Monday, August 11, 2008

हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

हज़ार आय-एम हमने भेजे
कहीं से कोई पिंग ना आई
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

जहाँ से तुम बाय कर गये थे
वो विंडो अब भी खुली पड़ी है
हम अपने कम्प्यूटर में जाने कितने
और विंडो खोले हुए हैं
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई ...

कहीं किसी रोज़ यूं भी होता
हमारी ई-मेल तुम भी पढ़ती
जो बातें हमने कही न तुमसे
वो बातें तुमने भी सोची होती
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

तुम्हें है दु:ख कि हम क्यों आए
हमें है फ़क्र कि तुम हमारे 
फोन हाथों में अब भी लेकिन
रिंग रिंग बस वो पुकारे
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

सिएटल,
11 अगस्त 2008
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)
=========================

आय-एम = IM, instant messenger
पिंग = ping
बाय = bye
विंडो = window
कम्प्यूटर = computer
ई-मेल = email
फ़ख़्र = pride
रिंग = ring

Saturday, August 9, 2008

कभी जलती थी शमा रोशनी के लिए

कभी जलती थी शमा रोशनी के लिए
आज जलती है फ़क़त ख़ुशबू के लिए
कभी मिलते थे दोस्त दोस्ती के लिए
आज मिलते हैं फ़क़त गुफ़्तगू के लिए

डिग्री हो
सुशील हो
और धन भी कमाए
वही बस आज एक आदर्श पत्नी कहलाए
चाहे रात भर छटपटाती रहे एक मजनू के लिए

किस्से कहानी कुछ
यूँ शुरू होते हैं
कि हर सिक्के के दो
पहलू होते हैं
जीते हैं हम जो मिल न सके उस पहलू के लिए

ये तेरा
ये मेरा
यही रोना है
टुकड़ों में
बंट गया
घर का कोना कोना है
कोई एक जगह न बची सुकूँ से रू-ब-रु के लिए

न शादी है पक्की
न देश से है भक्ति
दे देते हैं तलाक़
चाहे देश हो या व्यक्ति
नहीं खपता है कोई आज इज़्ज़त आबरू के लिए

सिएटल,
9 अगस्त 2008
================
शमा = मोमबत्ती
फ़क़त = सिर्फ़
गुफ़्तगू = बातचीत
सिक्के के दो पहलू = two sides of a coin
रू-ब-रू = आमने-सामने बैठ कर बात करना

दोहरी ज़िंदगी

इस कड़वे संसार में
हम पवित्र प्रेम रस पी रहे हैं
तिस पर इलज़ाम ये कि
हम दोहरी ज़िंदगी जी रहे हैं

कहाँ तो लोग
ठीक से एक ज़िंदगी
नहीं जी पाते हैं
एक दूसरे के साथ
शांति से चाय तक
नहीं पी पाते हैं

क्या हर्ज़ है
जो हम
एक नहीं
दो दो ज़िंदगी
बखूबी जी रहे हैं

हम घंटो-घंटो
एक दूसरे की
बातें सुनते हैं
एक दूसरे का
दु:ख-दर्द समझते हैं
हँसते हैं
हँसाते हैं
एक दूसरे का
मान रखते हैं
एक दूसरे का
मन रखते हैं

फिर भी दुनिया वाले
इसे गलत कहते हैं
आखिर ऐसा भी क्या
गुनाह करते हैं?

बस ईश्वर की भेंट को
सहर्ष स्वीकार करते हैं
एक दूसरे से
बहुत बहुत प्यार करते हैं

कहने वाले
कहते रहे हैं
करने वाले
करते रहे हैं

एक लाल
एक पीली
या
दोहरी
जैसी भी है ये ज़िंदगी
इसे जीने का हक़
सिर्फ़
हमें हैं
हमें हैं

सिर्फ़ हमें!

सिएटल,
9 अगस्त 2008

Friday, August 8, 2008

आठ-आठ-आठ

यहाँ-वहाँ और देश-विदेश
आज का दिन है बड़ा विशेष

ख़ास दिन पर होती है ख़ास चाह
हज़ारों ने किए आज शुभ विवाह

न जाने इस में कौन सी है ऐसी ख़ास बात
क्या आज दिन न ढलेगा, न होगी रात?
क्या आज लोग न लड़ेंगे, न होगा प्यार?
क्या आज कोई न जन्मेगा, न होगा पार?

वही बाग़ हैं, वही बगीचे
वही घर हैं, वही दरीचे
कल, आज और कल में कोई फ़र्क नहीं है
जो अलग साबित कर दे ऐसा तर्क नहीं है

हर कैलेंडर की अपनी तिथि है
दिन गिनने की अलग विधि है
इस कैलेंडर में निकला कुछ आज ख़ास
तो उस कैलेंडर में निकलेगा कुछ कल ख़ास

कोई हिंदू कैलेंडर है
कोई मुस्लिम कैलेंडर है
तरह तरह के
यहाँ कैलेंडर हैं

दिन अलग हैं
साल अलग हैं
हर महीने के
नाम अलग है

हज़ार झगड़े होते हैं
जात-पात के
हज़ार लफ़ड़े होते हैं
बोल-चाल के
हज़ार पचड़े होते हैं
धर्म-समाज के
हज़ार रगड़े होते हैं
देश-प्रांत के

लेकिन ये देख कर
होता विस्मय है
कि मानता हर कोई
एक समय है

हिंदू, मुस्लिम या
कोई धर्म हो
हिंदी, अंग्रेज़ी या
कोई ज़ुबाँ हो
पूरब, पश्चिम या
कोई दिशा हो
छोटा, बड़ा या
कोई यहाँ हो

हर घड़ी में
एक समय है

सिएटल,
8 अगस्त 2008
===============
दरीचे = खिड़कियाँ
ज़ुबाँ = भाषा

Thursday, August 7, 2008

जितने भी सगे थे सब के सब सगाँ निकले

जितने भी सगे थे सब के सब सगाँ निकले
परायों के आगोश में दिल के अरमाँ निकले

अंधे थे हम और अंधी थी चाहत हमारी
तिस पर तुर्रा ये कि हम बेज़ुबाँ निकले

दूर से देते रहे उम्र भर का वादा मुझे
पास आए तो दो दिन के मेहमाँ निकले

कुछ यूँ खेली आँख-मिचौली ज़िंदगी ने मुझसे
कि जिनके पीछे मैं आया यहाँ वो वहाँ निकले

काटने को तो काट सकता है 'राहुल' अकेला इसे
बशर्ते सफ़र के अंत में चार शख़्स मेहरबाँ निकले

सिएटल,
7 अगस्त 2008
=============
सगे = blood relatives
सगाँ = कुत्तें, dogs
तिस पर तुर्रा = and on top of that

और यहीं कहीं रब देखा

पंडित को करता जप देखा
साधु को करता तप देखा
गिरजा दरगाह सब देखा
हर तरह का मजहब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

आग उगलता पर्वत देखा
सागर पलटता करवट देखा
ज़मीं पे झुकता नभ देखा
कुदरत का हर करतब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

उमड़ता घुमड़ता सावन देखा
हरा भरा सा वन देखा
इधर-उधर जब देखा
सौन्दर्य लबालब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

किसी को मन-मरजी करते देखा
किसी को जीते जी मरते देखा
सुख और दु:ख सब देखा
हर तरह का मतलब देखा
पर कभी नहीं रब देखा

तुम्हें अपना बनते देखा
सांसों में तुम्हें घुलते देखा
तुम्हें प्रफ़ुल्लित जब देखा
जीवन होता सुलभ देखा
और यहीं कहीं रब देखा

सिएटल,
7 अगस्त 2008

Wednesday, August 6, 2008

मिलन

मैं छुपता रहा
तुम खिलती रही
ये कैसा खेल?

हाथों में मेरे
तुम समाती रही
ये कैसा जादू?

हुआ कि नहीं?
सच था कि सपना?
ये कैसे प्रश्न?

एक नज़र
वो आईना तो देखो
ये कैसा चिन्ह?

सिएटल,
6 अगस्त 2008