Wednesday, July 23, 2008

पहला प्यार

कभी सुबह मिले
कभी शाम मिले
घंटों-घंटों हम
दिन-रात मिले
न गले लगे, न हाथ छुआ
और दिल?
दिल कुछ इस तरह से चाक हुआ
कि तर्क़ दूँ मैं सारी कायनात
'गर फिर से वो लम्हात मिलें
कभी सुबह मिले …

कभी हाट में
कभी पेड़ तले
हम साथ हँसे
हम साथ चले
लब पर आ-आ के रूकती बात रही
और दिल?
दिल ने दिल से दिल की न बात कही
मैं रख दूँ खोल के दिल अपना
'गर कहने को फिर वो बात मिले
कभी सुबह मिले …

कभी धूप में
कभी छाँव में
हम घूम-घूम के
सारे गाँव में
हँसते-हँसाते थे चार सू
और दिल?
दिल में आज भी है उनकी आरज़ू
मैं मान लूँ हर एक बात को
'गर लौट के फिर वो आज मिलें
कभी सुबह मिले …

सिएटल,
23 जुलाई 2008
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चाक = shred, torn into pieces
तर्क़ = leave
कायनात = universe
'गर = अगर, if
लम्हात = moments
हाट =market
लब =lips
चार सू = all around
आरज़ू = desire

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1 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

आहा! आनंद आ गया वाकई.. कमाल का प्रवाह