एक लिफ़ाफ़ा था
जिसमें एक चिट्ठी थी
मेरे लिए
जब चाहा पढ़ लेता था
अच्छा लगता था
पढ़ता रहता था
ख़ुश होता रहता था
एक दिन
चिठ्ठी ग़ायब हो गई
लाख ढूँढा
नहीं मिली
मैंने लिफ़ाफ़ा जला दिया
राहुल उपाध्याय । 23 अक्टूबर 2021 । सिएटल
एक लिफ़ाफ़ा था
जिसमें एक चिट्ठी थी
मेरे लिए
जब चाहा पढ़ लेता था
अच्छा लगता था
पढ़ता रहता था
ख़ुश होता रहता था
एक दिन
चिठ्ठी ग़ायब हो गई
लाख ढूँढा
नहीं मिली
मैंने लिफ़ाफ़ा जला दिया
राहुल उपाध्याय । 23 अक्टूबर 2021 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:27 AM
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उल्टा सीधा एक समान #7
—————————
मलयालम, नवीन, नवजीवन आदि ऐसे शब्द हैं जो उल्टा सीधा एक समान हैं। बाएँ से दाएँ भी वही हैं जो दाएँ से बाएँ हैं।
यह तो हुए शब्द। ऐसे ही शब्दों के समूह, यानी जुमले भी हो सकते हैं। जैसे कि:
नाहक है कहना।
दिया गया शब्द आगे-पीछे-बीच में कहीं भी आ सकता है।
आज का शब्द है:
गाना
राहुल उपाध्याय । 22 अक्टूबर 2021 । सिएटल
उल्टा सीधा एक समान #6
—————————
मलयालम, नवीन, नवजीवन आदि ऐसे शब्द हैं जो उल्टा सीधा एक समान हैं। बाएँ से दाएँ भी वही हैं जो दाएँ से बाएँ हैं।
यह तो हुए शब्द। ऐसे ही शब्दों के समूह, यानी जुमले भी हो सकते हैं। जैसे कि:
नाहक है कहना।
दिया गया शब्द आगे-पीछे-बीच में कहीं भी आ सकता है।
आज का शब्द है:
लौकी
राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2021 । दिल्ली
https://mere--words.blogspot.com/2021/10/5.html?m=1
Posted by Rahul Upadhyaya at 7:44 AM
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Labels: ulta, उल्टा सीधा एक समान
कविता मोहब्बत है
मोहब्बत कविता
यह मैं तबसे जानता हूँ
जबसे मैंने पहला गीत सुना था
शिमला में झूमा था
दार्जिलिंग में घूमा था
बस की सीट पर
ट्रेन की बर्थ पर
घर की छत पर
कई हमराही मिले
मिलते रहें
सबमें कविता थी
सब कवितामय थीं
आज
कविता बंदी है
क़ैद में है
फड़फड़ा रही है
छटपटा रही है
जितनी कशिश उसकी मुस्कान में थी
खिलखिलाती हँसी में थी
उससे कई ज़्यादा उसके रूदन में है
जो एक दिन में चालीस फ़ोन करती थी
पिछले तेरह दिनों में उसका एक भी फ़ोन नहीं
जितनी इतिहास भरी उसकी बातें थी
उससे कई ज़्यादा सम्भावना भरी उसकी ये चुप्पी है
इससे ज़्यादा
इससे पवित्र
इससे गहरा
इससे ऊँचा
इससे मज़बूत
इससे पुख़्ता
प्यार
कोई हो सकता है?
कविता मोहब्बत है
मोहब्बत कविता
राहुल उपाध्याय । 20 अक्टूबर 2021 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:19 AM
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हर तरफ़ बेशुमार आदमी आदमी
कर रहा है बीमार आदमी आदमी
है कहाँ, अब यहाँ, हो जो कोई चारागर
रोगियों की क़तार आदमी आदमी
(चारागर = इलाज करने वाला)
कोई दामन गहूँ तो मैं शायद बचूँ
कर रहा है विचार आदमी आदमी
(गहना = कोई वस्तु इस प्रकार हाथ में लेना कि वह छूट न सके)
मास्क ठहरता नहीं, नक़ाब उतरता नहीं
कर रहा है श्रृंगार आदमी आदमी
ना है प्यार, ना है प्रेम, किसी से आपको
बन रहा होशियार आदमी आदमी
राहुल उपाध्याय । 19 अक्टूबर 2021 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 7:49 AM
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रावण न हो तो दिक़्क़त है
हमें सुख मिलता है
रावण बनाने में
बना के उसे जलाने में
हम नहीं चाहते कि
रावण सदा-सदा के लिए मर जाए
हम नहीं चाहते कि
हम उसे भूल जाए
हम चाहते हैं कि
यह तमाशा हर साल हो
जो नहीं जानते हैं
वे भी जानें
कि
देखो
हम कितने ताक़तवर हैं
किसी को बनाना
और बना के जलाना
कितना सुखदायक है
कला भी जागृत होती है
कविताएँ फूटती हैं
बच्चे पुतले बनाना सीख जाते हैं
लाल-पीली आँखें
काली-काली मूँछें
बनाना-लगाना
कितना आनन्ददायक है
तीर-कमान भी बन जाते हैं
अट्टहास का भी अभ्यास हो जाता है
अभिनय का भी अवसर मिल जाता है
रावण न हो तो दिक़्क़त है …
राहुल उपाध्याय । 18 अक्टूबर 2021 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:33 PM
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तू नदिया की धारा
मैं बादल एक आवारा
तू मुझको क्यूँ चाहे
मैं तुझको क्यूँ चाहूँ
तेरा चुम्बन धूप ले प्यारा
तुझे बाँहों में कसे किनारा
मैं तुझको क्यूँ चाहूँ
तू मुझको क्यूँ चाहे
तेरा पिया है सागर खारा
तुझे देना उसे है सारा
तू मुझको क्यूँ चाहे
मैं तुझको क्यूँ चाहूँ
मैं हवा के तन से लिपटूँ
हर घड़ी मैं रूख बदल लूँ
तू मुझको क्यूँ चाहे
मैं तुझको क्यूँ चाहूँ
सागर तड़पे मैं निकलूँ
मैं तड़पूँ तुझे वो निगले
ये जनम-जनम के हैं फेरे
जैसे साँझ और सवेरे
हर रोज़ आ के जग में
मिल के भी नहीं हैं मिलते
ये सदियों से होता आया
दिल चैन से कहाँ रह पाया
जीवन जोत यूँ पनपे
पनपे जग जीवन सारा
तू नदिया की धारा
मैं बादल एक आवारा …
राहुल उपाध्याय । 17 अक्टूबर 2021 । सिएटल
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:18 PM
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