Thursday, October 13, 2022

क्वाँरी है करवा चौथ करती मगर

क्वाँरी है करवा चौथ करती मगर

मेरी है, मेरी है नहीं कहती मगर


वो साँसों से बढ़ के है चाहती मुझे 

मरती है मुझपे नहीं कहती मगर 


है पास नहीं और रहती दूर भी नहीं 

मैं आऊँगी मिलने नहीं कहती मगर


आज़ाद है, आज़ाद ही है रहना उसे

छोड़ दूँगी तुम्हें नहीं कहती मगर


उससे भला दुनिया में कौन और भला

है प्यार मुझसे नहीं कहती मगर 


राहुल उपाध्याय । 13 अक्टूबर 2022 । सिएटल 





Tuesday, October 11, 2022

जंजाल है ये दुनिया

जंजाल है ये दुनिया 

सुख-दुख न बराबर हैं

कहने को जीवन है

पर मरते यहाँ पर हैं


मिलता न कोई हमदम

सुनसान नज़ारे हैं

पनघट न बचा कोई 

मरघट ही हमारे हैं

हर साँस उम्मीदों के

बस मिटते आखर हैं


दो दिन की दुनिया में

संताप हज़ारों हैं

आगे न कोई पीछे 

पर पाप हज़ारों हैं 

करना भी जो कुछ चाहूँ 

डर रहते सदा सर हैं 


राहुल उपाध्याय । 11 अक्टूबर 2022 । सिएटल 




Monday, October 10, 2022

जब भी जमाता हूँ दही

जब भी जमाता हूँ दही

रात को

मम्मी याद आती हैं


जब भी निकालता हूँ दाने 

अनार से

सास याद आती हैं


जब भी पकाता हूँ बैंगन 

रसीले

मामीसाब याद आते हैं 


जब भी सुनाता हूँ वाक़ये 

मज़ाक़िये

मामासाब याद आते हैं 


दिन भर यादों का ताँता लगा रहता है 


क्या अगली पीढ़ी को

यूट्यूब 

और सिर्फ़ यूट्यूब ही याद आएगा 


शायद नहीं 


अभी भी कुछ चीज़ें हैं

जिन्हें सिर्फ़ इंसान से ही इंसान

सीखता है 

सीख सकता है 

और सीख रहा है 


लेकिन 

न वो माँ होगी, न सास 

न मामासाब होंगे, न मामीसाब 


होंगे

तो पड़ोसी 

या कोई आया

तो कोई बॉस

तो कोई सहकर्मी 


रिश्ते होंगे 

नाम के

पर किसी काम के नहीं 


राहुल उपाध्याय । 10 अक्टूबर 2020 । सिएटल 





Saturday, October 8, 2022

इतवारी पहेली: 2022/10/09


इतवारी पहेली:


ना पवन का, ना चमन का, दोष है ###?

आदम और हव्वा का बाग में ## #


(दो अक्षर का शब्द अंग्रेज़ी का है पर प्रचलित है)


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya



आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 


सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 16 अक्टूबर 2022 को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 9 अक्टूबर 2022 । सिएटल 















Thursday, October 6, 2022

स्विच ऑफ़

जब भी 

गली के उस मोड़ से

गुज़रता हूँ 

तुम्हारा आलिंगन 

तुम्हारी ज़ुल्फ़ें 

तुम्हारी आँखें 

अधखुले होंठ

गुदाज़ बदन 

नशीली ख़ुशबू 

सब याद आ जाते हैं 


कितने क़रीब थे हम

और अचानक 

न जाने कैसे

सब कुछ 

एक पल में ख़त्म हो गया 

जैसे कोई स्विच ऑफ़ हो गया


जैसे 

ज़िन्दगी 

स्विच ऑफ़ हो जाए

बिना किसी अग्रिम सूचना के


शायद शुरूआत भी ऐसे ही अचानक हुई थी

जिसकी हमें ख़बर ही न लगी

जैसे कि मेरा कभी जन्म हुआ था

यह मुझे बहुत बाद में पता चला

शायद चौदह वर्ष की उम्र में 

वह भी जब माँ ने बताया तब

कि एकादशी की रात थी

भयंकर पीड़ा थी

नाईन को लेने काका गए थे

और रात के एक बजे मैं आया था 


जन्म का तो कोई चश्मदीद गवाह था

प्यार का तो कोई नहीं 

पता ही न चला कब हो गया


क्या उस दिन

जब तुम बात-बेबात ख़ूब रोई थी

और मैं तुम्हें चुप कराता रहा


या उस दिन 

जब मैं अपने पिता के आपरेशन से परेशान था

और तुम मेरे साथ बनी रही


या उस दिन 

जब मैंने तुम्हें तुम्हारे पसंदीदा गीत सुनाए थे


या उस दिन 

जब तुमने ज़िद कर ली थी कि तुम फ़ोन नहीं रखोगी 


या उस दिन

जब मैंने तुम्हें कंगन पहनाए थे


या उस दिन

जब मैंने तुम्हें फूल दिए थे


या उस दिन

जब मैंने तुम्हें वादी की खुली हवा में सैर कराई थी 


(अब सोचता हूँ तो लगता है कि

गवाह थे

गवाह क्या दुश्मन थे

इसीलिए तो हम दोनों आज साथ नहीं)


राहुल उपाध्याय । 6 अक्टूबर 2022 । सिएटल 








Sunday, October 2, 2022

न जाने कब

न जाने कब

वो दिन आएगा

जब कवि को

पिता के हाथ की

रोटी याद आएगी 


राहुल उपाध्याय । 2 अक्टूबर 2022 । सिएटल 




Saturday, October 1, 2022

वो ही जोक भेजता है

वो ही जोक भेजता है 

वो ही शोक व्यक्त करता है 

वो ही डायबिटीज़ उखाड़ फेंकता है

वो ही ज्ञान बांटता है 

वो ही है जो दुनिया की तमाम ख़बरों पे अपनी नब्ज़ रखता है 


कैसे कोई इतना 

भंडार सम्हाल लेता है 

एक अंगूठे के बल पे 

दुर्गा के हज़ार हाथों से 

ज़्यादा हमें दान देता है 


वो ही एक कर्मयोगी है

जो मौत और जश्न को

एक ही आँख से देखता है 

एक ही साँस में 

दोनों पे टिप्पणी करता है 

एक में ओम शांति 

तो दूजे में लख बधाईयाँ कहता है 


प्रभात भी सुप्रभात 

उसके बिना न होती है 

रात्रि भी शुभरात्रि

उसके कहे बिना न होती है 


कब कौन सा त्योहार है

उसके कहने ही से आता है 

वह जो कह दे तो हमें

अपनी संस्कृति पे गर्व होता है 

वह जो कह दे तो 

शर्म से डूब के मरना होता है 


ऐसे कर्मवीर का

झूठ भी हमें सच लगता है 

ये ही तो है जिससे 

दुनिया जहान का पता चलता है 


ये न हो तो

कितने दिग्गज 

बिना हमारे आँसू 

बहाए निकल जाते 

वो कितना किसके लिए

छोड़ गए यह भी न जान पाते 


राहुल उपाध्याय । 30 सितम्बर 2022 । सिएटल