Sunday, September 20, 2015

जीत गए तो डरना क्या

जीत गए तो डरना क्या
जब जीत गए तो डरना क्या
चुनाव जीता है कोई नौकरी नहीं ली
खट-खट के काम करना क्या

फ़र्ज़ हमारा वादे करना
जनता का काम उन्हें पूरा करना
जब जनता ही नहीं काम करेंगी
तो नेताओं को निलम्बित करना क्या

पाँच साल चलेगा हमारा शासन
पाँच साल बिछेगा हमारा आसन
उसके बाद का सोच-सोच के
मन को आशंका से भरना क्या

जब-जब मन होगा दौरा करेंगे
कभी यहाँ तो कभी वहाँ करेंगे
राजपाट में हैं सैंकड़ों सुविधा
बंगला-गाड़ी-झरना क्या

(शकील बदायूनी से क्षमायाचना सहित)

Thursday, September 3, 2015

अब कहाँ किसमे इतना सब्र है

अब कहाँ किसमे इतना सब्र है

कि दो दिन इंतज़ार करे

और गर्म राख में हाथ खराब करे

 

बस बटन दबाया

और एक ठंडा कलश हाथ आ जाता है

 

और आप अमेज़ॉन प्राईम के मेम्बर हैं 

तो फिर वो दिन दूर नहीं

जब डेश के बटन को दबाते ही

हज़ारों मील दूर पड़ा पार्थिव शरीर

मिनटों में राख हो जाएगा


न टिकट खरीदने की झंझट

न प्लेन में चढ़ने के लिए एक लम्बी उबाउ कतार

न एम्स्टर्डम के सुरक्षाकर्मी को रटे-रटाए सवालों के जवाब देना

न आधी रात घर पहुँचना

और बढ़ती गर्मी और घटते परिवार

के बीच मन ही मन यह समझ आना कि

अब तुम बड़े हो गए हो

घर आए छोटे बच्चे नहीं हो

कि मन-माफ़िक़ खाना बनेगा

पिकनिक की बातें होगी

गोलगप्पे खाए जाएगे

 

और हाँ

जल्दी ही एक ड्रोन सर्विस भी तैयार हो जाएगी

ताकि गंगा भी न जाना पड़े

स्मार्टफोन पर ही बटन दबाया

और उधर अस्थियाँ विसर्जित

 

पुनश्च:

 

जो पढ़े-लिखे लोग हैं

उन्हें पर्यावरण की बड़ी चिंता है

मुझ कम पढ़े व्यक्ति की बातों में आकर

आप उनका अनादर न करें

 

जितना भी वे कर सकते हैं

कर रहे हैं

एक लाश न जलाकर

 

वैसी ही उनपर

बी-एम-डबल्यू और मर्सीडीज़ चलाने का

बड़ा बोझ है

 

3 सितम्बर 2015

सिएटल । 425-445-0827

Wednesday, September 2, 2015

चमचों का भक्तों का, सबका कहना है


चमचों का, भक्तों का, सबका कहना है
नेक हज़ारों में मोदी अच्छा है
सॉरी, मगर, मुझे सच कहना है

ये न जाना मोदी ने मैं हूँ क्यूँ उदास
मेरी प्यासी आँखों में सुधार की है प्यास
कर ले कुछ काम ज़रा, कब तक बकना है?

सोनिया-मोदी दोनों हैं इक डाली के फूल
वो न लाई 'ब्लैक मनी', ये भी गए भूल
नीयतें हैं खोटी और किसको फँसना है?

किसी खूंखार शेर की तरह मुँह फुलाए आप
न्यू यार्क, सिडनी, टोरोंटो में गप्पें हांके आप
योगा की आड़ में कब तक ठगना है?

जबसे कुर्ते छोड़े और पहने सूट-बूट
तबसे विश्वास खोया और सपने गए टूट
पी-एम का काम क्या सजना-सँवरना है?

भारत के लोगों से यूँ डरते नहीं हैं
ऐसे बचके सच से गुज़रते नहीं हैं
कुर्सी की है चाह तो सच भी सुनना है

2 सितम्बर 2015
सिएटल । 425-445-0827
(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

Friday, August 28, 2015

निभ

पहले घड़ी और राखी में लड़ाई होती थी
क्योंकि दोनों वहाँ बंधती थी, जहाँ कलाई होती थी

अब घड़ी है फोन में
और राखी ... आती है फोन पे
जिसे दो घड़ी देखने के बाद ही
अंगूठे से सरका देते हैं हम
एक बटन दबाते ही हो जाती है अदृश्य
और कहीं स्टोरेज न भर जाए
इस डर से हो जाती है डिलिट
हाथों-हाथ 

निभ रही है राखी जैसे निभते हैं बँधन
न अक्षत, न रोली, न हल्दी, न कुंकुम
सूना है माथा, सूनी है कलाई
न उपहार है देने को, न है मुँह में मिठाई

राखी है क्या कोई बचपन का खेल?
कि बड़े हुए तो सूख गई भावनाओं की बेल?

शादी हो गई तो बस पति की चाकरी ?
और उसकी सुरक्षा हेतु करवा-चौथ?
भाई को गुड-बाई कहो, पति को गुड-बॉय?
सासू-माँ के पाँव मलो, करो मैरीड-लाईफ़ इंजॉय?

निभ रही है राखी जैसे निभते हैं बँधन

न जेवर हैं, न घेवर हैं
उखड़े-उखड़े से तेवर हैं

कल को जब होंगे बच्चे
शायद वो हो हमसे अच्छे

वरना इतिहास फिर दोहराया जाएगा
संस्कृति को हरा कर जाएगा

28 अगस्त 2015
सिएटल । 425-445-0827

Wednesday, August 26, 2015

राम भरोसे चलता भारत


आरक्षण की इन ख़बरों में 
लूटमार की इन तस्वीरों में 
खोजता हूँ मैं कौन सा ख़ून 
दौड़ रहा है इन वीरों में 

आरक्षण है या आवंटन?
क़ाबिलियत पे है लांछन

सरकारी संस्थानों का हो शोषण
क्या यही है आरक्षण?
कन्याकुमारी से कश्मीर तक
फैला हुआ है कुशासन
हर क़ौम का, हर जात का
हो रहा है रोज़ विभाजन
न रक्षा है, न सुरक्षा है
सिर्फ़ मोदीजी का भाषण है

क्षण-क्षण छन-छन छन-छन के
तज रही हैं हमें प्रतिभाएँ 
और हम है कि पूज रहे हैं
बना-बना के विशालकाय प्रतिमाएँ 
कहीं आगज़नी, कहीं लूटमार
कहीं इंक़लाब का नारा है
और 56 इंच की छाती के अलावा
और नहीं कोई सूझता हमें चारा है

राम भरोसे चलता भारत
राम-राज्य का सपना है
लोकतंत्र के युग में यारो
यह एक भयानक सपना है

जहाँ कोई लोक-लाज नहीं
कोई चुनाव प्रयास नहीं
बस एक नारी की मर्ज़ी पर
किसी एक राजकुमार को जग सह लेता है

26 अगस्त 2015
सिएटल । 425-445-0827

Thursday, August 20, 2015

सारे जहाँ से अच्छा


सारे जहाँ से अच्छा 
हिन्दोस्ताँ हमारा
कहते हैं जगसे हम ये
करते हैं ख़ुद किनारा

सत्य, इन्द्र और सुंदर
रहते हैं घर से बाहर
बाक़ी बचे यहाँ वो
तकते वहाँ के अॉफ़र
हिन्दी हैं हम 
मगर हैं ध्येय विदेश हमारा

मतलब नहीं सीखाता
आपस में प्रेम करना
हर कोई चाहे करना
उल्लू सीधा अपना
रहते हैं साथ तब तक
जब तक है काम हमारा

बढ़ता ही जाए डॉलर
बढ़ता ही जाए लालच
गिरते हुए रूपये को
थामेगा कोई क्यूँकर
बदले हैं नोट जबसे
बदला है रूख हमारा

बहू-बेटी-माँ को डर है
हर पल यहाँ समर है
जंगल सा राज हर सू
कहने को महानगर है
जीतते सदा हैं गुण्डे
कहने को जनतंत्र हमारा

20 अगस्त 2015
सिएटल | 425-445-0827



Sunday, August 16, 2015

प्लेटों में खाते हैं

प्लेटों में खाते हैं
प्लेटो पे रहते हैं
बुद्धिजीवियों की होड़ में 
प्लेटो ही पढ़ते हैं

न हम जगते हैं
न ही हम सोते हैं
किसी न किसी आग में 
झुलसे ही रहते हैं

आँखे ही हैं अपनी
ख़्वाब पराए हैं
पूरे भी हो जाए तो
अधूरे ही लगते हैं

अधरों पे मुरली हो
काँधे पे बाण हो
ऐसे अवतार कहाँ
अब अवतरते हैं

आयफ़ोन की दुनिया है
व्हाट्सैप की माया है
चुटकुलों के बीच कहाँ
रिश्ते पनपते हैं

16 अगस्त 2015
सिएटल | 425-445-0827
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प्लेटों = plates
प्लेटो = plateau; Plato 
आयफ़ोन = iPhone 
व्हाट्सैप = WhatsApp