पानी देते वक़्त सोचता हूँ
माँ ने इतने पौधे क्यूँ लगाए?
फूल निहारते वक़्त सोचता हूँ
माँ ने इतने ही पौधे क्यूँ लगाए?
रोटी, कपड़ा और मकान
तीन का ही तो हुआ था फ़रमान
फिर पौधों ने कहाँ से पा लिया स्थान?
8 अप्रैल 2017
दिल्ली
पानी देते वक़्त सोचता हूँ
माँ ने इतने पौधे क्यूँ लगाए?
फूल निहारते वक़्त सोचता हूँ
माँ ने इतने ही पौधे क्यूँ लगाए?
रोटी, कपड़ा और मकान
तीन का ही तो हुआ था फ़रमान
फिर पौधों ने कहाँ से पा लिया स्थान?
8 अप्रैल 2017
दिल्ली
जब तक हूँ
तब तक हूँ
इसके बाद
नभ तक हूँ
सम्बन्धों की सीमाएँ हैं
अनुबंधों की रेखाएँ हैं
इसके बाद
सब तक हूँ
टुकड़ों-टुकड़ों बँटता हूँ
कभी यहाँ, कभी वहाँ रहता हूँ
इसके बाद
पग-पग हूँ
नहीं हूँ तो सचमुच हूँ
हूँ तो झूठमुठ हूँ
समय से परे
पल-पल हूँ
फ़रीदाबाद और दिल्ली के बीच
7 अप्रैल 2017
ट्रम्प भी
कैसी है पहेली, हाए
कभी तो हँसाए
कभी ये रुलाए
कभी देखो ट्रम्प नहीं माने
पीछे पीछे सपनों के भागे
एक के बाद एक एक्ज़ीक्यूटिव अॉर्डर
साईन करता चला जाए यहाँ
जिन्होंने उगाए यहाँ संतरे
उनसे कहे जाओ अपने घर रे
वही चुनकर ख़ामोशी
यूँ चले जाए अकेले कहाँ
(योगेश से क्षमायाचना सहित)
24 मार्च 2017
सिएटल | 425-445-0827
tinyurl.com/rahulpoems
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:08 PM
आपका क्या कहना है??
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Labels: parodies
पटरियाँ अगर मिल जाएँ तो दुर्घटना तय है
रंग भी अगर मिल जाएँ तो बेरंग हो जाते हैं
सुर भी अगर अपनी पहचान खो दें
तो कोलाहल मच जाता है
पृथक-पृथक ही सृष्टि पनपे
पृथक-पृथक इसका रूप मनोहर
कोई फूल बने, कोई पत्ती बने
कोई गुलमोहर, कोई अमलतास बने
पृथकता ही से पीरियाडिक टेबल
पृथक-पृथक खिले फल-फूल यहाँ
घुल-मिल के ही रह जाते तो
ख़ाक को तकती ख़ाक यहाँ
यूँ मिल जाने की, मिट जाने की
चाह है उलटी धार सखा
अब निकल पड़े हो, तो निकल पड़ो
मुड़-मुड़ के न देखो कि वो तार कहाँ
https://youtu.be/Md0L3q4wdq4
जो है नहीं
उसी से कहता हूँ
तू अपना पता दे
तू है कि नहीं
इतना बता दे
जब दो ही नहीं हैं
तो ये सम्वाद कैसा?
जब एक ही है
तो ये विवाद कैसा?
अपनी ही धारणाओं की
शक्ल की पूजा
जैसे अपना हो बच्चा
पर है तो दूजा
दीपक जलेगा
तो ज्योति रहेगी
पूजा होगी
तो ख्याति रहेगी
यदि दीपक जलें
तो मिट्टी के ही जलें
यह आवश्यक नहीं
यह आग है व्यापक
इसका मापक नहीं
राहुल उपाध्याय | 20 मार्च 2017 | सिएटल
Madness is celebrated
March is spent glued to the chair
And then we complain
Leadership is not fair
Life goes on
As it did last year
We go to work, school, earn, learn, spend
With abundance and no fear
Every generation
(no matter what the circumstances)
Has learnt
Three Rs
And whatever is current
So, count your blessings
Do your part
Hope for the best
And lead with heart.
March 19, 2017
Seattle | 425-445-0827
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:42 PM
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