Sunday, October 17, 2021

इतवारी पहेली: 2021/10/17


इतवारी पहेली:


भक्त चाहते हैं कि घर #%# ##

पर भजनवाले भजन ## ##


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya 


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 


सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 24 अक्टूबर को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 17 अक्टूबर 2021 । शिकागो 
















Saturday, October 16, 2021

ग़ज़ब आप ढाए, ग़ज़ब आप ढाए

ग़ज़ब आप ढाए, ग़ज़ब आप ढाए

ग़ज़ब आप ढाए, ग़ज़ब आप ढाए

बहारों के सपने हमको दिखाए 

बहारों से पर्दे आपने हटाए


मैं यूँ आया-गया, जैसे हूँ आग पे

आपने वक्त दिया, वक्त को थाम के

गले हम मिले हैं, अंगारों से जल के

ग़मों के आँगन में हम मुस्कुराए 


आपने बात की, मुझे अच्छा लगा

आपने बाँह दी, मुझे क्या-क्या लगा

नहीं छूना था जो वो भी छुआ है

चाँद पे जैसे हम उतर आए


आज आई घड़ी, विदा कैसे कहूँ 

आपकी साँस से जुदा कैसे रहूँ 

बहुत बार सोचा डेरा जमा लूँ

जहाँ हैं आप वहीं नज़र हम आए


राहुल उपाध्याय । 16 अक्टूबर 2021 । दिल्ली 



Friday, October 15, 2021

उल्टा सीधा एक समान #6

उल्टा सीधा एक समान #6

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मलयालम, नवीन, नवजीवन आदि ऐसे शब्द हैं जो उल्टा सीधा एक समान हैं। बाएँ से दाएँ भी वही हैं जो दाएँ से बाएँ हैं। 


यह तो हुए शब्द। ऐसे ही शब्दों के समूह, यानी जुमले भी हो सकते हैं। जैसे कि:


नाहक है कहना। 


दिया गया शब्द आगे-पीछे-बीच में कहीं भी आ सकता है। 


आज का शब्द है:


लौकी 


राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2021 । दिल्ली 

https://mere--words.blogspot.com/2021/10/5.html?m=1





Re: उल्टा सीधा एक समान #5



शुक्र, 8 अक्तू॰ 2021 को अ 12:00 पर को Rahul Upadhyaya <kavishavi@gmail.com> ने लिखा:

उल्टा सीधा एक समान #5

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मलयालम, नवीन, नवजीवन आदि ऐसे शब्द हैं जो उल्टा सीधा एक समान हैं। बाएँ से दाएँ भी वही हैं जो दाएँ से बाएँ हैं। 


यह तो हुए शब्द। ऐसे ही शब्दों के समूह, यानी जुमले भी हो सकते हैं। जैसे कि:


नाहक है कहना। 


दिया गया शब्द आगे-पीछे-बीच में कहीं भी आ सकता है। 


आज का शब्द है:


राह


राहुल उपाध्याय । 8 अक्टूबर 2021 । आगरा 

https://mere--words.blogspot.com/2021/10/4.html?m=1




Thursday, October 14, 2021

जाने क्यूँ करती रहती है वो बातें मुझसे

जाने क्यूँ करती रहती है वो बातें मुझसे

चाक के घेर में बैठी है जो सकुचाई सी 


अब न करती है तकरार, न तकरार के मुद्दे हैं 

संजीदा इतनी कि इश्क़ पे नाज़ हो जाए

हर घड़ी ठेस लगा जो बिफर जाती थी

अब ख़ुद से ख़फ़ा, ख़ुद से मान वो जाए 


जिसे वीडियो पे घंटों तक तका करता था

आज उसे गुड मार्निंग भी नहीं कहता हूँ 

जिससे मिलने हज़ारों मील मैं चला आया

आज उसे अलविदा भी नहीं कह सकता हूँ 


कहते हैं प्यार की ताक़त जहाँ को बिसरा दे

ख़ाक को सर पे, सर को ख़ाक पे ला दे

हमने भी प्यार किया, प्यार किया, प्यार जी भर के किया

कमी हो एक तो पहरेदार से कहे बतला दे


(साहिर से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2021 । दिल्ली 



डाक और व्हाट्सेप

डाक थी सुस्त 

व्हाट्सएप है चुस्त

डाक थी महंगी

व्हाट्सएप है मुफ़्त


व्हाट्सएप का सिलसिला हुआ शुरु

डाकिये का आना जाना हो गया बंद

पड़ोसी भी भेजने लगे व्हाट्सएप

और मेल-मिलाप का हो गया अंत


डाक में कई बाधाएँ थीं

नाप तोल की सीमाएँ थीं

फिर भी साथ ले आती थी

छोटे लिफ़ाफ़ों में बहनों का गर्व

हर भैया दूज और राखी के पर्व


डाक में कई बाधाएँ थीं

नाप तोल की सीमाएँ थीं

फिर भी साथ ले आती थी

होंठों की लालीहल्दी के निशां

जो जता देते थे प्रेमकुछ लिखे बिना


डाक में कई बाधाएँ थीं

नाप तोल की सीमाएँ थीं

फिर भी साथ ले आती थी

माँ के आंसूओं से मिटते अक्षर

जो अभी तक अंकित हैं दिल के अंदर


डाक में कई बाधाएँ थीं

नाप तोल की सीमाएँ थीं

व्हाट्सएप में नहीं कोई रोक-टोक

बकबक करे या भेजे 'जोक'

पूरे करें आप अपने शौक


किस काम का ये बेलगाम विस्तार?

समाता नहीं जिसमें अपनों का प्यार

गिगाबाईट का स्टोरेज गया है भर

एक भी संदेश नहीं उसमें मगर

जो मुझको आश्वासित करे

 गुड मॉर्निंग हो सुप्रभात हो

मुझको बस सम्बोधित करे


आदमी या तो है आरामपरस्त

या फिर है कुछ इस कदर व्यस्त

कि कट-पेस्ट से चलाता काम है

ऑटो सिग्नेचर से करता प्रणाम है


सब हैं सुविधा के नशे में धुत्त

धीरे धीरे सब हो रहा है लुप्त


डाक थी सुस्त

व्हाट्सएप है चुस्त

डाक थी महंगी

व्हाट्सएप है मुफ़्त


राहुल उपाध्याय  20 जून 2017  सिएटल 

Wednesday, October 13, 2021

सर्दी की धूप

एक माँ ही थीं

जो जानती थीं

कि मेरा रात भर बड़बड़ाना 

यानी मुझे बुखार है


एक माँ ही थीं

जो जानती थीं

मेरे हर मर्ज़ का मर्ज़ 

मेरे हर दर्द का दर्द 


पहले कह देती थीं

तू यह कर ले, वह कर ले


फिर चुप रहने लगीं

जानती थीं मुझे सब पता है 

कब क्या करना है

कब क्या नहीं करना है


उनका होना, न होना

मन समझ कर भी

समझ नहीं पाता


सर्दी की धूप थीं वे


न हो तो स्वेटर तो है ही


राहुल उपाध्याय । 14 अक्टूबर 2021 । कोटा