो
मात्र उपभोक्ता है हम
और एकमात्र जनता है वो

पूजते हैं उसे
मानते हैं उसे
बार-बार हम
पुकारते हैं उसे
सोचने लगा
तो समझ में आया
कि सच पूछो तो
एकमात्र राजा है वो
और उसकी जनता है हम

जनता है वो
जनता है हम

Q.E.D.

सिएटल,
26 मार्च 2008
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Glossary
Q.E.D. = quod erat démōnstrandum (which was to be shown or demonstrated; or in High School slang, question easily done)
उपभोक्ता = 1. consumer
जनता = 1. masses 2. to produce, to procreate