Monday, May 12, 2008

ये कुलदीप ये cool dude

ये कुलदीप ये cool dude
कमाल का इनका attitude

गुलाब जामुन और चाँकलेट
आलू पराठा और ऑमलेट
ये है इनके pet food
ये कुलदीप ये cool dude ...

पढ़ते लिखते दिन और रात
अव्वल आते हर जमात
काश ये होते इतने good
ये कुलदीप ये cool dude ...

संगीत इनका धूम-धड़ाक
बात करते तू-तड़ाक
behavior इनका very crude
ये कुलदीप ये cool dude ...

सुबह से हो जाता शुरू
TV जो इनका है गुरू
मार्गदर्शक इनका hollywood
ये कुलदीप ये cool dude ...

दिल को लगे ठेस सी
देख के इनकी प्रेयसी
लोग कहते हम हैं prude
ये कुलदीप ये cool dude ...

नाम के होते हैं parents
जो pay करते हैं इनके rent
और बदले में चाहे gratitude
ये कुलदीप ये cool dude ...

कपड़े इनके कटे-फ़टे
दुनिया से रहते कटे-कटे
डाल के सर पे अपने hood
ये कुलदीप ये cool dude ...

आने-जाने पे नहीं है रोक
खाने-पीने पे नहीं है रोक
फिर भी मांगे और latitude
ये कुलदीप ये cool dude ...

सेन फ़्रांसिस्को
अक्टूबर 2002

21 वीं सदी

डूबते को तिनका नहीं 'lifeguard' चाहिए 'graduate' को नौकरी ही नहीं एक 'green card' चाहिए खुशियाँ मिलती थी कभी शाबाशी से हर किसी को अब 'monetary reward' चाहिए जो करते थे दावा हमारी हिफ़ाज़त का उन्हें अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये 'bodyguard' चाहिए घर बसाना इतना आसान नहीं इन दिनों कलेजा पत्थर का और हाथ में 'credit card' चाहिए 'blog, email' और 'newsgroup' के ज़माने में भुला दिये गये हैं वो जिन्हें सिर्फ़ 'postcard' चाहिए सिएटल, 24 फ़रवरी 2007

क़हर

पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर

बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर

बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर

न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर

नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर

आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

सेन फ़्रांसिस्को
24 सितम्बर 2002
(अक्षरधाम पर हमले के बाद)

ॠषिवर

हम भी अजीब हैं
अल्ज़्हाईमर्स के मरीज हैं
वो है हम सब में
और हम ही को खबर नहीं है

ठीक उसी तरह जैसे
आँखे जो सब कुछ देखती हैं
नहीं देख पाती हैं खुद को

तलाश है एक आईने की
जो दिखा दे मुझे मेरी आत्मा
मेरा अंतर मेरा परमात्मा

आशा कम है चूंकि
आईने की नहीं
रिसिवर की है ज़रुरत
जैसे कि रेडियो वेव्स को
न तो देखा जा सकता हैं
न सुना जा सकता हैं
न सूंघा जा सकता हैं
न छुआ जा सकता हैं
न काटा जा सकता हैं
न मारा जा सकता हैं

क्या कृष्ण इसी की बात कर रहे थे?
अर्जुन को स्पंदन से ज्ञात कर रहे थे?

कैसे बनूं रिसिवर?
देखे हैं कई ॠषिवर
सिर पर है शिखा
जैसे कि एंटीना

पर वो तो बाद की बात है
बाहरी सजावट की बात है

मुझे अपनी पात्रता बढ़ानी होगी
ईर्ष्या दिल से मिटानी होगी
धूल मिट्टी कचरा हटाना होगा

कैसे बनूं रिसिवर?

सेन फ़्रांसिस्को
जुलाई 2002

कुदरत का खेल या ईश्वर का प्रकोप?

तूफ़ान आया
आ कर बरस गया
पानी में डूबा शहर
पानी को तरस गया

उफ़ान नदी का
उतर गया
आँखों में
समंदर ठहर गया

इस में भी उसका हाथ होगा
कुछ लेन-देन का हिसाब होगा
समझाते हैं अपने आप को
ढूंढते हैं अपने पाप को

तूफ़ान हो या कोई क़हर हो
खतरे का कोई पहर हो
कोंसते हैं अपने आप को
सहते हैं हर अभिशाप कि

कब मुक्ति हो इस पापी की
कब दया हो सर्वव्यापी की

सेन फ़्रान्सिस्को
सितम्बर 2005
(हरिकेन कटरिना के बाद)

Friday, May 9, 2008

मैं आरगेनिक नहीं हूँ

मैं आरगेनिक नहीं हूँ
मुझे फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड दे कर
बड़ा किया गया है
रात रात जाग कर
फिज़िक्स की प्राँब्लम्स
और गणित के समीकरण
हल किए हैं मैंने
अंग्रेज़ी के कई कठिन शब्द
याद किए हैं मैंने

देखो तो सही
अभी 10 साल का हुआ नहीं है
और इसे 100 तक के सारे
प्राईम नम्बर्स
स्क्वेयर रूट्स
और क्यूब रूट्स
मुँह जबानी याद है
मैं इसे
बोर्नविटा पिलाती हूँ
मेधावटी खिलाती हूँ
रोज सुबह 10 बादाम का
हलवा खिलाती हूँ
देखना एक दिन जरूर आई-आई-टी जाएगा
और विदेश जा कर अपना घर बसाएगा

मैं ज़िंदगी के पहले 20-22 वर्ष
इसी तरह गुज़ार देता हूँ
फ़्लैट की चार-दीवारी में
होस्टल के गलियारों में
टेबल-लैम्प की रोशनी में
पंखों के शोर में

ज़िंदगी का मतलब हो जाता है
कोचिंग
कम्पीटिशन
और पैसा कमाना

शरीर बड़ा हो जाता है
लेकिन दिमाग में
आंकड़ें,
फ़ार्मूलें,
रेस्निक-हेलिडे के हल
घर कर जाते हैं
त्योहार, रस्में, रीत-रिवाज़
सारे के सारे
दरकिनार हो जाते हैं
होली एक हुड़दंग
दीवाली पटाखों का शोर
और पूजा-पाठ एक आडम्बर
बन कर रह जाते हैं

मैं धीरे-धीरे
अलग हो जाता हूँ
अपने परिवार से
अपने समाज से
अपनी संस्कृति से

बड़ा हो जाने पर
मुझे धो-पोछ कर
सजा-धजा कर रख दिया जाता है
वो आते हैं
और मुझे ले कर चले जाते हैं

आज पार्टी है घर में
थोड़ा सलाद के लिए
खीरे-टमाटर-मूली-गाजर भी ले चले
और हाँ उस डाट-नेट प्रोजेक्ट के लिए
ये तीन ठीक रहेंगे
ताजा भी है
दाम भी कम है

जैसे क्रेडिट कार्ड से कोई
सब्जी खरीदता है
वैसे ही ग्रीन कार्ड दे कर
मुझे साथ ले कर चले जाते हैं

और देखते ही देखते
मैं धनाड्यों की फ़्रिज़ की
शोभा बढ़ाने लग जाता हूँ
और उस नियंत्रित वातावरण में
खुद को
सुरक्षित
और भाग्यशाली
समझने लगता हूँ

न आंधी का डर
न तूफ़ां का खौफ़
न चिलचिलाती धूप
न भिनभिनाते मच्छरों का डर

मैं आरगेनिक नहीं हूँ
आरगेनिक होता
तो कब का मिट्टी में मिल गया होता
फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड्स के कारण
फ़्रिज के नियंत्रित वातावरण के कारण
एक लम्बी दासता का बोझ है मुझ पर

यही है दास्तां मेरी
कि
मैं आरगेनिक नहीं हूँ

सिएटल,
9 मई 2008
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आरगेनिक = Organic, developing in a manner analogous to the natural growth and evolution characteristic of living organisms; arising as a natural outgrowth.
फ़र्टिलाईज़र = fertilizer
पेस्टिसाईड = pesticide
फिज़िक्स = physics
प्राँब्लम्स = problems
समीकरण = equations
प्राईम नम्बर्स = prime numbers
स्क्वेयर रूट्स = square roots
क्यूब रूट्स = cube roots
बोर्नविटा = Bournvita
आंकड़ें = data
दरकिनार = sidelined
सजा-धजा = decorate
डाट-नेट = .Net
क्रेडिट कार्ड = credit card
ग्रीन कार्ड = green card
धनाड्य = wealthy
फ़्रिज = fridge, refrigerator
दासता = slavery
दास्तां = tale, story, saga

किताब छपी?

न छपी है,
न छपवाऊंगा
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा

न है शिल्प का ज्ञान
न है छंद की पहचान
फिर भी रोज नई नई रचना
पेश करता जाउंगा
पन्ना एक एक रोज भेज कर
आपको झकझोड़ता जाऊंगा
लेकिन
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

छप गई किताब जो
बिकी नहीं किताब तो
पाठकों को
प्रकाशकों को
मैं कोसता ही जाऊँगा
इसीलिए
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

अच्छी हुई समीक्षा तो
समीक्षक को पकवान मैं खिलाऊंगा
बुरी हुई समीक्षा तो
समीक्षक को मजा मैं चखलाऊंगा
और समीक्षा ही नहीं हुई तो
समीक्षकों की सारी कौम को
चुने हुए नाम देता जाऊंगा
इसीलिए
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

न तुलसी ने बेची, न कबीर ने बेची
फिर भी ज़माना आज तक पढ़ता उन्हे हैं
भूख जिनकी मिटती नहीं है
कविता बेचना सिर्फ़ पड़ता उन्हे हैं

न बेटी की शादी
न बेटे का एडमिशन
न बीमारी का कोई बहाना है
कविता बेच कर इसे
आजीविका का साधन मुझे नहीं बनाना है

कविता में खुद्दारी झाड़ता हूँ इतनी
ज़िंदगी में भी खुद्दारी दिखाऊंगा
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

बाजुओं में जब तक दम है मेरे
कविता की दुहाई दे कर
हाथ नहीं फ़ैलाऊंगा
कविता लिखी है मर्जी से मैंने
मर्जी से ही लिखता जाऊंगा
न प्रकाशक
न आयोजक
किसी के भी दबाव में न आऊंगा
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …

अगर आपके पास वक़्त है
तो सारी कविताएँ मुफ़्त हैं
पढ़िए, भेजिए, जो चाहे आप कीजिए
सारे बंधनों से आप मुक्त हैं

पन्ने पलट कर
बिस्तर में लेट कर
पढ़ना यदि आप चाहते हैं
तो आदेश मुझे दीजिए
ई-मेल मुझे भेजिए
सिर्फ़ आपके और आपके ही लिए
मैं एकमात्र प्रति छापता जाऊंगा
लेकिन
पैसे दे कर मैं कभी किताब नहीं छपवाऊंगा
न छपी है …


सिएटल,
9 मई 2008