Saturday, October 22, 2022

राजा और प्रजा

राजा और प्रजा में क्या अंतर है 

आज फिर उन्होंने दिखा दिया


जहाँ हमें दो सेकण्ड नहीं ठहरने दिया जाता है 

वहाँ ये घंटों गुज़ार देते हैं 

और तो और

दूर-दूर तक हम फटक नहीं पाते हैं 

इनका ही एकछत्र राज रहता है 


हाँ 

वीडियो ज़रूर भेज देते हैं 

जिसमें विग्रह नहीं दिखते 

बस ये ही फ़ुटेज खाते दिखते हैं 


न जाने क्या सुख मिलता है इन्हें 

भक्तों का सुख छीनने में 


राहुल उपाध्याय । 21 अक्टूबर 2022 । सिएटल 



Friday, October 21, 2022

दहलीज़ों पर हम दीप रखें

दहलीज़ों पर हम दीप रखें 

अंगना चमके दुख दूर हटे 

आँसू न हमारे आज बहें 

अंगना चमके दुख दूर हटे 


माना कि जहां में ग़म भी हैं

सुख और सहारे कम भी हैं

इक दीपक आस का आज जले

अंगना चमके दुख दूर हटे


होंठों पे तराने ले आएँ

उन्माद जीवन का घर लाएँ

नख से शिखा तक आज सजें

अंगना चमके दुख दूर हटे


राहुल उपाध्याय । 20 अक्टूबर 2022 । सिएटल 

http://mere--words.blogspot.com/2022/10/blog-post_21.html?m=1



दहलीज़ों पर हम दीप रखें

दहलीज़ों पर हम दीप रखें 

अंगना चमके दुख दूर हटे 

आँसू न हमारे आज बहें 

अंगना चमके दुख दूर हटे 


माना कि जहां में ग़म भी हैं

सुख और सहारे कम भी हैं

इक दीपक आस का आज जले

अंगना चमके दुख दूर हटे


होंठों पे तराने ले आएँ

उन्माद जीवन का घर लाएँ

नख से शिखा तक आज सजें

अंगना चमके दुख दूर हटे


राहुल उपाध्याय । 20 नवम्बर 2022 । सिएटल 


Wednesday, October 19, 2022

समाचार

इतिहास ही नहीं 

समाचार भी

देश, काल, परिस्थिति के हिसाब से

एक ही समय में कई रूप ले लेते हैं


इस चैनल पर कुछ 

उस चैनल पर कुछ 

और उस चैनल पर और कुछ 


इस अख़बार में कुछ 

उस अख़बार में कुछ 

और उस अख़बार में और कुछ 


इस देश में कुछ 

उस देश में कुछ 

और उस देश में और कुछ


यदि सच जानना है तो

विशेषण न पढ़ कर

सिर्फ़ संज्ञा-सर्वनाम-क्रिया ही पढ़ें 

और भविष्यगामी खबरें तो देखें ही न


ये अख़बार हैं

इनके पास कोई यंत्र नहीं 

जो कल की बात आज बता दें 

2024 का तो क-ख-ग भी नहीं पता


राहुल उपाध्याय । 20 अक्टूबर 2022 । सिएटल 

(मल्लिकार्जुन के निर्वाचन पर)




मिला थी जब तुम कल रात तो

मिली थी जब तुम कल रात तो

क्या आई थी याद उन रातों की?

जब तारों के नीचे हम साथ थे

झंझावात से नहीं जज़्बात थे

सहज, सरल, करते बात थे

न इधर का डर था

न उधर का भय

मिलने को रहते बेताब थे

ग़लत-शलत वो जो भी था

लगता नहीं हमें ग़लत वो था


कल तुम तप रही थी इतनी ज़ोर से

कि मैं भाँप रहा था इस छोर से

पास नहीं तुम आ रही थी 

दूर से ही तुम जा रही थी

सबको किया तो मुझे भी किया 

मेरे लिए कोई दुआ-सलाम न था

डम्ब शरेड में भी तुमने भाग लिया

मेरा क्लू न कोई सॉल्व किया 


इतना तो है कि तुम मुझे भूली नहीं 

भूल सकी नहीं कि भुलाना चाहा नहीं 

मालूम पड़े तो कुछ चैन पड़े


मिली थी जब तुम कल रात तो …


राहुल उपाध्याय । 19 अक्टूबर 2022 । सिएटल 







Monday, October 17, 2022

शर्ट

एक साल पहले

जो तुमने शर्ट प्रेस की थी

वो मैंने आज पहनी


इतने दिनों से 

मैं बस उसे देखता था

देखता था कि तुम उसे कैसे 

देख रही थी

पानी के छींटे मारकर 

उसकी सिलवटें मिटा रही थी

तुमने कभी शर्ट पर प्रेस नहीं की थी

मैंने ही तुम्हें गुर सिखाए थे

पहले कॉलर

फिर कंधे

फिर बाँहें 

फिर पीठ

बाद में जो बच गया वो सब कुछ 

तुम बहुत लालायित थी मेरे सारे काम करने को

मैं तो स्वावलंबी हूँ 

सारे काम अपने आप करना अच्छा लगता है 

और तुम हठ करती थी

कितने प्यार से खीरे-टमाटर काटती थी

अखरोट भी याद से भिगो देती थी

मेरी सारी सीमित ज़रूरतों का ध्यान रखती थी

जो अल्हड़ थी

किचन से दूर रहती थी 

जिसे काम न करने के दस बहाने आते थे

कैसे मेरे लिए सब कुछ करने को उतावली रहती थी


मैं देखता था उसे 

और देखता था तुम्हें 

मैं छूता था उसे

और छूता था तुम्हें 


तुम्हारे मोती से दांत 

ज़ुल्फ़ों के पेंच 

खनकती हँसी

सब कुछ, सब कुछ 

मेरे सामने होते थे


सोचता था

पहन लिया तो

तुमसे रिश्ता ख़त्म हो जाएगा 

फ़ोन तो बंद हो ही गए हैं 


शर्ट पहना तो लगा

तुम्हें ओढ़ लिया


शर्ट पर सिलवटें पड़ गईं 

अब वो वॉशर में है


बैसाखी हटा ली है 


राहुल उपाध्याय । 17 अक्टूबर 2022 । सिएटल 






Friday, October 14, 2022

6 अक्टूबर

6 अक्टूबर 

आकर चला गया

और मुझे तनिक भी 

पता न चला कि उस दिन 

मम्मी को गुज़रे 14 महीने हो गए थे


सब कुछ सामान्य हो गया है 

अति सामान्य 


नई गतिविधियों ने जन्म ले लिया हैं

ऐसा भी नहीं है 


जीवन पूर्ववत ही है

लेकिन अब उनके कमरे में जाने पर

धड़कन नहीं बढ़ती

भावुक नहीं होता

आँखें नम नहीं होतीं


कमरा वैसा ही है जैसा था

वही पलंग 

वही टीवी

वही रिमोट

वही साइड टेबल

कुछ भी नहीं बदला 

फिर भी ये मुझे विचलित नहीं करते

वैसे ही निष्प्राण थे

अब और पत्थर हो गए हैं 


कुछ तो हो

जो मुझे रूलाए (1)

उनकी याद दिलाए


तुलसी में पानी बिना नागा किए

रोज़ देता हूँ 

वे भी फल-फूल रही हैं 

मम्मी की ज़रूरत किसी को नहीं है 


मम्मी की किसी को पड़ी नहीं है 


राहुल उपाध्याय । 14 अक्टूबर 2022 । सिएटल


(1-जो किसी ने नहीं किया, इस कविता ने कर दिया)