Friday, March 28, 2008

मिलने की अभिलाषा

देखता हूँ उसे रोज़
जाते हुए दफ़्तर
आते हुए घर

देखता हूँ उसे रोज़
लेकिन रुकता नहीं 
है कभी आँफ़िस की झंझट
तो कभी परिवार के बंधन

सोचता हूँ
एक दिन
उतरूँ अपनी गाड़ी से
चल के जाऊँ उस पगडंडी से
समेट लूँ उसकी खुशबू अपनी सांसों में
निहारूँ औंधें पड़े गगन को

लेकिन नहीं 
अभी थोड़ा और कमाना है
सुंदर सा घर बनाना है
अपनो को सताना है
गैरों को बताना है

देखता हूँ उसे रोज़
जाते हुए दफ़्तर
आते हुए घर

राहुल उपाध्याय | 28 मार्च 2008 | सिएटल

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1 comments:

Anonymous said...

Bahut pyaari kavita hai, Rahul.