Saturday, October 23, 2021

लिफ़ाफ़ा

एक लिफ़ाफ़ा था

जिसमें एक चिट्ठी थी

मेरे लिए


जब चाहा पढ़ लेता था

अच्छा लगता था

पढ़ता रहता था

ख़ुश होता रहता था


एक दिन

चिठ्ठी ग़ायब हो गई

लाख ढूँढा

नहीं मिली


मैंने लिफ़ाफ़ा जला दिया 


राहुल उपाध्याय । 23 अक्टूबर 2021 । सिएटल 



Friday, October 22, 2021

उल्टा सीधा एक समान #7

उल्टा सीधा एक समान #7

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मलयालम, नवीन, नवजीवन आदि ऐसे शब्द हैं जो उल्टा सीधा एक समान हैं। बाएँ से दाएँ भी वही हैं जो दाएँ से बाएँ हैं। 


यह तो हुए शब्द। ऐसे ही शब्दों के समूह, यानी जुमले भी हो सकते हैं। जैसे कि:


नाहक है कहना। 


दिया गया शब्द आगे-पीछे-बीच में कहीं भी आ सकता है। 


आज का शब्द है:


गाना 


राहुल उपाध्याय । 22 अक्टूबर 2021 । सिएटल 






Re: उल्टा सीधा एक समान #6



शुक्र, 15 अक्तू॰ 2021 को पू 2:21 पर को Rahul Upadhyaya <kavishavi@gmail.com> ने लिखा:

उल्टा सीधा एक समान #6

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मलयालम, नवीन, नवजीवन आदि ऐसे शब्द हैं जो उल्टा सीधा एक समान हैं। बाएँ से दाएँ भी वही हैं जो दाएँ से बाएँ हैं। 


यह तो हुए शब्द। ऐसे ही शब्दों के समूह, यानी जुमले भी हो सकते हैं। जैसे कि:


नाहक है कहना। 


दिया गया शब्द आगे-पीछे-बीच में कहीं भी आ सकता है। 


आज का शब्द है:


लौकी 


राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2021 । दिल्ली 

https://mere--words.blogspot.com/2021/10/5.html?m=1





Wednesday, October 20, 2021

कविता मोहब्बत है

कविता मोहब्बत है

मोहब्बत कविता 

यह मैं तबसे जानता हूँ 

जबसे मैंने पहला गीत सुना था

शिमला में झूमा था

दार्जिलिंग में घूमा था

बस की सीट पर

ट्रेन की बर्थ पर

घर की छत पर

कई हमराही मिले

मिलते रहें 

सबमें कविता थी

सब कवितामय थीं 


आज

कविता बंदी है

क़ैद में है

फड़फड़ा रही है 

छटपटा रही है


जितनी कशिश उसकी मुस्कान में थी

खिलखिलाती हँसी में थी

उससे कई ज़्यादा उसके रूदन में है


जो एक दिन में चालीस फ़ोन करती थी

पिछले तेरह दिनों में उसका एक भी फ़ोन नहीं 

जितनी इतिहास भरी उसकी बातें थी

उससे कई ज़्यादा सम्भावना भरी उसकी ये चुप्पी है


इससे ज़्यादा 

इससे पवित्र 

इससे गहरा

इससे ऊँचा 

इससे मज़बूत 

इससे पुख़्ता 

प्यार 

कोई हो सकता है?


कविता मोहब्बत है

मोहब्बत कविता 


राहुल उपाध्याय । 20 अक्टूबर 2021 । सिएटल 


Tuesday, October 19, 2021

हर तरफ़ बेशुमार आदमी आदमी

हर तरफ़ बेशुमार आदमी आदमी 

कर रहा है बीमार आदमी आदमी 


है कहाँ, अब यहाँ, हो जो कोई चारागर 

रोगियों की क़तार आदमी आदमी 

(चारागर = इलाज करने वाला)


कोई दामन गहूँ तो मैं शायद बचूँ 

कर रहा है विचार आदमी आदमी 

(गहना = कोई वस्तु इस प्रकार हाथ में लेना कि वह छूट न सके)


मास्क ठहरता नहीं, नक़ाब उतरता नहीं 

कर रहा है श्रृंगार आदमी आदमी 


ना है प्यार, ना है प्रेम, किसी से आपको 

बन रहा होशियार आदमी आदमी 


राहुल उपाध्याय । 19 अक्टूबर 2021 । सिएटल 


Monday, October 18, 2021

रावण न हो तो दिक़्क़त है

रावण न हो तो दिक़्क़त है


हमें सुख मिलता है

रावण बनाने में 

बना के उसे जलाने में


हम नहीं चाहते कि

रावण सदा-सदा के लिए मर जाए


हम नहीं चाहते कि

हम उसे भूल जाए


हम चाहते हैं कि

यह तमाशा हर साल हो

जो नहीं जानते हैं 

वे भी जानें 

कि

देखो

हम कितने ताक़तवर हैं

किसी को बनाना 

और बना के जलाना

कितना सुखदायक है


कला भी जागृत होती है 

कविताएँ फूटती हैं

बच्चे पुतले बनाना सीख जाते हैं 

लाल-पीली आँखें 

काली-काली मूँछें 

बनाना-लगाना

कितना आनन्ददायक है

तीर-कमान भी बन जाते हैं 

अट्टहास का भी अभ्यास हो जाता है

अभिनय का भी अवसर मिल जाता है 


रावण न हो तो दिक़्क़त है …


राहुल उपाध्याय । 18 अक्टूबर 2021 । सिएटल 




Sunday, October 17, 2021

तू नदिया की धारा

तू नदिया की धारा

मैं बादल एक आवारा

तू मुझको क्यूँ चाहे

मैं तुझको क्यूँ चाहूँ 


तेरा चुम्बन धूप ले प्यारा

तुझे बाँहों में कसे किनारा

मैं तुझको क्यूँ चाहूँ 

तू मुझको क्यूँ चाहे


तेरा पिया है सागर खारा

तुझे देना उसे है सारा

तू मुझको क्यूँ चाहे

मैं तुझको क्यूँ चाहूँ 


मैं हवा के तन से लिपटूँ 

हर घड़ी मैं रूख बदल लूँ 

तू मुझको क्यूँ चाहे

मैं तुझको क्यूँ चाहूँ 


सागर तड़पे मैं निकलूँ 

मैं तड़पूँ तुझे वो निगले

ये जनम-जनम के हैं फेरे

जैसे साँझ और सवेरे

हर रोज़ आ के जग में

मिल के भी नहीं हैं मिलते


ये सदियों से होता आया

दिल चैन से कहाँ रह पाया

जीवन जोत यूँ पनपे

पनपे जग जीवन सारा


तू नदिया की धारा

मैं बादल एक आवारा …


राहुल उपाध्याय । 17 अक्टूबर 2021 । सिएटल