Sunday, July 27, 2008

क़हर - एक बार फिर

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ये मसला भी आजकल का नहीं है। जब अंग्रेज़ नहीं थे, जब मुसलमान नहीं थे, ईसाई धर्म नहीं था, ईस्लाम धर्म नहीं था, अंग्रेज़ी नहीं थी, उर्दू नहीं थी, तब भी इस तरह के झगड़े-विवाद आम थे। कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत के युद्ध के लिए आप इन में से किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। तो ये मानना बेकार है कि कल से अगर ये दोनो धर्म, इनके अनुयायी और इनकी भाषा विलुप्त हो जाए तो सारे विवाद खत्म हो जाएंगे।

इसलिए कई बार तो दिल कहता है कि जो भोंकते हैं उन्हें भोंकने दो। क्या फ़ायदा इनके मुँह लगने से। लेकिन क्या किया जाए। मेरा भी मन नहीं माना। मैंने एक लेख लिखा था 'गर्भनाल' में। तब भी कविता वाचक्नवी जी ने उसका जवाब दिया था अपने ब्लाग पर। लेकिन वो जवाब 'गर्भनाल' में नहीं आया। न जाने क्यों? जैसा कि मैं पहले भी अन्य लेख में लिख चुका हूँ - मुझे हिंदी लिखने का अभ्यास नहीं है। कविता एक आसान तरीका है - कम शब्द होते हैं, अधूरे वाक्य होते हैं और व्याकरण की थोड़ी-बहुत छूट होती है - इसलिए लिख लेता हूँ। लेकिन देर आए दुरुस्त आए। बहस का मौका आया है तो हिंदी में गद्य लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। और वैसे भी हिंदी में तर्क-वितर्क का अपना ही मजा है।

जिस सरकार की, जिस सोनिया गाँधी की ये भर्त्सना करते हैं, अगर अगले प्रवासी दिवस पर यही सरकार और यही सोनिया जी इन्हें पुरुस्कार प्रदान करें तो ये उनके सामने सर झुकाएंगे और अपने घर में उनके साथ लिया हुआ फोटो शान से सजाएंगे।

जब भी कोई ऐसी दु:खद घटना होती है जिसमें आतंकवाद का अंदेशा हो तो इनकी बांछे खिल आती है। लोहा गरम है। अभी चोट मारो। निकालो सारी ज़हर वाली बातें। आज के दिन तो सब सुनेंगे। औरंगज़ेब को मरे हुए कई वर्ष हो गए हैं लेकिन आज हम उसे फिर से ज़िंदा करेंगे। सब का खून खौला कर रहेंगे। 60 साल पहले हुए विभाजन की एक एक दर्दनाक दास्तां को हम दोहरा कर रहेंगे।

अगले 3 महीने तक अगर कोई विस्फोट न हो और हो भी तो 10 से कम मृत हो तो इनको मवाल होगा कि क्या बात है - ये शांति किसलिए? अब कैसे हम अपनी बात आगे बढ़ाएं।

एक दूसरे के प्रति बैर स्वाभाविक है। भाई-भाई में दुश्मनी होती है। अड़ोसी-पड़ोसी में अनबन होती है। लेकिन इन बातो को बड़े पैमाने पर हवा देना और भुनाना एक घिनौना कृत्य है।

हम अपनी संस्कृति में पैदा होते हैं, वो हमें विरासत में मिलती है। उसे हम चुन कर नहीं अपनाते हैं। हम क्या बोलते हैं, क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, किसे पूजते हैं, ये सब हम तराजू के पलड़ों में तोल कर नहीं तय करते हैं। चूंकि घर में सब हिंदी बोलते थे, इसलिए मैं हिंदी बोलता हूँ। इसका मतलब ये नहीं कि मैंने सारी दुनिया की भाषाओं की निष्पक्ष तुलना की और फिर इस नतीजे पर पहुँचा कि हिंदी विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है, और इसलिए मुझे इसके प्रचार-प्रसार में जुट जाना चाहिए।

यह बात खाने-पीने, रहन-सहन और पूजा-पाठ पर भी लागू होती है। शाकाहारी भोजन या मांसाहारी? साड़ी या जीन्स? अमेरिका के इसी परिवेश मे, इसी मौसम में, एक लड़की और उसकी माँ अलग अलग सोच रखती हैं। भारत के परिवेश में पली-बड़ी लड़की जब ब्याह कर यहाँ आती है तो जीन्स में खुश रहती है। और जब उसकी माँ यहाँ आती है तो माँ साड़ी में खुश है। दोनो उसी पगडंडी पर घूमने जाती है हर शाम। एक साड़ी में और एक जीन्स में। क्या जीन्स बेहतर है या साड़ी? दोनो तर्क दे सकती है अपने अपने चुनाव के पक्ष में। लेकिन दोनो को ये मिले थे परिवेश से और बाद में उन्होने अपनी अपनी सहुलियत से एक को पकड़े रखा और दूसरे को छोड़ दिया।

इस प्रकार आदमी का जीवन ढलता जाता है - संस्कार से, परिवेश से, सहुलियत से। कुछ पर तर्क-वितर्क के बाद बदलाव आ जाते हैं - जैसे कि खान-पान या साड़ी-जीन्स आदि। लेकिन कुछ बातों पर रुढ़ियाँ इतनी गहरी होती हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि इन्हें भी बदला जा सकता हैं। उदाहरण के तौर पर जनेउ-चोटी-तिलक तो गायब हो गए लेकिन बिना मंदिर के हम अपने धर्म-समाज की कल्पना ही नहीं कर सकते। जबकि अगर ध्यान से हमारे धार्मिक ग्रंथों का अवलोकन किया जाए, तो ये साबित हो जाएगा कि मंदिर की प्रथा हमारे समाज में थी ही नहीं। न अर्जुन ने मंदिर में पूजा की, न कृष्ण ने। अयोध्या तब भी था। रामसेतु तब भी था। वाल्मिकी की रामायण तब भी थी। एक भी बार न कृष्ण, न पांडव, न कौरव, न भीष्म कभी अयोध्या गए माथा टेकने या रामसेतु पानी चढ़ाने। या कि कृष्ण ने गीता के 700 श्लोक में एक बार भी राम के आदर्श जीवन का हवाला देते हुए कहा कि - सुन पार्थ, जब श्री राम के सामने संकट आए तो उन्होंने उनका कैसे सामना किया। तुम्हे भी उनसे कुछ सीखना चाहिए। रामकथा में निहित नैतिक, मौलिक, आध्यात्मिक ज्ञान को सीखना चाहिए।

एक और बात। दीवाली के बारे में हर बच्चे को बता दिया जाता है कि दीवाली तब से मनाई जा रही है जब से श्री राम रावण का वध कर के अयोध्या आए थे। लेकिन महाभारत का कोई पात्र कभी दीवाली के उत्सव की चर्चा नहीं करता है। या आप ये बता दे कि वनवास के दौरान, पांडवों की पहली दीवाली कैसे बीती? या कि कहीं दशहरा का ज़िक्र हो या रामनवमी का।

ये सब आधुनिक काल की उपज है। लेकिन थोप ऐसी दी गई है कि अब यह शास्वत सत्य है।

भाषा भ्रष्ट होने की जो आज बात कर रहे हैं - वे शायद तुलसी का भी उतना ही विद्रोह करते जब वे अवधि में रामचरितमानस लिख रहे थे। आज हिंदी की पताका फ़हरा रहे हैं। सोचिए, कृष्ण अगर आज आ जाए तो उन्हें कितना कष्ट होगा कि मैंने एक सुसंस्कृत भाषा संस्कृत में अच्छी तरह से गीता सुनाई, व्यास मुनि ने दोहराया और गणेश ने लिखी और आज जनता उसे छोड़ उसके अनुवाद पढ़ रही है।

निष्कर्ष यह कि जब तक हम पूर्वाग्रह से ग्रसित है, वाद-विवाद से कोई सार निकलता नहीं है। सारे तर्क-वितर्क व्यर्थ है ऐसे वातावरण में।

अंत में प्रस्तुत है ये कविता , जो कि है तो छ: साल पुरानी लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक पुरानी नहीं हुई।
इससे पहले कि कोई मुझे इस पर बधाई दे, कॄपया एक निगाह बधाई कविता पर भी डाल ले।

क़हर
पहले भी बरसा था क़हर
अस्त-व्यस्त था सारा शहर
आज फ़िर बरसा है क़हर
अस्त-व्यस्त है सारा शहर

बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा
जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर

बुरा है कौन, भला है कौन
सच की राह पर चला है कौन
मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर

न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं एक दल का है
मसला नहीं आजकल का है
सदियां गई हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर

नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर
जो जितना ज्यादा शूर है
वो उतना ज्यादा क्रूर है
ताज है जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर

आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताज़ा हवा फिर आएगी
दीवारे जब गिर जाएंगी
होगा जब घर एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

सेन फ़्रांसिस्को
24 सितम्बर 2002
(अक्षरधाम पर हमले के बाद)


सिएटल,
27 जुलाई 2008


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1 comments:

Madan Saxena said...

ख्याल बहुत सुन्दर है और निभाया भी है आपने उस हेतु बधाई

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